बाबूलाल के ऐलान के बाद बढ़ा सियासी तापमान, मिलने पहुंचे रामेश्वर
समृद्ध डेस्क: विधानसभा चुनाव के ऐलान के तुरंत बाद झारखंड की राजनीति तेजी से बदलने लगी है। यहां हाई वोल्टेज राजनीति का दौर शुरू हो चुका है। रविवार को जेवीएम प्रमुख बाबूलाल मरांडी द्वारा झारखंड की सभी 81 सीटों पर चुनाव लड़ने के ऐलान किये जाने के बाद सोमवार को महागठबंधन की एकता बचाने की कवायद तेज कर दी गई। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ रामेश्वर उरांव ने बाबूलाल मरांडी से मुलाकत कर बंद कमरे में गुफ्तगू की, इस दौरान क्या बातें हुईं ? ये साफ नहीं हो सका है।
त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
भीतरखाने से मिल रही खबरों के मुताबिक मरांडी ने हेमंत सोरेन का नेतृत्व मानने से इंकार कर दिया है। मरांडी के इंकार के पीछे एक बड़ा कारण महागठबंधन में अब तक सहमति नहीं होना भी माना जा रहा है। सूत्रों के हवाले से मिल रही खबरों के मुताबिक चारा घोटाले में सजायाफ्ता और बीमारी के कारण रिम्स में इलाजरत किंग मेकर के रुप में पहचान रखनेवाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने भीतर ही भीतर महागठबंधन की एकता का बीड़ा उठा रखा है।

पांच और छह नवंबर को बैठक

सीट शेयरिंग में फंसा पेंच
एक तरफ कांग्रेस श्री मरांडी को विपक्ष में सम्मानपूर्ण प्रतिनिधित्व देने की पक्षधर लग रही है, वहीं जेएमएम मरांडी को अधिक सीटे देने की पक्षधर नहीं है। मरांडी व रामेश्वर उरांव की मुलाकात को दो चश्में से देखा जा सकता है। पहला हेमंत सोरेन ने रिम्स में लालू प्रसाद से मिलकर महागठबंधन को मिलाने का प्रयास अपने स्तर से किया, वहीं कांग्रेस ने झट से सेामवार को बाबूलाल मंराडी से मिलकर उनके साथ चलने का दांव खेल दिया। विपक्ष के दो धड़ अपनी ताकत का अहसास अपने तरीके से कराने में जुटे हैं। कांग्रेस झामुमों के साथ भी बातचीत कर रही है, ताकि किसी हालात में महागठबंधन को एक किया जा सके। ऐसे में आनेवाले प्रत्येक पल झारखंड की राजनीति का दिलचस्प नजारा पेश करेगा।
बाबूलाल के सामने होगी चुनौती
बाबूलाल मरांडी तबे एकला चलो रे की राह पकड़ चुके हैं, लेकिन इस चुनाव में झाविमों के समक्ष मान्यता व सिंबल बचाने की चुनौती भी खड़ी हो सकती है। एक तरफ जहाँ पार्टी से जीतकर विधानसभा पहुंचे 8 में से 7 विधायक दूसरे दलों में है। ऐसे में पार्टी के अंदर अधिक विश्वसनीय प्रत्याशी का आभाव है। जिन्हें जिताऊ चेहरा माना जा सकता है। दूसरी ओर, राज्य स्तरीय दल की मान्यता और सिंबल बचाने के लिए पार्टी को विधानसभा चुनावों में कम से कम दरे सीटें जीतनी होगी या फिर वैध मतों के लिहाज से कम से कम 8 फीसद वोट की दरकार होगी।


