उधवा झील: जहां हर सर्दी हजारों किलोमीटर उड़कर पहुंचते हैं परिंदों के मेहमान

झारखंड की एकमात्र पक्षी अभयारण्य और रामसर साइट है उधवा झील

उधवा झील: जहां हर सर्दी हजारों किलोमीटर उड़कर पहुंचते हैं परिंदों के मेहमान
उधवा झील में हजारों प्रवासी परिंदों का अद्भुत नजारा

साहिबगंज स्थित उधवा झील झारखंड की एकमात्र पक्षी अभयारण्य और राज्य की इकलौती रामसर साइट है। हर वर्ष सर्दियों में साइबेरिया, मंगोलिया और यूरोप से हजारों प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं।

संजय कुमार धीरज

साहिबगंज: झारखंड की एकमात्र पक्षी अभयारण्य उधवा झील एक बार फिर हजारों प्रवासी परिंदों के कलरव से जीवंत हो उठी है। मानसून के दस्तक के साथ ही साइबेरिया, मंगोलिया, मध्य एशिया और यूरोप के बर्फीले इलाकों से उड़ान भरकर ये मेहमान परिंदे गंगा के कछार में बसी इस झील को अपना अस्थायी घर बनाने पहुंच रहे हैं। रामसर साइट का दर्जा प्राप्त उधवा झील अब सिर्फ साहिबगंज की पहचान नहीं, बल्कि वैश्विक जैव विविधता और संरक्षण के नक्शे पर एक अहम बिंदु बन चुकी है।

दो झीलों का संगम है उधवा  

उधवा पक्षी अभयारण्य दरअसल दो बड़ी झीलों, पतौरा और बेरहाले, से मिलकर बना है। करीब 5.65 वर्ग किमी में फैला यह वेटलैंड गंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र से जुड़ा है। बरसात में गंगा का पानी यहां भर जाता है, जिससे झील में सालभर नमी बनी रहती है। यही वजह है कि यहां जलकुंभी, कमल, सिंघाड़ा और मछलियों की भरपूर उपलब्धता रहती है, जो प्रवासी पक्षियों के लिए आदर्श भोजन है।

धैर्य से कैद हुई प्रकृति की कविता  

वन्यजीव फोटोग्राफरों के लिए उधवा झील किसी जन्नत से कम नहीं। सुबह की धुंध, पानी पर तैरती नाव और हजारों परिंदों का एक साथ उड़ान भरना, ये नजारे कैमरे में कैद करने के लिए घंटों धैर्य चाहिए। हाल ही में कुछ फोटोग्राफरों ने यहां के दुर्लभ पलों को कैमरे में उतारा है। ये तस्वीरें सिर्फ फ्रेम नहीं, बल्कि प्रवास, संघर्ष और प्रकृति की कालातीत लय की जीवंत कहानियां हैं। हर पंख की फड़फड़ाहट में महाद्वीपों के पार की दास्तान छिपी है।

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कौन-कौन से मेहमान पहुंचे इस बार  

नवंबर से मार्च तक उधवा झील में नॉर्दर्न पिनटेल, कॉमन टील, गडवाल, यूरेशियन विजन, बार-हेडेड गूज, ग्रे-लेग गूज, कॉमन पोचार्ड और रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड जैसी दर्जनों प्रजातियां डेरा डालती हैं। इसके अलावा स्थानीय प्रजातियों में पर्पल स्वैम्पहेन, फेजेंट-टेल्ड जैकाना, ब्रॉन्ज-विंग्ड जैकाना, लेसर व्हिसलिंग डक सालभर दिखते हैं। पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक यहां 100 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी रिकॉर्ड किए गए हैं, जिनमें कई IUCN की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त श्रेणी में हैं।

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रामसर साइट: क्यों है खास?  

उधवा झील को 2021 में रामसर साइट घोषित किया गया था। रामसर कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड को बचाने की संधि है। यह दर्जा मिलने से उधवा झील अब वैश्विक संरक्षण प्रयासों का हिस्सा बन गई है। यह झारखंड का इकलौता रामसर साइट और इकलौता पक्षी अभयारण्य दोनों है।

खतरे भी कम नहीं: संरक्षण की दरकार 

पर्यावरणविद सह मॉडल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर रणजीत कुमार सिंह बताते हैं कि उधवा झील की सेहत लगातार बिगड़ रही है। जलकुंभी तेजी से फैल रही है जिससे खुला पानी कम हो रहा है। आस-पास के इलाकों में अवैध मछली पकड़ना, शिकार और खेती के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल परिंदों के लिए खतरा है। पर्यटन के नाम पर होने वाला शोर भी पक्षियों को परेशान करता है। डॉक्टर रणजीत सिंह कहते हैं कि वन विभाग ने गश्त बढ़ाई है, लेकिन स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना संरक्षण अधूरा है। उधवा झील सिर्फ तस्वीरें खींचने की जगह नहीं, यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का फेफड़ा है।

पर्यटन की अपार संभावनाएं  

साहिबगंज जिला प्रशासन उधवा झील को ईको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है। वॉच टावर, बोटिंग और नेचर गाइड की सुविधा से यहां पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। सर्दियों में बर्ड वॉचिंग के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के मौके भी बन रहे हैं। उधवा झील हर साल सर्दियों में आसमान पर परिंदों से नई इबारत लिखती है। जरूरत है तो बस इन परिंदों की भाषा समझने की, इनकी उड़ान को महफूज रखने की। क्योंकि जब तक उधवा में परिंदे लौटते रहेंगे, तब तक प्रकृति की यह कविता अधूरी नहीं होगी।

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Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha Picture

Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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