पड़ताल: 79 करोड़ के लक्ष्य पर साहिबगंज उत्पाद विभाग ने 84 करोड़ की वसूली
साहिबगंज में उत्पाद विभाग ने लक्ष्य से अधिक राजस्व वसूला
साहिबगंज उत्पाद विभाग में संसाधनों की भारी कमी के बीच राजस्व वसूली का चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। विभाग ने वित्तीय वर्ष 2025-2026 में 79 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले 84.81 करोड़ रुपये की वसूली की है।
संजय कुमार धीरज
साहिबगंज: एक तरफ सरकार ने उत्पाद विभाग को इस साल 98.65 करोड़ का टारगेट थमा दिया है, तो दूसरी तरफ विभाग खुद वेंटिलेटर पर है। जिले में 48 शराब दुकानों की मॉनिटरिंग, राजस्व वसूली और छापेमारी की जिम्मेदारी सिर्फ 3 कर्मियों के कंधों पर है।
24 में से 21 पद खाली: कैसे होगी मॉनिटरिंग?
कम स्टाफ, फिर भी रिकॉर्ड तोड़ वसूली

48 दुकान, बिहार से बंगाल तक फैला कारोबार
जिले में कुल 48 शराब दुकानें हैं। इनमें 45 कंपोजिट और 3 देसी शराब की दुकान शामिल हैं। ये दुकानें बिहार बॉर्डर से लेकर पश्चिम बंगाल बॉर्डर तक फैली हैं। 3 लोगों से इतने बड़े इलाके की मॉनिटरिंग कैसे होगी, यह सबसे बड़ा सवाल है।
दफ्तर भी जर्जर: छत टपकती है
विभाग का कार्यालय खुद बदहाली की मिसाल है। दो छोटे कमरों में पूरा विभाग चल रहा है। बारिश में कमरे में पानी घुस जाता है। छत का प्लास्टर गिर रहा है। कर्मी डरते हैं कि कब छत गिर जाए और कोई घायल हो जाए। नया भवन बनाने का प्रस्ताव भेजा गया है। जमीन चिन्हित कर विभाग ने आवंटन की मांग की है, लेकिन फाइल अभी दौड़ रही है। नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा कि टारगेट हर साल बढ़ जाता है, लेकिन स्टाफ नहीं। 48 दुकान, तस्करी रोकना, छापेमारी करना—3 लोगों से कैसे होगा? सिपाही नहीं तो हम अकेले रेड कैसे करें? जान का भी खतरा रहता है।
बिना फोर्स के अवैध शराब पर लगाम कैसे?
सवाल उठना लाजमी है कि 98 करोड़ का टारगेट देने वाली सरकार 21 खाली पदों पर भर्ती कब करेगी? 15 में से 14 सिपाही के पद खाली हैं। बिना फोर्स के अवैध शराब पर लगाम कैसे लगेगी? और जिस विभाग से सरकार अरबों कमाना चाहती है, उसका दफ्तर टपकती छत के नीचे क्यों चल रहा है? स्टाफ 3, टारगेट 98 करोड़, दफ्तर जर्जर—यह ‘आत्मनिर्भर विभाग’ नहीं, ‘भगवान भरोसे विभाग’ है। सरकार राजस्व तो पूरा चाहती है, पर संसाधन देने में कंजूसी क्यों? सोचने वाली बात है कि अगर 3 लोग 84 करोड़ वसूल सकते हैं, तो पूरी टीम होती तो क्या होता? शराब दुकानों से पैसा तो आ रहा है, लेकिन उसे वसूलने वाला विभाग खुद प्यासा है—स्टाफ का, संसाधन का, सम्मान का। जश्न राजस्व का मन रहा है, मातम सिस्टम का हो रहा है।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
