Sahebganj News: रोजी-रोटी के चक्कर में परदेश गए प्रवासियों को 'खाने के लाले'
दूसरे राज्यों में LPG की किल्लत से दाने-दाने को तरसे प्रवासी
देश के बड़े शहरों में एलपीजी (LPG) गैस की भारी किल्लत और कालाबाजारी ने साहिबगंज के प्रवासी मजदूरों को घर लौटने पर मजबूर कर दिया है। 800 रुपये प्रति किलो तक बिक रही गैस के कारण मजदूरों और छात्रों के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया है। दिल्ली, मुंबई और गोवा जैसे शहरों से भारी संख्या में लोग साहिबगंज रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हैं, क्योंकि उनकी दिहाड़ी से ज्यादा अब गैस की कीमत हो गई है।
साहिबगंज: अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर साहिबगंज जिले के प्रवासी मजदूर रोजी-रोटी की तलाश में पिछले महीने ही दिल्ली, मुंबई, गोवा, केरल, सूरत जैसे अन्य राज्य गए थे। जब एलपीजी गैस की किल्लत से उनके खाने पर ही संकट के बादल छा गए, तब प्रवासी मजदूर अब बोल रहे हैं, "आ अब लौट चलें"। जी हां, इन दिनों भारी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने-अपने घर आने के लिए दूसरे राज्यों से साहिबगंज रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हैं।
परिवार का भरण-पोषण और रोजी-रोटी की तलाश
साहिबगंज, बरहरवा, तीनपहाड़, आदि क्षेत्रों से अपने परिवार का भरण-पोषण और रोजी-रोटी की तलाश में बाहर गए लोगों पर एलपीजी गैस संकट की वजह से खुद के खाने पर भी संकट के बादल छा गए। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र भी अछूते नहीं हैं। आनंद विहार, नई दिल्ली, सूरत, चेन्नई और पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर साहिबगंज अपने घर लौटने वाले प्रवासियों की भारी भीड़ उमड़ रही है। प्रवासी किसी तरह अपने गांव लौटने को बेताब दिख रहे हैं।
एक किलो गैस की कीमत ₹700-800

प्रत्येक दिन बाहर खाने के पैसे नहीं
आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया
कबूतरखोपी के शिव मंडल और शिवम् कुमार ने बताया कि सूरत में रहकर पहले से ही दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे थे। गैस की किल्लत और कालाबाजारी ने उसकी कमर तोड़ दी। उन्होंने बताया कि उनकी कमाई प्रतिदिन 500 रुपये होती थी और गैस की कीमत बाजारों में 600-800 रुपये प्रति किलो है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया होने के कारण सूरत में रहकर गुजारा करना नामुमकिन था, इसीलिए उन्होंने अपने घर लौटने में ही भलाई समझी। ये तो सिर्फ चंद नाम ऐसे हैं जिनसे साहिबगंज प्रतिनिधि से बात और मुलाकात हुई। इसके अलावा हजारों प्रवासी मजदूर ऐसे भी हैं जो दूसरे राज्यों से एलपीजी की किल्लत के कारण अपने-अपने घरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।
