Satire
साहित्य 

लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया....

लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया.... यह व्यंग्यात्मक आलेख आज के साहित्यिक लोकार्पण समारोहों की बदलती तस्वीर को सामने लाता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे किताबों का विमोचन अब साहित्यिक विमर्श से अधिक दिखावे, औपचारिकता, सोशल मीडिया प्रचार और चाय-समोसे के आयोजनों तक सीमित होता जा रहा है।
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ओपिनियन 

Opinion व्यंग्य: फिर गये सुपारी के दिन 

Opinion व्यंग्य: फिर गये सुपारी के दिन  पान सुपारी पहले शुभ का प्रतीक माना जाता था. स्वागत का भी प्रतीक माना जाता था. शादी हो या श्राद्ध सभी जगह पान और सुपारी का बोल बाला रहता था.
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