बढ़ते कॉकरोच को कैसे खत्म करें?
कॉकरोच खत्म करने की तलाश में निकला लेखक पहुंच गया राजनीतिक गलियारों तक
ओम प्रकाश प्रीत "सोनू" का यह व्यंग्य लेख कॉकरोचों को खत्म करने की साधारण घरेलू समस्या से शुरू होकर भारतीय राजनीति के जटिल समीकरणों तक पहुंचता है।
ओम प्रकाश प्रीत "सोनू "
पत्नी की शिकायत थी कि घर में कॉकरोच बढ़ते जा रहे हैं। पति होने के नाते मेरी जिम्मेदारी थी कि इस राष्ट्रीय संकट का समाधान खोजूँ। मैंने तुरंत गूगल का दरवाज़ा खटखटाया और पूछा—"बढ़ते कॉकरोच को कैसे खत्म करें?"

फिर मैंने यूट्यूब देखा, एआई से पूछा, लेख पढ़े। लगभग हर जगह वही बात, बस शब्दों की पैकिंग अलग-अलग थी। मुझे लगा कि मामला कुछ संदिग्ध है। अगर ये उपाय इतने ही कारगर होते तो कॉकरोच अब तक इतिहास की किताबों में मिलते, रसोई में नहीं।

फिर मैंने सोचा कि शायद ये सामान्य कॉकरोच नहीं हैं। ये उस प्रजाति के हैं जो हर परिस्थिति में खुद को ढाल लेती है। आप हमला करते हैं, वे रणनीति बदल लेते हैं। आप एक दरार बंद करते हैं, वे दूसरी खोज लेते हैं। आप सोचते हैं कि मामला खत्म हो गया, और कुछ दिन बाद वे पहले से अधिक आत्मविश्वास के साथ वापसी कर लेते हैं।
यहीं से मेरा दिमाग राजनीति की तरफ मुड़ गया। कॉकरोच और राजनीति में एक अद्भुत समानता है। दोनों को खत्म करने के लिए लोग तरह-तरह के उपाय बताते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वे किसी नए कोने, नए चेहरे, नए नारे या नए गठबंधन के साथ फिर सामने आ जाते हैं।
कॉकरोच बिना चुनाव लड़े हर घर में सत्ता में बने रहते हैं और राजनीति में भी कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जो चुनाव हारकर भी चर्चा में बनी रहती हैं। फिर मेरा ध्यान BJP और उसके विरोधियों की तरफ चला गया। मैं सोचने लगा कि BJP का विरोध करने वाली पार्टियों के नामों में आखिर "C" का प्रभाव इतना अधिक क्यों दिखाई देता है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी राजनीतिक ज्योतिषी ने वर्षों पहले कोई गुप्त सलाह दी हो, "सत्ता चाहिए तो कमल चुनिए, और विपक्ष में रहना है तो नाम में C रखिए।" हालाँकि यह भी हो सकता है कि यह मेरे दिमाग की ही उड़ान हो। आखिर पत्नी ने मुझे कॉकरोच मारने भेजा था और मैं राजनीतिक विश्लेषण करने बैठ गया। मेरे दिमाग की भी एक समस्या है। उसे एक विषय पर टिककर रहने की आदत नहीं। वह बोरिक एसिड से शुरू होकर लोकतंत्र पर समाप्त होता है।
अब देखिए न, इसे लगने लगा कि C for Cockroach भी कहीं न कहीं राजनीतिक विज्ञान का ही हिस्सा है।समानताएँ भी कम नहीं हैं। दोनों की उपस्थिति से लोग परेशान रहते हैं। दोनों को हटाने के लिए समय-समय पर अभियान चलते हैं। दोनों के बारे में बार-बार घोषणा होती है कि "इस बार इनका अंत निश्चित है।"
लेकिन कुछ समय बाद पता चलता है कि वे किसी नई दरार, नए मंच, नए गठबंधन या नए रूप में फिर उपस्थित हैं। वैसे कॉकरोचों की एक और विशेषता है। वे कभी अकेले नहीं आते। पहले एक दिखता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा। और जब तक आप स्थिति समझते हैं, तब तक वे घर का नक्शा आपसे बेहतर जान चुके होते हैं।
राजनीति में भी अक्सर कुछ ऐसा ही होता है। पहले एक बयान आता है, फिर प्रतिक्रिया, फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस, फिर गठबंधन, फिर महागठबंधन, और देखते ही देखते पूरा देश बहस में बदल जाता है। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि इस देश में दो ही चीजें सचमुच अमर हैं।
पहला—कॉकरोच।
दूसरा—विपक्ष के पुनर्गठन की बैठकें।
कॉकरोच समय-समय पर अपना ठिकाना बदलते हैं और विपक्ष समय-समय पर अपना समीकरण। कॉकरोच रसोई में मिल जाते हैं, पुनर्गठन की बैठकें राजधानी में। दोनों की गतिविधियाँ अक्सर रात में तेज़ हो जाती हैं और दोनों के बारे में सुबह उठकर नई खबर मिलती है।
फर्क बस इतना है कि कॉकरोचों के पास प्रवक्ता नहीं होते। अगर होते, तो शायद वे भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताते कि उनका विस्तार दरअसल "जनसमर्थन" का परिणाम है और रसोई में उनकी बढ़ती उपस्थिति जनता के विश्वास का प्रमाण है।
खैर, मैं अभी भी कॉकरोच खत्म करने का उपाय खोज रहा हूँ। लेकिन जितना पढ़ रहा हूँ, उतना ही विश्वास मजबूत हो रहा है कि कुछ चीजें वास्तव में खत्म नहीं होतीं। वे केवल अपना नाम, पता, रूप और रणनीति बदलती हैं।
और शायद यही कारण है कि कॉकरोच विज्ञान और राजनीति विज्ञान, दोनों का अंतिम निष्कर्ष एक ही है—
"सावधान रहिए, अगली पीढ़ी पहले से ज्यादा संगठित होकर लौट सकती है।"
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.


