विश्व पर्यावरण दिवस 2026: युद्ध और प्रदूषण की आग में झुलसती पृथ्वी
तेल रिसाव, बढ़ता कार्बन उत्सर्जन और नष्ट होते इको-सिस्टम पर केंद्रित लेख
विश्व पर्यावरण दिवस पर आधारित यह विशेष लेख जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ युद्धों से पैदा हो रहे पर्यावरणीय संकट की पड़ताल करता है। लेखक मनोज कुमार ने खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष, तेल रिसाव, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, समुद्री जैव विविधता पर खतरे और वैश्विक प्रदूषण के प्रभावों को रेखांकित किया है।
5 जून को हर वर्ष हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं, लेकिन इस बार जश्न का स्वर धीमा है। क्योंकि 2026 का पर्यावरणीय परिदृश्य सिर्फ जलवायु परिवर्तन की चुनौती नहीं, बल्कि मानव निर्मित युद्धों की तबाही भी उजागर कर रहा है।
यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंटल प्रोग्राम की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया ने 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर गर्मी, बाढ़ और सूखा झेला। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। इसी बीच खाड़ी देशों में छिड़े युद्ध ने पर्यावरण संकट और गहरा दिया है। जब हम कार्बन घटाने की बात करते हैं, तो युद्ध के मैदान में टैंक और बमवर्षक विमान कार्बन का पहाड़ उगल रहे हैं। ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध ने पर्शियन गल्फ को पर्यावरणीय युद्धक्षेत्र बना दिया है।


युद्ध ने दिखा दिया है कि प्रदूषण सरहदों की सीमाएं नहीं मानता। खाड़ी में जलते तेल डिपो का धुआं हजारों किलोमीटर दूर की हवा को प्रभावित कर रहा है। समुद्री तेल रिसाव प्रवाह के साथ हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। साथ ही, तेल की कीमत बढ़ने से दक्षिण कोरिया जैसे देश कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को फिर शुरू कर रहे हैं। यह जीरो कार्बन एमिशन और जलवायु संरक्षण लक्ष्यों पर सीधी चोट है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि इसका रास्ता क्या है?
इस पर्यावरण दिवस पर हमें समझना होगा कि “आवर पावर, आवर प्लैनेट” का नारा तब तक अधूरा है, जब तक युद्ध को भी प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत नहीं माना जाता। पर्यावरण समझौतों में युद्धकालीन उत्सर्जन को छूट नहीं मिलनी चाहिए। समुद्री इको-सिस्टम को रेड क्रॉस की तर्ज पर युद्ध क्षेत्र में भी सुरक्षित घोषित करना होगा। और सबसे जरूरी यह कि ऊर्जा सुरक्षा का मापदंड सिर्फ तेल का भंडार नहीं, बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत जैसे सौर, पवन और जल ऊर्जा भी हों, जिन्हें दुश्मन देश की मिसाइलें आसानी से नष्ट न कर सकें।
आज का दिन हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी एक है और इसे बचाने की जिम्मेदारी पूरे विश्व समुदाय की है। अगर आज हम युद्ध की आग नहीं बुझाएंगे, तो कल रहने के लिए हमारी पृथ्वी ही नहीं बचेगी।
लेखक : मनोज कुमार
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.


