सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, सुरक्षा भी चाहिए: झारखंड के साहित्यकारों और कलाकारों के लिए कल्याण कोष की मांग

सुकुमार और डॉ. गिरिधारी राम गौंझू के संघर्ष ने कलाकारों की सामाजिक सुरक्षा पर बहस तेज की

सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, सुरक्षा भी चाहिए: झारखंड के साहित्यकारों और कलाकारों के लिए कल्याण कोष की मांग
"सम्मान से आगे बढ़कर सुरक्षा: झारखंड के साहित्यकारों और कलाकारों के लिए कल्याण कोष की मांग"

झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाने वाले साहित्यकारों और लोक कलाकारों की सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। खोरठा साहित्यकार स्व. सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ और पद्मश्री डॉ. गिरिधारी राम गौंझू जैसे सांस्कृतिक व्यक्तित्वों के संघर्ष ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या समाज और व्यवस्था केवल सम्मान तक सीमित है।

झारखंड की पहचान केवल उसकी खनिज संपदा, प्राकृतिक सौंदर्य या औद्योगिक विकास से नहीं है। इस राज्य की आत्मा उसकी लोकभाषाओं, लोकगीतों, लोककथाओं, आदिवासी एवं सदानी सांस्कृतिक परंपराओं और उन्हें जीवित रखने वाले साहित्यकारों एवं कलाकारों में बसती है। यही लोग झारखंड की अस्मिता के वास्तविक प्रहरी हैं। विडंबना यह है कि जिन लोगों ने अपना संपूर्ण जीवन समाज और संस्कृति के संरक्षण में लगा दिया, उन्हें अक्सर जीवन के अंतिम पड़ाव में उपेक्षा, आर्थिक संकट और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।

हाल ही में खोरठा भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, लोक कलाकार और स्वर कोकिल स्वर्गीय सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ के जीवन से जुड़ी पीड़ादायक परिस्थितियों ने पूरे समाज को झकझोर दिया। जिनकी आवाज़ में झारखंड की मिट्टी की सोंधी महक थी, जिनके गीतों ने गांव-देहात की संवेदनाओं को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया, जिनकी रचनाएँ विश्वविद्यालयों में अध्ययन का विषय बनीं, वही साहित्यकार गंभीर बीमारी के समय आर्थिक तंगी के कारण समुचित इलाज के लिए संघर्ष करते रहे।

“मांदर बाजे रे”, “मांय गो मांय” जैसे अनेक लोकप्रिय गीतों के रचयिता सुकुमार ने केवल गीत नहीं लिखे, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक चेतना को स्वर दिया। उन्होंने खोरठा भाषा को घर-घर पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी रचनाओं ने नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया। लेकिन आज यह प्रश्न पूरे समाज के सामने खड़ा है कि क्या हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति केवल भावनात्मक सम्मान तक सीमित हैं? क्या उनके जीवन और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी हमारी नहीं है?

यह घटना कोई अपवाद नहीं है। इससे पूर्व झारखंडी भाषाओं और संस्कृति के महान विद्वान, शोधकर्ता एवं पद्मश्री सम्मान से अलंकृत डॉ. गिरिधारी राम गौंझू भी कोविड-19 महामारी के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष करते दिखाई दिए थे। जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन नागपुरी भाषा, लोक साहित्य और झारखंडी सांस्कृतिक इतिहास के संरक्षण में समर्पित कर दिया, उन्हें भी कठिन समय में अपेक्षित व्यवस्था और सहयोग प्राप्त नहीं हो सका। यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं थी, बल्कि हमारी सांस्कृतिक नीतियों और सामाजिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न था।

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सवाल यह है कि हम अपने कलाकारों और साहित्यकारों को किस दृष्टि से देखते हैं? जब वे मंच पर होते हैं, हम उनका सम्मान करते हैं। जब उन्हें पुरस्कार मिलता है, हम गर्व महसूस करते हैं। जब उनकी रचनाएँ लोकप्रिय होती हैं, हम तालियाँ बजाते हैं। लेकिन जब वही लोग बीमारी, आर्थिक संकट या वृद्धावस्था की चुनौतियों से जूझते हैं, तब समाज और व्यवस्था का सहयोग अक्सर अपर्याप्त दिखाई देता है।

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दुनिया के विकसित समाज अपने साहित्यकारों, कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों को राष्ट्रीय धरोहर मानते हैं। उनके लिए स्वास्थ्य सुरक्षा, पेंशन, आकस्मिक सहायता और विशेष कल्याण योजनाएँ संचालित की जाती हैं। क्योंकि वे समझते हैं कि संस्कृति केवल भवनों, स्मारकों या दस्तावेजों में नहीं बसती, बल्कि उन जीवित व्यक्तित्वों में बसती है, जो उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं।

झारखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है। यहाँ दर्जनों लोकभाषाएँ, सैकड़ों लोककलाएँ और हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपराएँ जीवित हैं। यदि इन परंपराओं के वाहक ही असुरक्षित रहेंगे, तो हमारी सांस्कृतिक विरासत भी धीरे-धीरे कमजोर होती जाएगी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार, विश्वविद्यालय, सांस्कृतिक संस्थाएँ, उद्योग जगत और समाज मिलकर एक व्यापक “झारखंड साहित्यकार एवं कलाकार कल्याण कोष” की स्थापना करें। इसके अंतर्गत वरिष्ठ साहित्यकारों और कलाकारों के लिए स्वास्थ्य बीमा, आपातकालीन चिकित्सा सहायता, मासिक सम्मान राशि, पेंशन तथा पारिवारिक सुरक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही, ऐसे सांस्कृतिक व्यक्तित्वों का एक समग्र डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

यह केवल सरकारी दायित्व नहीं है। समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सम्मानित करने के साथ-साथ हमें उन लोगों के जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं के प्रति भी संवेदनशील होना होगा। सम्मान तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति के जीवन में सुरक्षा और गरिमा भी सुनिश्चित करे।

सुकुमार जी की पीड़ा और डॉ. गिरिधारी राम गौंझू जी के संघर्ष हमें आत्ममंथन का अवसर देते हैं। ये घटनाएँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि कहीं हम अपने सांस्कृतिक नायकों को केवल स्मृतियों और श्रद्धांजलियों तक सीमित तो नहीं कर रहे हैं? क्या हम उनके जीवित रहते हुए उनके योगदान का वास्तविक सम्मान कर पा रहे हैं?

झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए केवल गीतों, पुस्तकों और स्मारकों का संरक्षण पर्याप्त नहीं है। उन लोगों का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है, जिन्होंने अपने जीवन की तपस्या से इन सांस्कृतिक धरोहरों को जीवित रखा है।

यदि हम अपने साहित्यकारों, लोक कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे अवश्य पूछेंगी कि जिन लोगों ने हमारी पहचान को बचाया, हम उन्हें क्यों नहीं बचा सके?

सुकुमार जी और झारखंड की सांस्कृतिक चेतना को समर्पित सभी महान विभूतियों के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम ऐसी व्यवस्था का निर्माण करें, जहाँ किसी साहित्यकार या कलाकार को इलाज, सम्मान और जीवन-निर्वाह के लिए संघर्ष न करना पड़े।

(डॉ. रणधीर कुमार)

लेखकप्रसिद्द शिक्षाविद , साहित्यकार एवं मानवाधिकार विशेषज्ञ हैं ।

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Edited By: Mohit Sinha
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Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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