पत्रकार बनना आसान है, पत्रकारिता करना मुश्किल
संजय कुमार धीरज ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर उठाए गंभीर सवाल
वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार धीरज का यह विचारोत्तेजक आलेख पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर केंद्रित है। लेखक ने व्यंग्यात्मक शैली में बताया है कि आज पत्रकार बनना भले आसान हो गया हो, लेकिन वास्तविक पत्रकारिता करना पहले से कहीं अधिक कठिन है।
आलेख: संजय कुमार धीरज
आजकल पत्रकारिता में प्रवेश लेना वैसा ही हो गया है जैसे किसी शादी में बिना बुलावे के घुस जाना। न कोई योग्यता पूछता है, न कोई उद्देश्य। बस एक मोबाइल, दो-चार सोशल मीडिया अकाउंट और प्रोफाइल फोटो पर "वरिष्ठ पत्रकार" लिखवा लीजिए, पत्रकारिता का द्वार आपके लिए खुला है। पुराने समय में पत्रकारिता को मिशन कहा जाता था। आजकल मिशन का स्थान कमीशन ने ले लिया है। पहले पत्रकार खबर खोजता था, अब खबर पत्रकार को खोजती है और पूछती है, "भाई साहब, मुझे चलाने का रेट क्या है?"


एक समय था जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था। आज कई जगह सत्ता पत्रकार से पूछती है, "भाई, इस महीने सब ठीक चल रहा है ना?" और पत्रकार मुस्कुराकर कहता है, "जी, आपका आशीर्वाद बना रहे।" त्याग की बात करें तो पत्रकारिता आज भी त्याग मांगती है, लेकिन त्याग करने वालों की संख्या कम होती जा रही है। आज त्याग का अर्थ बदल गया है। कुछ लोग सत्य का त्याग कर देते हैं, कुछ निष्पक्षता का और कुछ तो व्याकरण का भी। बचता क्या है? केवल "ब्रेकिंग न्यूज" का लाल पट्टा। पत्रकारिता का हाल उस रिश्तेदार जैसा हो गया है जिसे हर कोई अपना बताता है लेकिन कोई उसकी जिम्मेदारी नहीं उठाता। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन उस स्तंभ की मरम्मत कौन करेगा, यह कोई नहीं बताता।
सबसे मनोरंजक दृश्य तब होता है जब पाँच लोगों का व्हाट्सएप ग्रुप बनता है और अगले दिन उसका नाम रख दिया जाता है "राष्ट्रीय पत्रकार संघ अंतरराष्ट्रीय प्रकोष्ठ"। फिर अध्यक्ष, महासचिव, संरक्षक और मुख्य संरक्षक के पद बाँट दिए जाते हैं। संगठन में सदस्य पाँच होते हैं और पद सात। पत्रकारिता के नाम पर पुरस्कारों की भी अद्भुत खेती चल रही है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि देश में पत्रकार कम और पुरस्कार प्राप्त पत्रकार अधिक हैं। कुछ लोगों के ड्रॉइंग रूम में इतनी ट्रॉफियाँ होती हैं कि यदि उन्हें बेच दिया जाए तो एक छोटा-मोटा न्यूज़ चैनल शुरू हो सकता है।
फिर भी इस सारी विडंबना के बीच कुछ लोग ऐसे हैं जो सचमुच पत्रकारिता को यज्ञ मानते हैं। वे आज भी बिना संसाधनों के खबर खोजते हैं, बिना दबाव के सच लिखते हैं और बिना किसी पुरस्कार की अपेक्षा के जनता के सवाल उठाते हैं। वही लोग इस पेशे की असली पूँजी हैं।
इसीलिए यदि पत्रकारिता में आना है तो पहले यह तय कर लीजिए कि आपको पत्रकार बनना है या केवल प्रेस लिखी गाड़ी में घूमना है। यदि आपको सम्मान चाहिए तो बहुत रास्ते हैं, लेकिन यदि आपको सच का साथ चाहिए तो रास्ता कठिन है।
पत्रकारिता में बने रहना आसान नहीं है। यहाँ कभी विज्ञापन नाराज़ होता है, कभी नेता, कभी अधिकारी और कभी अपना ही पाठक। फिर भी यदि आप हर परिस्थिति में सत्य के साथ खड़े रह सकते हैं, तो आपका स्वागत है।
क्योंकि पत्रकारिता आज भी वही कहती है: "यदि स्वयं को स्वाहा कर सको तो पत्रकारिता करना।" बाकी तो आजकल मोबाइल का कैमरा भी पत्रकार है, रिंग लाइट भी पत्रकार है और कुछ मामलों में तो ट्राइपॉड भी वरिष्ठ पत्रकार घोषित होने की प्रतीक्षा में खड़ा है।
(लेखक समृद्ध झारखंड के ब्यूरो और युवा पत्रकार संगठन के सदस्य हैं।)
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.


