व्यंग्य
साहित्य 

लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया....

लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया.... यह व्यंग्यात्मक आलेख आज के साहित्यिक लोकार्पण समारोहों की बदलती तस्वीर को सामने लाता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे किताबों का विमोचन अब साहित्यिक विमर्श से अधिक दिखावे, औपचारिकता, सोशल मीडिया प्रचार और चाय-समोसे के आयोजनों तक सीमित होता जा रहा है।
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आर्टिकल 

पत्रकार बनना आसान है, पत्रकारिता करना मुश्किल

पत्रकार बनना आसान है, पत्रकारिता करना मुश्किल वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार धीरज का यह विचारोत्तेजक आलेख पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर केंद्रित है। लेखक ने व्यंग्यात्मक शैली में बताया है कि आज पत्रकार बनना भले आसान हो गया हो, लेकिन वास्तविक पत्रकारिता करना पहले से कहीं अधिक कठिन है।
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आर्टिकल 

बढ़ते कॉकरोच को कैसे खत्म करें? 

बढ़ते कॉकरोच को कैसे खत्म करें?  ओम प्रकाश प्रीत "सोनू" का यह व्यंग्य लेख कॉकरोचों को खत्म करने की साधारण घरेलू समस्या से शुरू होकर भारतीय राजनीति के जटिल समीकरणों तक पहुंचता है।
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