लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया....

किताबों के लोकार्पण समारोहों में बढ़ती औपचारिकता पर करारा व्यंग्य

लोकार्पण: जब साहित्य औपचारिकता के 'समोसे' में खो गया....
गुड्डू अनिल

यह व्यंग्यात्मक आलेख आज के साहित्यिक लोकार्पण समारोहों की बदलती तस्वीर को सामने लाता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे किताबों का विमोचन अब साहित्यिक विमर्श से अधिक दिखावे, औपचारिकता, सोशल मीडिया प्रचार और चाय-समोसे के आयोजनों तक सीमित होता जा रहा है।

​आज के डिजिटल और दिखावे के दौर में किसी नई किताब का आना अब केवल एक बौद्धिक या साहित्यिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह एक भव्य 'इवेंट' बन चुका है। मंच सजते हैं, कुर्सियां लगती हैं, और गंभीर चेहरों का एक ऐसा हुजूम उमड़ता है, जिसे देखकर लगता है कि ज्ञान का कोई नया सूरज उगने वाला है। लेकिन इस पूरे तमाशे की ज़मीनी हकीकत वही है जिसे एक कवि ने बेहद खूबसूरती से उकेरा है: "साहित्य के ठेकेदार सब लाइन में खड़े हैं, जो कभी नहीं पढ़ते, वो सबसे आगे अड़े हैं।"

​समारोह का सबसे दिलचस्प हिस्सा होते हैं—मुख्य अतिथि। मुख्य अतिथि महोदय के पास समय की भारी कमी होती है, पर ज्ञान की कोई कमी नहीं होती। वे चमचमाती किताब पर बंधा लाल फीता काटते हैं और किताब को हाथ में लेते ही, बिना एक भी पन्ना पलटे, उसकी गहराइयों पर आधा घंटा बोल जाते हैं।

​"अहा! क्या उपमा है, क्या अद्भुत विन्यास है!" वाले जुमले हवा में तैरने लगते हैं, भले ही मुख्य अतिथि को यह भी न पता हो कि अंदर कविताएं छपी हैं, कहानियां हैं या इतिहास के पन्ने! यह आज के दौर का सबसे बड़ा विरोधाभास है, जहाँ किताब की समीक्षा उसके कवर और लेखक के रसूख को देखकर तय होती है, शब्दों को पढ़कर नहीं।

​लेखक महोदय का गर्व से फूलना स्वाभाविक है, लेकिन उनकी नज़रें पाठकों से ज़्यादा कैमरों और फ्लैशलाइट्स पर टिकी होती हैं। फोटोग्राफर के निर्देश आते हैं—"सर, ज़रा किताब को चेहरे के पास लाइए... हां, ज़रा सोशल मीडिया वाली मुस्कान दिखाइए!"

​जैसे ही फ्लैश चमकता है और तालियां बजती हैं, लोकार्पण की रस्म तो पूरी हो जाती है, लेकिन ठीक उसी पल लेखक और पाठक के बीच की दूरी और गहरी हो जाती है। मंच से बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं कि यह कृति 'युगपरिवर्तित' है, समाज को बदल देगी, लेकिन भीतर से सब जानते हैं कि यह सिर्फ एक रस्म की आवृत्ति मात्र है।

​समारोह का असली अंत तब होता है जब गंभीर विमर्श खत्म होता है और 'चाय-समोसे' का दौर शुरू होता है। असल में, कई महानुभावों के लिए आयोजन का असली मज़ा इसी सत्र में छिपा होता है। इसके बाद शुरू होता है किताबों के बंटने का सिलसिला। कुछ मुफ्त में बांटी जाती हैं, कुछ ससम्मान भेंट की जाती हैं और एक काउंटर लगाकर किताब खरीदने के लिए आग्रह भी किया जाता है। कुछ लोग लज्जा बस खरीदते भी है और कुछ लोग धीरे-धीरे नैपकिन से हाथ पहुंचते रहते हैं

लेकिन इस भव्यता का असली क्लाइमेक्स विदाई के वक्त दिखता है जब कोई उस 'युगपरिवर्तित' कृति को गाड़ी की डिक्की में डाल रहा होता है।
तो कोई समोसे खाते हुए उसके कीमती कवर पर तेल के निशान छोड़ रहा होता है।

​लेखक जी के फेसबुक या इंस्टाग्राम पर सौ-दो सौ लाइक्स आ जाते हैं, वे बिना पढ़े ही साहित्य जगत पर 'छा' जाते हैं, और वह बेचारी किताब अलमारी के किसी अंधेरे कोने में जाकर सो जाती है।

​साहित्य की एक और 'क्रांति' औपचारिकता की भेंट चढ़कर दम तोड़ देती है। आज के साहित्यिक आयोजनों को देखकर मन में बस एक ही सवाल कौंधता है, जिसे शब्दों में कुछ इस तरह पिरोया जा सकता है:

             ​लोकार्पण के मंच पर, हुई बहुत तारीफ,
           मंच पर बैठे थे जितने, सब दिख रहे शरीफ।
           तस्वीरें तो खिंच गईं, पर एक सवाल बाकी है,
क्या किताब भी पढ़ेगा कोई, या बस चाय-समोसा ही काफी है?

​जब तक हम किताबों को सेल्फी और समोसों से आज़ाद करके 'पढ़ने' की संस्कृति की तरफ वापस नहीं लौटेंगे, तब तक लोकार्पण सिर्फ एक तमाशा बनकर रह जाएंगे और शब्द अलमारियों में सिसकते रहेंगे।

 

गुड्डू अनिल 
रांची (झारखंड) 

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Edited By: Mohit Sinha
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Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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