चाईबासा में DMFT फंड के पैसे को हेमंत सरकार ने लुटवा दिया: बाबूलाल मरांडी
तीन दिवसीय पश्चिमी सिंहभूम दौरे में विकास कार्यों पर उठाए सवाल
पश्चिमी सिंहभूम दौरे पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने चाईबासा में डीएमएफटी फंड के उपयोग पर गंभीर सवाल उठाते हुए हेमंत सोरेन सरकार पर फंड की बंदरबांट और लूट का आरोप लगाया।
चाईबासा: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि जिस उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डीएमएफटी (DMFT) फंड की व्यवस्था की थी, चाईबासा जिले में उस फंड का लाभ खदान प्रभावित क्षेत्रों के लोगों तक पहुंचता नहीं दिख रहा है। राज्य सरकार और प्रशासन के संरक्षण में इस फंड की केवल बंदरबांट और लूट हुई है।
मरांडी ने कहा कि उन्होंने तीन दिनों तक इस क्षेत्र का दौरा किया और लोगों से विस्तारपूर्वक जमीनी हकीकत जानने का प्रयास किया। सामने आई तस्वीर भयावह और पीड़ादायक है। उन्होंने आरोप लगाया कि आज झारखंड, विशेषकर कोल्हान क्षेत्र में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के लिए पूरी तरह हेमंत सोरेन सरकार जिम्मेदार है। यहां मंत्री और प्रशासन जनता की चिंता छोड़ अपनी तिजोरी भरने में लगे हैं।


मरांडी ने कहा कि चाईबासा जिले को पिछले 10 वर्षों में डीएमएफटी फंड के तहत 3,742.15 करोड़ रुपये मिले। आश्चर्यजनक बात यह है कि सरकार 75.68 प्रतिशत राशि खर्च कर चुकी है, फिर भी प्रभावित क्षेत्रों की बुनियादी समस्याएं जस की तस हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि हेमंत सरकार ने इस फंड का पैसा लुटा दिया, जो एक प्रकार का आर्थिक अपराध है।
उन्होंने कहा कि खर्च की गई राशि का पूरा विवरण डीएमएफटी पोर्टल पर अपलोड किया जाना चाहिए था, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और आम लोग भी जान सकें कि राशि उनके हित में खर्च हुई या नहीं। लेकिन राज्य सरकार ने खर्च का ब्यौरा पोर्टल पर नहीं डाला। उन्होंने पत्रकारों से भी अपील की कि वे मामले की तहकीकात करें और संबंधित अधिकारियों से पूछें कि खर्च का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।
मरांडी ने कहा कि देशभर में 434 खदानों की नीलामी हुई है, जबकि झारखंड में केवल तीन खदानों का ही ऑक्शन हुआ और वह भी भारत सरकार द्वारा कराया गया। राज्य सरकार ने एक भी खदान की नीलामी नहीं की। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार समय पर नीलामी करती, तो युवाओं और मजदूरों का पलायन नहीं होता। रोजगार के अभाव में छोटे-छोटे बच्चे तक पलायन को मजबूर हैं और अनेक खदानें वर्षों से बंद पड़ी हैं।
उन्होंने कहा कि पड़ोसी राज्य ओडिशा में 45 कोल एवं नॉन-कोल ब्लॉकों की नीलामी हुई, जिनमें अधिकांश लौह अयस्क (आयरन ओर) की खदानें हैं। इसका लाभ ओडिशा को मिला। वर्ष 2025-26 में झारखंड को खनिज रॉयल्टी से जहां 22,000 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, वहीं ओडिशा को 46,000 करोड़ रुपये मिले। उन्होंने कहा कि झारखंड के पास देश का लगभग 40 प्रतिशत खनिज भंडार है, जबकि ओडिशा के पास केवल 17 प्रतिशत। इसके बावजूद झारखंड पिछड़ रहा है, जो चिंताजनक और शर्मनाक स्थिति है।
उन्होंने कहा कि राज्य के वित्त मंत्री ने ओडिशा की व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए टीम भेजने की बात कही थी। मरांडी ने कहा कि सरकार को ओडिशा जाने की जरूरत नहीं है, वह उनसे पूछे तो वे बता देंगे कि राजस्व कैसे बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने झारखंड सरकार के विदेश दौरों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि निवेश के नाम पर लगातार विदेश यात्राएं की जा रही हैं और बड़े-बड़े एमओयू पर हस्ताक्षर हो रहे हैं, लेकिन उनका जमीनी लाभ कहीं दिखाई नहीं देता।
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पश्चिमी सिंहभूम प्रवास के दौरान उन्होंने खदान एवं औद्योगिक क्षेत्रों का दौरा कर वास्तविक स्थिति देखी। लंबे समय बाद इस क्षेत्र के भ्रमण पर आए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ यहां के लोगों तक पहुंचा होगा और हालात बदले होंगे, लेकिन ऐसा नहीं मिला।
उन्होंने कहा कि आज भी पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बेहद खराब है। खदान प्रभावित क्षेत्रों के लोग आज भी नदी, नाले और डोभा का पानी पीने को मजबूर हैं। उन्हें समय पर इलाज नहीं मिल रहा है, विद्यालय भवन जर्जर हैं, शिक्षकों की कमी है और कई गांवों में सड़क नहीं होने के कारण बीमार लोगों को आज भी खाट पर उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है।
इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, पूर्व सांसद गीता कोड़ा, पूर्व मंत्री बड़कुंवर गगराई, पूर्व प्रदेश प्रवक्ता जेबी तुबिद, प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय शर्मा सहित अन्य नेता उपस्थित थे।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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