हजारीबाग रोड स्टेशन की बदहाली पर सवाल, कभी जिले की लाइफलाइन था यह ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन
BSF कैंप और RMS हटने से कम हुआ महत्व
हजारीबाग रोड रेलवे स्टेशन, जो कभी पूरे हजारीबाग जिले की लाइफलाइन माना जाता था, आज अपनी बदहाली और उपेक्षा को लेकर चर्चा में है। एक समय अधिकांश प्रमुख ट्रेनों का ठहराव, BSF कैंप, रेलवे मेल सर्विस (RMS) और हजारीबाग टाउन के लिए बस सेवाओं का मुख्य केंद्र रहे इस स्टेशन का महत्व समय के साथ कम होता गया।
आसिफ अंसारी की कलम से...
गिरिडीह: इतिहास गवाह है कि वक्त का पहिया जब घूमता है, तो बड़े-बड़े रसूखदार भी हाशिए पर आ जाते हैं। कुछ ऐसा ही दर्दनाक मंजर आज हजारीबाग रोड रेलवे स्टेशन का है। आज की नई पीढ़ी शायद इस सच से वाकिफ न हो, लेकिन आज़ादी के बाद के दशकों में यह स्टेशन सिर्फ एक रेलवे स्टॉपेज नहीं, बल्कि पूरे हजारीबाग जिले की धड़कन हुआ करता था।

आज दर्जनों एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनें यहाँ से पटरियों को थरथराती हुई गुजर तो जाती हैं, लेकिन यहाँ रुकना गवारा नहीं करतीं। इस ऐतिहासिक स्टेशन के 'आबाद' से 'बर्बाद' होने की कहानी व्यवस्था के खोखलेपन और राजनीतिक उदासीनता का जीता-जागता सबूत है। जब यहाँ धड़कती थी हजारीबाग की 'रौनक'

स्टेशन के बाहर राज्य सरकार की बसें हर वक्त मुस्तैद रहती थीं। जैसे ही कोई ट्रेन रुकती, बसों का काफिला यात्रियों को लेकर सीधे हजारीबाग टाउन के लिए रवाना हो जाता था। प्लेटफार्म नंबर दो पर कभी BSF का बाकायदा कैंप हुआ करता था। मेरु कैंप के लिए सेना की गाड़ियों और जवानों की 24 घंटे आवाजाही रहती थी।
डाक विभाग के रेलवे मेल सर्विस (RMS) का यहाँ होना इस स्टेशन के रसूख को दर्शाता था।
वीआईपी राजधानी एक्सप्रेस को छोड़कर देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण ट्रेनें यहाँ ससम्मान रुकती थीं। आज प्लेटफार्म नंबर दो से BSF कैंप और RMS जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएं उठकर कोडरमा चली गईं। यह इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की सबसे बड़ी कमजोरी और विफलता को दर्शाता है। पड़ोसियों का विकास और हजारीबाग रोड की उपेक्षा समय बदला, समीकरण बदले, लेकिन इस स्टेशन की किस्मत सुधरने की बजाय बदतर होती गई। एक तरफ पारसनाथ (इसरी बाजार) और दूसरी तरफ कोडरमा स्टेशन का तेजी से आधुनिकीकरण और विकास हुआ। पड़ोसी स्टेशनों का आगे बढ़ना वक्त की मांग थी, लेकिन हजारीबाग रोड स्टेशन के पिछड़ने की सबसे बड़ी वजह बनी स्थानीय जनप्रतिनिधियों की घोर उदासीनता। जब पड़ोसी स्टेशन नई ऊंचाइयों को छू रहे थे, तब यहाँ के नेताओं ने इस ऐतिहासिक धरोहर की सुध लेना भी मुनासिब नहीं समझा।
जनता आखिर कब तक खामोश रहती? हाल के दिनों में स्थानीय स्तर पर हुए कड़े आंदोलनों और जनता के भारी आक्रोश के बाद रेल प्रशासन की नींद थोड़ी खुली है। आनन-फानन में कुछ ट्रेनों का ठहराव यहाँ दोबारा शुरू तो किया गया है, लेकिन क्षेत्र की विशाल आबादी और जरूरतों को देखते हुए इसे ऊंट के मुंह में जीरा ही कहा जाएगा। इलाके के यात्रियों, छात्रों और छोटे व्यापारियों की कुछ बुनियादी मांगें आज भी जस की तस हैं, जिन पर रेलवे बोर्ड कान बंद किए बैठा है।
धनबाद से मुंबई के लिए सीधी एक्सप्रेस ट्रेन जिससे मुंबई के आर्थिक राजधानी से सीधा जुड़ाव होगा, महानगरों के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। |
धनबाद-कोडरमा नई पैसेंजर ट्रेन स्थानीय दैनिक यात्रियों और छोटे व्यापारियों को रोज़गार और सफर में बड़ी सहूलियत मिलेगी। |
हजारीबाग रोड रेलवे स्टेशन सिर्फ लोहे की पटरियों का एक हिस्सा नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और लाखों लोगों की उम्मीदों का केंद्र है। अगर अब भी हमारे जनप्रतिनिधि अपनी गहरी नींद से नहीं जागे, तो यह गौरवशाली स्टेशन सिर्फ एक 'गुजरने का रास्ता' (थ्रू-वे) बनकर रह जाएगा। वक्त आ गया है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस स्टेशन को इसका पुराना गौरव वापस लौटाया जाए।
Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.


