Giridih News: जियो-टैगिंग के एक साल बाद भी नहीं मिला आवास, 10 हजार रुपये मांगने का आरोप
राशि नहीं देने पर लाभुक सूची से नाम हटाने का लगाया आरोप
गिरिडीह जिले के गावां प्रखंड स्थित सिजुवाई गांव के एक आदिवासी परिवार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गंभीर अनियमितता का आरोप लगाया है। परिवार का कहना है कि एक वर्ष पहले जियो-टैगिंग होने के बावजूद उन्हें आवास नहीं मिला। आरोप है कि पंचायत मुखिया ने 10 हजार रुपये की मांग की और राशि नहीं देने पर उनका नाम लाभुक सूची से हटा दिया गया।
गिरिडीह: सरकार भले ही गरीब और आवासहीन परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन गावां प्रखंड के सुदूरवर्ती सिजुवाई गांव में रहने वाले एक आदिवासी परिवार की शिकायत इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है। परिवार का आरोप है कि लगभग एक वर्ष पूर्व जियो-टैगिंग होने के बावजूद उन्हें आवास का लाभ नहीं मिला और बाद में पंचायत के मुखिया द्वारा 10 हजार रुपये की मांग की गई। राशि नहीं देने पर उनका नाम लाभुक सूची से हटा दिया गया।
सिजुवाई गांव निवासी रामचंद्र बेसरा का परिवार आज भी जर्जर मिट्टी के मकान में रहने को विवश है। परिवार के छह सदस्य एक ही कच्चे घर में जीवनयापन कर रहे हैं। बरसात के दिनों में टपकती छत और कमजोर दीवारें उनकी परेशानी को और बढ़ा देती हैं। ऐसे में पक्के घर का सपना उनके लिए आज भी अधूरा बना हुआ है।



वार्ड सदस्य मंजू बेसरा ने भी परिवार की दयनीय स्थिति की पुष्टि करते हुए कहा कि लाभुक का जियो-टैगिंग काफी पहले हो चुका था, लेकिन आज तक उन्हें आवास का लाभ नहीं मिल पाया है और बार बार मुखिया को कहने के बाद भी मुखिया इस मामले में को सार्थक पहल नहीं कर रहे हैं। उन्होंने मामले की जांच कर पात्र परिवार को न्याय दिलाने की मांग की।
विडंबना यह है कि जिस राज्य और विधानसभा क्षेत्र का नेतृत्व स्वयं आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों के हाथों में है, वहीं एक गरीब आदिवासी परिवार आज भी सुरक्षित आशियाने के लिए तरस रहा है। यह स्थिति योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और पंचायत स्तर की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
मामले में पंचायत सचिव ने कहा कि संबंधित परिवार को आवास की स्वीकृति मिली है या नहीं, इसकी जानकारी फिलहाल उनके पास नहीं है। उन्होंने कहा कि मामले की जानकारी लेकर ही कुछ स्पष्ट बता पाएंगे।
उधर, आरोपों के संबंध में पंचायत के मुखिया से उनका पक्ष जानने के लिए फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। इसलिए इस संबंध में उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि लाभुक का जियो-टैगिंग एक वर्ष पूर्व हो चुका था, तो उसका नाम सूची से कैसे हट गया? और यदि 10 हजार रुपये मांगने के आरोपों में सच्चाई है, तो यह गरीबों के लिए संचालित कल्याणकारी योजनाओं की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.
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