आखिर क्यों बदले गए तीन जिलों के उपायुक्त?
गढ़वा, देवघर और खूंटी के डीसी बदलने से प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज
झारखंड में हाल के दिनों में बड़े पैमाने पर हो रही ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सवाल उठने लगे हैं। गढ़वा, देवघर और खूंटी के डीसी को एक महीने के भीतर बदले जाने से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। लेख में दावा किया गया है कि बिना स्पष्ट कारण अधिकारियों को हटाने से उनके मनोबल पर असर पड़ता है और विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
सुनील सिंह
झारखंड में पिछले कुछ दिनों से बड़े पैमाने पर अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग हो रही है। ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर कुछ कायदे-कानून हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है। सरकार अपने हिसाब से ट्रांसफर-पोस्टिंग कर रही है। जब नियमों का पालन नहीं होगा, तो सवाल उठेंगे — सरकार की कार्यशैली, मनमानी और अधिकारियों की कार्यक्षमता पर भी।

गढ़वा जिले के लोग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि डीसी बदल दिए गए। जनप्रतिनिधियों से भी जानकारी ली जा रही है कि कहीं किसी विधायक ने तो ट्रांसफर नहीं कराया। लेकिन ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है। किसी विधायक को भी ट्रांसफर के बारे में सही जानकारी नहीं है। न ही किसी ने मुख्यमंत्री से मित्तल की शिकायत की थी। मित्तल तो अभी पूरी तरह लोगों को जान-समझ भी नहीं पाए थे, लेकिन उन्हें हटा दिया गया। अब उनके हटाए जाने पर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। गढ़वा से लेकर रांची तक वजह की तलाश हो रही है। पत्रकारों से भी कारण पूछा जा रहा है। देवघर और खूंटी जिले के लोग भी हैरान हैं।
झारखंड में ट्रांसफर-पोस्टिंग को एक उद्योग और कमाई का जरिया माना जाने लगा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग कैसे होती है। हर सरकार में एक नेटवर्क तैयार हो जाता है। लक्ष्मी की कृपा ही सब कुछ तय करती है। ऐसे लोग जिलों में जाते हैं तो उनका उद्देश्य अपने कार्यों से अधिक धन कमाने में रहता है।
अभी दो-तीन दिन पहले एक बड़े ठेकेदार से बात हो रही थी। उस ठेकेदार को सड़क निर्माण का काम मिला है। वह बता रहे थे कि एक जिले के कुछ बड़े अधिकारियों की इतनी बड़ी डिमांड है कि उसे पूरा करना संभव नहीं है। इसलिए काम रुका हुआ है।
लगातार और बिना वजह ट्रांसफर-पोस्टिंग से अधिकारियों का मनोबल गिरता है। जिन जिलों के डीसी एक महीने के अंदर हटा दिए गए, उनकी मनोदशा क्या होगी, यह समझा जा सकता है। क्या वे अक्षम हैं? यदि अक्षम हैं, तो सरकार ने उनकी पोस्टिंग क्यों की? क्या सरकार को इन अधिकारियों के संबंध में जानकारी नहीं थी? बिना जाने ही जिलों की कमान दे दी गई?
झारखंड को अगर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना है, तो अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में पारदर्शिता बरतनी होगी। अच्छे अधिकारियों को आगे लाना होगा। तभी विकास होगा, नहीं तो सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा जैसा अभी चल रहा है। सरकार को इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए। झारखंड में काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल गिरा हुआ है और धन कमाने वालों का मनोबल ऊंचा है। ऐसे में भ्रष्टाचार मुक्त शासन की कल्पना कैसे की जा सकती है? यह एक बड़ा सवाल है।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
