उपेक्षा का शिकार हो रही साहिबगंज की 16वीं सदी की धरोहर, लोगों ने सरकार से मांगा तुरंत संरक्षण

16वीं-17वीं सदी की ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा से जर्जर

उपेक्षा का शिकार हो रही साहिबगंज की 16वीं सदी की धरोहर, लोगों ने सरकार से मांगा तुरंत संरक्षण
उपेक्षा के कारण जर्जर होती साहिबगंज की ऐतिहासिक धरोहर तेलियागढ़ी किला।

झारखंड के साहिबगंज स्थित ऐतिहासिक तेलियागढ़ी किला, जिसे कभी 'गेटवे ऑफ बंगाल' के नाम से जाना जाता था, आज उपेक्षा का शिकार होकर खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। सदियों पुरानी इस धरोहर की दीवारें जर्जर हो चुकी हैं और चारों ओर झाड़ियां उग आई हैं।

साहिबगंज: झारखंड के साहिबगंज जिले की शान और ऐतिहासिक पहचान कहे जाने वाला तेलियागढ़ी किला आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी मुगलों और अंग्रेजों के बीच "गेटवे ऑफ बंगाल" के नाम से मशहूर यह किला अब उपेक्षा के कारण धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है।

16वीं सदी का यह किला सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है। यह साहिबगंज की संस्कृति, गौरव और संघर्ष की जीवंत कहानी है। राजमहल की पहाड़ियों और गंगा के बीच स्थित होने के कारण यह सदियों तक बंगाल-बिहार सीमा की सुरक्षा की ढाल बना रहा।  

इतिहासकारों के अनुसार, झारखंड के साहिबगंज जिले में स्थित ऐतिहासिक तेलियागढ़ी किला मुख्य रूप से 17वीं शताब्दी का माना जाता है। इसे 'बंगाल का प्रवेश द्वार' भी कहा जाता है। हालाँकि, इस स्थान का इतिहास और अस्तित्व मौर्य काल से जुड़ा हुआ है। इस दर्रे और किले का इस्तेमाल 13वीं शताब्दी से ही उत्तर भारत से बंगाल जाने वाली मुस्लिम सेनाओं द्वारा मुख्य प्रवेश द्वार के रूप में किया जाता था।    
माना जाता है कि इस किले का निर्माण मुगल काल के दौरान शाहजहाँ के शासनकाल में इस्लाम धर्म अपनाने वाले एक तेली जमींदार द्वारा कराया गया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग और फ्रांसीसी यात्री फ्रांसिस बुकानन ने भी अपनी यात्राओं में इसका उल्लेख किया है। वर्तमान में यह स्थान एक प्रमुख पुरातात्विक और ऐतिहासिक धरोहर है। अंग्रेजी राज में इसे सबसे मजबूत सुरक्षा चौकी माना जाता था। इसी किले ने भारत के नक्शे को बदलने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन आज हालात उल्टे हैं।     

तस्वीरों में देखा जा सकता है कि यह किला पूरी तरह हरियाली और जंगली बेलों से ढका दिख रहा है। टूटी-फूटी दीवारें, उखड़ते बुर्ज, दरारों से भरे गेट और चारों ओर उगी घनी झाड़ियां चीख-चीख कर किले की बदहाली बयां कर रही हैं। साहिबगंज आने-जाने वाले हजारों यात्री इसे देखते हैं, पर इस विरासत को संवारने वाला कोई नहीं।  

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 साफ-सफाई का अभाव और रख-रखाव न होने के कारण किले की खूबसूरती धुंधली पड़ गई है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि समय रहते जीर्णोद्धार नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियां इसे सिर्फ किताबों और सोशल मीडिया में ही देख पाएंगी।  

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शहर के शिक्षाविदों ने बताया यह किला हमारे पुरखों की विरासत है, इसे खंडहर नहीं बनने देंगे। गर्व है हमें अपने साहिबगंज और तेलियागढ़ी किले पर। उपेक्षा से आहत नागरिकों ने जिला प्रशासन, सरकार व पुरातत्व विभाग से किले को अविलंब एएसआई का संरक्षित स्मारक घोषित करने, वैज्ञानिक सर्वे और जीर्णोद्धार, 24x7 सुरक्षा शुरू करने की मांग की है।     

साथ ही किले के चारों ओर बफर जोन बनाकर अतिक्रमण और जंगल पर रोक लगाने, इसे "राजमहल-तेलियागढ़ी-गंगा तट" पर्यटन सर्किट से जोड़ने, लाइट एंड साउंड शो, व्यू पॉइंट, गाइड प्रशिक्षण, रोप-वे, शौचालय और पेयजल की व्यवस्था करने, किले तक पक्का रास्ता, सोलर लाइट, सूचना पट्ट, नियमित सफाई, सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, हर महीने जिला प्रशासन द्वारा मॉनिटरिंग करने की भी मांग की।    
नागरिकों का कहना है कि "विरासत बचाओ" के नारे हर मंच पर गूंजते हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और है। जिस किले ने देश की हिफाजत की, आज वह खुद संरक्षण का मोहताज है। लोगों का सीधा सवाल है कि क्या सिर्फ कहने से गर्व जिंदा रहेगा? या तो हम अभी जागें, या फिर आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेंगी। तेलियागढ़ी किले को बचाना सिर्फ साहिबगंज की नहीं, बल्कि पूरे झारखंड और देश की सामूहिक जिम्मेदारी है। अब देखना होगा कि प्रशासन और सरकार इस ऐतिहासिक धरोहर को खंडहर बनने से पहले बचाने के लिए कब और क्या पहल करती है?

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Edited By: Mohit Sinha
Susmita Rani Picture

Susmita Rani is a journalist and content writer associated with Samridh Jharkhand. She regularly writes and reports on grassroots news from Jharkhand, covering social issues, agriculture, administration, public concerns, and daily horoscopes. Her writing focuses on factual accuracy, clarity, and public interest.

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