सुकुमार को श्रद्धांजलि, कलाकारों और साहित्यकारों के लिए कल्याण कोष बनाने की मांग

स्व. सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि

सुकुमार को श्रद्धांजलि, कलाकारों और साहित्यकारों के लिए कल्याण कोष बनाने की मांग
स्व. सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ (फाइल फोटो)

रांची स्थित छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ कार्यालय में खोरठा साहित्यकार एवं लोक कलाकार स्व. सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। कार्यक्रम में झारखंड के साहित्यकारों और कलाकारों की उपेक्षा पर चिंता जताई गई।

रांची: छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ कार्यालय, रांची में शनिवार को खोरठा भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, लोक कलाकार एवं स्वर कोकिल स्वर्गीय सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने झारखंड के साहित्यकारों और कलाकारों की उपेक्षा पर चिंता जताते हुए राज्य में “झारखंड साहित्यकार एवं कलाकार कल्याण कोष” की स्थापना की मांग उठाई।

संस्था की सचिव डॉ. सचि कुमारी ने कहा कि झारखंड राज्य की मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा आंदोलन था। राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में साहित्यकारों, कलाकारों और सांस्कृतिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके बावजूद जीवनभर समाज और संस्कृति की सेवा करने वाले रचनाकारों को अंतिम समय में आर्थिक संकट, असुरक्षा और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि डॉ. रामदयाल मुंडा के निकट सहयोगी रहे डॉ. विशेश्वर प्रसाद केशरी को आज तक उचित सम्मान नहीं मिल सका, जबकि डॉ. गिरधारी राम गौंझू को कोविड काल में अस्पताल में बेड तक उपलब्ध नहीं हो पाया। उनका अंतिम संस्कार भी उपेक्षा के माहौल में हुआ।

डॉ. सचि कुमारी ने कहा कि स्वर्गीय सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ का जीवन भी इसी पीड़ा का प्रतीक बन गया। झारखंड की मिट्टी की खुशबू को अपने गीतों में पिरोने वाले सुकुमार ने खोरठा भाषा और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। उनकी रचनाएं आज विश्वविद्यालयों में अध्ययन का विषय हैं, लेकिन गंभीर बीमारी के दौरान उन्हें समुचित इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ा।

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उन्होंने कहा कि “मांदर बाजे रे” और “मांय गो मांय” जैसे लोकप्रिय गीतों के रचयिता सुकुमार ने केवल गीत नहीं लिखे, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक चेतना को स्वर दिया। उनकी रचनाओं ने नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार को साहित्यकारों और कलाकारों के लिए स्वास्थ्य बीमा, आपातकालीन चिकित्सा सहायता, मासिक सम्मान राशि, पेंशन एवं पारिवारिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं के साथ एक स्थायी कल्याण कोष का गठन करना चाहिए। साथ ही, डॉ. बी.पी. केशरी द्वारा तैयार साहित्यकारों और कलाकारों के डेटाबेस को अद्यतन कर जरूरतमंदों तक तत्काल सहायता पहुंचाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

सभा में वक्ताओं ने कहा कि यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज का भी नैतिक दायित्व है। यदि समय रहते साहित्यकारों और लोक कलाकारों की सुरक्षा और सम्मान के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कला और संस्कृति की मूल आत्मा कमजोर पड़ जाएगी।

अंत में उपस्थित लोगों ने स्वर्गीय सुकुमार सहित झारखंड की सांस्कृतिक चेतना को समर्पित सभी विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी विरासत को सहेजने का संकल्प लिया।

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Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha Picture

Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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