Palamu News: पारंपरिक आंदोलन से जेन-जी तक: मेदिनीनगर में संघर्ष के बदलते तौर-तरीकों पर संवाद
इप्टा की सांस्कृतिक पाठशाला की 101वीं कड़ी में आदिवासी संघर्ष और आंदोलन के बदलते तरीकों पर विचार-विमर्श।
मेदिनीनगर, पलामू में विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर इप्टा की सांस्कृतिक पाठशाला की 101वीं कड़ी आदिवासी संघर्षों को समर्पित रही। इस दौरान ‘पारंपरिक आंदोलन बनाम जेन-जी आंदोलन’ विषय पर संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने आंदोलनों के बदलते स्वरूप, सूचना तकनीक, युवाओं की भागीदारी और संघर्ष की नई रणनीतियों पर चर्चा की।
पलामू : मेदिनीनगर विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर इप्टा की ओर से संचालित सांस्कृतिक पाठशाला की 101वीं कड़ी आदिवासियों के संघर्ष को समर्पित रही। इस अवसर पर ‘पारंपरिक आंदोलन बनाम जेन-जी आंदोलन’ विषय पर संवाद आयोजित किया गया। अध्यक्षता इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश सिंह एवं घनश्याम ने संयुक्त रूप से की।
अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव केडी सिंह ने आदिवासी संघर्षों को याद करते हुए कहा कि आदिवासियों ने लंबे संघर्ष के जरिए जो अधिकार हासिल किए थे, आज भी उन्हें उनका पूरा अधिकार नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि प्रशासन झूठ बोल रहा है और यही जेन-जी आंदोलन का भी सवाल है। उन्होंने कहा कि आज जेन-जी के आंदोलन को समझने की जरूरत है। पारंपरिक आंदोलनों से भी बहुत कुछ हासिल हुआ है, लेकिन जेन-जी आंदोलन ने ऐसे मुद्दों को राजनीति के केंद्र में ला दिया है, जिन पर पहले राजनीतिक रूप से बात नहीं होती थी।

संवाद में गोविंद प्रसाद, मुन्ना सिंह, कुलदीप राम सहित अन्य लोगों ने भी अपने विचार रखे। अंत में सुरेश सिंह ने आदिवासी संघर्षों के शहीदों को याद करते हुए कहा कि परिस्थितियां ही आंदोलन की रूपरेखा तय करती हैं। उन्होंने कहा कि जेन-जी आंदोलन में नौजवानों की भागीदारी देखने को मिली है। जो युवा आंदोलन से कट गए थे और दूसरी विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार में लगे थे, जेन-जी आंदोलन ने उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर खींचा है। धन्यवाद ज्ञापन के साथ संवाद का समापन हुआ।
मौके पर रवि शंकर, विजेता नंद तिवारी, संजीव कुमार संजू, शशि पांडे, अजीत कुमार, सहित अन्य लोग उपस्थित थे।
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