आग उगलते देखा है! — देशभक्ति से ओतप्रोत कविता
मिट्टी और मातृभूमि के सम्मान की पुकार
“आग उगलते देखा है” एक सशक्त कविता है जो समाज, देश और बदलते इतिहास की पीड़ा व चेतना को उजागर करती है। कवि ने मिट्टी, संघर्ष और जनमानस की ताकत को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। कविता बताती है कि समय आने पर शांत दिखने वाली शक्तियां भी परिवर्तन की ज्वाला बन सकती हैं।
तुमने क्या इस जीवन में
इतिहास बदलते देखा है
मैंने तो हिमखंडों को भी
आग उगलते देखा है!

कहते हो कि दाग लगा है
इस मिट्टी से हर मिट्टी के
दाग को धुलते देखा है!
मैंने तो हिमखंडों को भी
आग उगलते देखा है!
दीवारों से जाकर पूछो
उनको सब कुछ याद यहां
उनके सीने में भी मैंने
आग सुलगते देखा है!
मैंने तो हिमखंडों को भी
आग उगलते देखा है!
जिस पर देना ध्यान जिसे
ध्यान कहां दे पाता है
माली के रहते भी मैंने
बाग उजड़ते देखा है!
मैंने तो हिमखंडों को भी
आग उगलते देखा है!
नींव नहीं कमजोर
हिला कर कोई रख दे
यहां के इक-इक बच्चे को
नाग कुचलते देखा है!
मैंने तो हिमखंडों को भी
आग उगलते देखा है!
कवि : राजेश पाठक
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
