उल्टी चाल चलती दुनिया! क्या हम पर्यावरण की बात करने के अधिकारी भी हैं?
आधुनिक सुविधाओं और बढ़ते उपभोग ने प्रकृति पर बढ़ाया लगातार दबाव
धरती पर बढ़ता पर्यावरणीय संकट केवल सरकारों, उद्योगों या बड़ी कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं है। हमारी अपनी जीवनशैली और लगातार बढ़ता उपभोग भी इस संकट को गहरा कर रहा है। अधिक उत्पादन के लिए अधिक ऊर्जा, अधिक परिवहन और अधिक प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल होता है।
धरती पर एक मनुष्य नाम के एक जीव ने अपने आगमन के पश्चात से जितना उत्पात मचाया हुआ है और उसके चलते धरती दिनों-दिन इतनी बदरंग और नरक होती चली जा रही है कि जिसका कि कोई अंत ही नहीं दिखाई देता!! किंतु हास्यास्पद तो यह है कि मनुष्य नाम के यह जीव लगातार बड़ी अच्छी-अच्छी और प्यारी-प्यारी बातें भी करता है!!
किन्तु अपनी अंतहीन व व्यर्थ की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनुष्य ने पृथ्वी का इतना अंधाधुंध दोहन कर डाला है कि धरती इस कोने से लेकर उस कोने तक न केवल बुरी तरह से घायल हो चुकी है, अपितु मनुष्य की मूर्खताओं के कारण बराबर कलपती दिखाई देती है! परिवर्तित मौसम-चक्र, फसल चक्र, सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, पहाड़ों का धँसना, भूस्खलन, हमारे चारों ओर वातावरण में घुलता कारखानों एवं वाहनों एवं अनेकानेक भांति-भांति के उपकरणों का का जहरीला धुआं!!

और यह समस्त संकट हमारी सुविधा-भोगी मनोवृति के कारण पैदा हुए हैं और आगे और भी अधिक होते जा रहे हैं! तो फिर हममें से जब भी कोई पर्यावरण के संकट का रोना रोता है, उस समय अपने भोलेपन अथवा मासूमियत अथवा अपनी जीवन-शैली के कुल परिणामों का उसे संभवत: तनिक भी ध्यान नहीं होता कि वह स्वयं भी उस पर्यावरणीय संकट का बराबर का हिस्सेदार है! उसकी अगुणवत्ता-पूर्ण जीवन-शैली, उसके द्वारा किए जाने वाले उपभोग की मात्रा, उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली ऊर्जा यह सब कुछ मिलाकर धरती का संकट बढ़ाते जा रहे हैं और उसके शिकार वे लोग भी बनते जा रहे हैं, जो वस्तुतः ऊर्जा का नहीं के बराबर उपयोग करते हैं। जिनके पास ऐसे साधन नहीं है और जो बेहद सादा जीवन व्यतीत करते हैं, वे भी इस कोप के शिकार बन रहे हैं। लेकिन ऐसे लोग पर्यावरण के बारे में कुछ कह नहीं पाते!
मजेदार तथ्य तो यह है कि पर्यावरण के बारे में वही लोग सबसे ज्यादा बात करते हुए पाए जाते हैं, जो सबसे ज्यादा इस संकट के जिम्मेवार हैं! निश्चित तौर पर बड़े-बड़े मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले या दुनिया के पर्यावरणीय संकट पर विचार-विमर्श करने वाले तमाम बड़े-बड़े दिग्गज लोग ही होते हैं! और इनकी स्वयं की जीवन शैली को यदि देखा जाए, तो उनके द्वारा किए जाने वाले तमाम विचार-विमर्श का नैतिक खोखलापन दिखाई देता है! इन समस्त लोगों में राजनीतिक लोग, बड़ी टेक कंपनियों के मालिक, बड़े बड़े बिजनेसमैन एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग शामिल हैं! पर्यावरण के समस्त संकटों के लिए केवल दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हुए, एक-दूसरे पर दोषारोपण करना, किसी भी प्रकार के नियमन को थोपना और दंड का प्रावधान करना, यह भी अपने आप में सबसे बड़ा पाखंड है और शहरीकरण की जद में आए हुए हम वे समस्त लोग भी, जो अपनी जीवन-शैली में तरह-तरह के उपकरणों का उपयोग करते हुए उनके अत्यधिक उत्पादन को बढ़ावा देते हैं और साथ ही ऊर्जा को भी नष्ट करते हैं!
और तो और, इसमें हमारी देर रात तक जगने और देर सुबह जागने की प्रवृतियां भी शामिल है! किंतु इस दिशा में आशा की कोई किरण इसलिए भी नहीं दिखाई देती, क्योंकि धरती के समस्त संकटों के प्रति जागरूक लोगों की जीवनशैली भी उसी भांति की है, जिसने धरती को संकट में डाला है!! इसलिए इस विराट संकट का आने वाले दिनों में कोई समाधान दिखाई नहीं देता! इस नेगेटिव बात के गहरे अर्थ को समझते हुए हम सबको, जो वास्तव में निदान चाहते हैं, अपनी जीवन शैली में बिल्कुल उलट परिवर्तन लाने होंगे, तब जाकर हम इस विषय पर किसी भी तरह की बातचीत के अधिकारी हो सकते हैं और साथ ही समाधान के वाहक भी !
किंतु वर्तमान समय में सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। भांति-भांति के विज्ञापनों के सहारे विभिन्न कंपनियों द्वारा आम समाज के द्वारा करवाया जा रहा उपभोग, विकास की बातें और उस उपभोग को सुनिश्चित करने के लिए दिया जा रहा कर्ज, कुल मिलाकर इस संभावना को बिल्कुल नष्ट करता है कि भविष्य में पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए सोचे जा रहे विचार और कार्यान्वित किये जा रहे कार्य किसी भी प्रकार से मंगलकारी सिद्ध होंगे ! क्योंकि जो चीज हमारे खुद के कार्यों द्वारा बर्बाद की जाती हो उन्हें उन्हीं कार्यों को ठीक उलट कर ही उस स्थिति वापस ठीक किया जा सकता है।
किंतु पहले पिछड़ेपन से विकास की ओर बढ़ना, फिर विकासशील होना, फिर विकसित होना और अंत में अति विकसित होना इस प्रकार की सोच के साथ तथा वर्तमान जीवन शैली के साथ ही जीते हुए, आधुनिक जीवन की ये समस्त सोच विचार-शैलियां अंततः हमारा कुछ भी भला नहीं कर सकती! पृथ्वी पर जीवन को सुसंगत बनाने के लिए अंततः हममें से प्रत्येक इकाई को निश्चित तौर पर अभी की अभी उस जीवन शैली की ओर प्रवृत्त होना होगा, जहां उपभोग की मात्रा अत्यल्प हो। जहां भव्यता और चकाचौंध की चाहत ना हो। जहां अपने अहंकार की पूर्ति के लिए अनेकानेक और ऊंचे मकानों की आवश्यकता ना हो! कुल मिलाकर एक सादा जीवन और उच्च विचार ही हमारे पर्यावरण और हमारी पृथ्वी को नष्ट होने से बचा सकता है।
राजीव थेपड़ा
रांची, झारखंड
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.


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