हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील

कभी बाढ़ और स्वच्छ जल के लिए प्रसिद्ध थी हरमू, आज सीवेज और कचरे से जूझ रही है

हरमू नदी की दर्दभरी कहानी: कभी जीवनदायिनी, आज गंदे नाले में तब्दील
गंदे नाले में तब्दील हरमू नदी की दर्दभरी तस्वीर (तस्वीर- प्रकाश सहाय के वॉल से)

रांची की ऐतिहासिक हरमू नदी पर आधारित इस विचारोत्तेजक लेख में लेखक अरविंद शर्मा ने नदी की बदहाल स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कभी स्वच्छ जल, बाढ़ और सामाजिक जीवन का केंद्र रही हरमू आज गंदे नाले में बदल चुकी है।

अरविंद शर्मा

बड़े भाई प्रकाश सहाय ने रांची की हरमू नदी की दुर्दशा पर रोते हुए एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन कर दे। उनके बचपन में इस नदी में बाढ़ आती थी, कई मोहल्ले डूब जाते थे। बच्चे इसमें नहाते थे, तैरना सीखते थे और लोग इसे नदी की तरह सम्मान देते थे। आज हालत यह है कि नाक डुबोकर मरने के लिए भी इसमें चुल्लू भर साफ पानी नहीं है। जो बह रहा है, वह आसपास के घरों की नालियों से आने वाला गंदा पानी है। प्लास्टिक और कचरा है। यह केवल एक नदी की नहीं, बल्कि हमारी सोच, हमारी व्यवस्था और हमारी संवेदनहीनता की भी कहानी है।

अगर आप रांची के निवासी हैं या कभी किसी काम से वहां गए होंगे तो जरूर देखा होगा कि रांची में हरमू के नाम पर हरमू रोड है। हरमू कालोनी है और हरमू मुक्ति धाम भी है। लेकिन सच यह भी है कि सबसे अधिक मुक्ति की जरूरत स्वयं हरमू नदी को ही है। यह विडंबना किसी व्यंग्य से कम नहीं है कि जिस नदी के किनारे कभी जीवन बसता था, आज उसी के गंदे पानी के किनारे अंतिम संस्कार होते हैं। हरमू अब नदी नहीं रही। मर गई है। जब नदी नाला बन जाती है तो केवल पानी नहीं मरता, शहर का भविष्य भी मर जाता है। भू-जल शर्म से पाताल में धंस जाता है। गर्मी बढ़ जाती है और फिर पुनर्जीवन के नाम पर करोड़ों रुपये का बंदरबांट होने लगता है। 

1994-95 की बात है। तब मैं रांची विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म कर रहा था। अपने गृह जिला गया से निकलकर पहली बार रांची गया था। इसकी खूबसूरत पहाड़ियों और हरियाली को देखकर स्वर्ग जैसा अहसास होता था। इसमें हरमू नदी की भी बड़ी भूमिका होती थी, क्योंकि यह शहर की प्राकृतिक जल-निकासी व्यवस्था की रीढ़ थी। नगड़ी के पठारी क्षेत्र से निकलने वाली यह नदी लगभग 40 किलोमीटर बहकर चुटिया के पास स्वर्णरेखा नदी में मिलती है। तब इसका पानी स्वच्छ होता था। छठ जैसे पर्वों पर श्रद्धालु इसके तट पर अर्घ्य देने पहुंचते थे। गर्मियों में भी पानी रहता था। बरसात में पानी का बहाव लोगों के लिए रोमांच बन जाता था। आज हल्की बारिश में भी रांची की सड़कें डूब जाती हैं और गर्मियों में पानी के लिए हाहाकार मचता है, तब समझ में आता है कि नदी को मारने की कीमत आखिर कितनी महंगी पड़ रही है।

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इतिहास भी हरमू का महत्व बताता है। वर्ष 1939 में इसी नदी के तट पर आदिवासी महासभा के सम्मेलन में अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित स्वर मिला था। मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व ने यहीं से आंदोलन को नई दिशा दी। जिस नदी ने झारखंड के राजनीतिक इतिहास को सहेजा, उसी नदी को आज हमने गंदे नाले में बदल दिया।

सवाल है कि हरमू की हत्या किसने की? जवाब भी सीधा है-सरकारों ने, प्रशासन ने और हम सबने मिलकर। शहर बढ़ता गया, कॉलोनियां बसती गईं, प्राकृतिक नाले पाट दिए गए, नदी के किनारों पर अतिक्रमण होता गया और घरों का सीवेज सीधे नदी में गिरने लगा। 

प्रकाश सहाय को इस बात पर भी रोना आता है कि हरमू के पुनर्जीवन पर डेढ़ सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। तटबंध बने, पैदल पथ बने, रेलिंग लगी, रंग-रोगन हुआ और तस्वीरें खिंचीं। लेकिन नदी आज भी नाला ही बनी हुई है। क्योंकि नदी का जीवन सीमेंट, टाइल्स और सुंदर लाइटों से नहीं लौटता। उसे जीवित रखने के लिए साफ पानी चाहिए, अविरल प्रवाह चाहिए और अतिक्रमण से मुक्ति चाहिए। यदि सीवेज उसी तरह गिरता रहेगा तो सौंदर्यीकरण सिर्फ सरकारी फाइलों एवं उद्घाटन समारोहों तक ही सीमित रहेगा।

यदि हरमू को बचाना है तो सौंदर्यीकरण से आगे बढ़कर सीवेज को पूरी तरह रोकना होगा। अतिक्रमण हटाना होगा और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र को वापस देना होगा। उतनी ही जिम्मेदारी आम लोगों की भी है। जिस दिन लोग नदी को कूड़ेदान समझना बंद कर देंगे, उसी दिन उसके पुनर्जन्म की शुरुआत होगी। हरमू प्रश्न बनकर खड़ी है-क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को एक जीवित नदी देंगे या केवल उसकी तस्वीर और इतिहास? जवाब सरकार को भी देना है और हम-आपको भी। 

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Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha Picture

Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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