झारखंड के खनिज पर दिल्ली का शिकंजा नहीं चलेगा: विजय शंकर नायक

विजय शंकर नायक ने एमएमडीआर कानून को लेकर केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए

झारखंड के खनिज पर दिल्ली का शिकंजा नहीं चलेगा: विजय शंकर नायक
विजय शंकर नायक (फाइल फोटो)

झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने एमएमडीआर कानून में संशोधन को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि झारखंड की धरती से खनिज निकलते हैं, जबकि विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान का बोझ राज्य को उठाना पड़ता है।

लेखक : विजय शंकर नायक

झारखंड की धरती ने देश को कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम और अनेक खनिज दिए हैं। देश के औद्योगिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा में झारखंड का योगदान असाधारण है। लेकिन विडंबना यह है कि खनिज संपदा की प्रचुरता के बावजूद झारखंड आज भी देश के पिछड़े और गरीब राज्यों में गिना जाता है। खनन के कारण जमीन गई, जंगल उजड़े, नदियां और जलस्रोत प्रभावित हुए, हजारों परिवार विस्थापित हुए और आदिवासी-मूलवासी समाज ने अपनी पारंपरिक आजीविका और सामाजिक संरचना की भारी कीमत चुकाई।

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इसलिए आज जब भाजपा की केंद्र सरकार खनिज और खनन विकास तथा विनियमन अधिनियम में संशोधन के माध्यम से राज्यों द्वारा खनिज-युक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर लगाए जाने वाले नए कर, उपकर और शुल्क पर केंद्रीय नियंत्रण बढ़ा रही है, तब झारखंड की जनता का सवाल बिल्कुल जायज है—

खनिज झारखंड की धरती से निकलेगा, पर्यावरण और विस्थापन का बोझ झारखंड उठाएगा, तो खनिज से मिलने वाले आर्थिक अधिकारों पर दिल्ली का नियंत्रण क्यों?

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केंद्र सरकार इसे एक समान और पूर्वानुमेय खनिज कर व्यवस्था के नाम पर उचित ठहरा रही है। लेकिन कांग्रेस का स्पष्ट मत है कि खनन कंपनियों की लागत को निश्चित करने के लिए राज्यों के राजस्व अधिकारों को अनिश्चित नहीं किया जा सकता। हालिया कानून पर केंद्र का यही तर्क रहा है कि अलग-अलग राज्यों की नई खनिज लेवी से लागत में अंतर और बाजार में असमानता पैदा हो सकती है। दूसरी ओर, विपक्षी राज्य इसे वित्तीय स्वायत्तता पर चोट मान रहे हैं।

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14,656 करोड़ रुपये का सवाल—झारखंड की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव

झारखंड के 2026-27 बजट के आंकड़े बताते हैं कि खनिज-युक्त भूमि उपकर से 14,656 करोड़ रुपये की आय का अनुमान है। 2025-26 में इस मद से अनुमानित आय 13,442 करोड़ रुपये थी। राज्य सरकार ने भविष्य में खनन राजस्व में संभावित कमी से राज्य को बचाने के लिए बजट स्थिरीकरण कोष भी बनाया है।

अब इस आंकड़े को झारखंड की पूरी वित्तीय स्थिति के संदर्भ में देखिए।

2026-27 में झारखंड का अनुमानित स्वयं कर राजस्व 45,999 करोड़ रुपये है। यानी 14,656 करोड़ रुपये का खनिज-युक्त भूमि उपकर अकेले राज्य के अनुमानित स्वयं कर राजस्व के लगभग 32 प्रतिशत के बराबर है।

यह कोई मामूली रकम नहीं है। झारखंड की कुल राजस्व प्राप्तियां 2026-27 में लगभग 1,36,210 करोड़ रुपये अनुमानित हैं। इनमें लगभग 66,699 करोड़ रुपये राज्य के अपने संसाधनों से और 69,511 करोड़ रुपये केंद्र से आने का अनुमान है। अर्थात, खनिज से संबंधित राजस्व में बड़ी गिरावट का असर राज्य के वित्तीय संतुलन पर पड़ना स्वाभाविक है।

तो भाजपा सरकार बताए—यदि झारखंड की खनिज आय पर राज्य की क्षमता सीमित होगी, तो राज्य के विकास की भरपाई कौन करेगा?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी उठाया 7,110 करोड़ रुपये का सवाल

13 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस कानून पर पुनर्विचार की मांग की। उन्होंने खनिज-युक्त भूमि उपकर से झारखंड को लगभग 7,110 करोड़ रुपये वार्षिक संभावित आय का उल्लेख करते हुए राज्य की वित्तीय स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित किया।

यहां दो आंकड़ों को समझना जरूरी है—14,656 करोड़ रुपये झारखंड के 2026-27 बजट में खनिज-युक्त भूमि उपकर से अनुमानित कुल राजस्व है, जबकि 7,110 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री द्वारा केंद्र को बताए गए संभावित वार्षिक राजस्व प्रभाव/आय का आंकड़ा है। दोनों को एक ही चीज बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

लेकिन दोनों आंकड़े एक ही गंभीर वास्तविकता की ओर इशारा करते हैं—झारखंड की वित्तीय व्यवस्था में खनिज राजस्व अत्यंत महत्वपूर्ण है।

नुकसान झारखंड का, सुविधा किसे?

यहां सबसे बड़ा आर्थिक सवाल खड़ा होता है। केंद्र सरकार कह रही है कि राज्यों द्वारा अलग-अलग नई खनिज लेवी लगाने से खनन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और देश में खनिजों की कीमतों में अंतर पैदा हो सकता है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। यदि राज्य सरकारों की नई खनिज लेवी लगाने की क्षमता पर केंद्रीय नियंत्रण बढ़ता है, तो खनन कंपनियों और बड़े निवेशकों के लिए भविष्य की लागत का अनुमान लगाना आसान हो सकता है। नई राज्य-स्तरीय आर्थिक देनदारी अचानक बढ़ने की आशंका कम हो सकती है और लंबी अवधि की खनन परियोजनाओं में लागत की पूर्वानुमेयता बढ़ सकती है। यही इस कानून से मिलने वाला संभावित औद्योगिक लाभ है।

लेकिन कांग्रेस का सवाल है—खनन कंपनियों को लागत की निश्चितता और झारखंड को राजस्व की अनिश्चितता क्यों? क्या यह न्यायपूर्ण संघवाद है? क्या यह सामाजिक न्याय है? क्या यह झारखंड के हितों की रक्षा है?

भाजपा सरकार का खनिज मॉडल—कंपनियों के लिए सुविधा, राज्यों के लिए नियंत्रण?

कांग्रेस किसी उद्योग के खिलाफ नहीं है। हम निवेश के खिलाफ नहीं हैं। हम खनन के खिलाफ नहीं हैं। हम विकास के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन हम उस विकास मॉडल के खिलाफ हैं, जिसमें खनिज झारखंड का हो, जमीन झारखंड की हो, पर्यावरणीय नुकसान झारखंड सहे, विस्थापन झारखंड झेले और आर्थिक फैसले दिल्ली में लिए जाएं।

यदि खनन कंपनियों को लागत में स्थिरता चाहिए, तो उन्हें राज्य के अधिकारों का सम्मान भी करना होगा। यदि केंद्र सरकार निवेश को आकर्षित करना चाहती है, तो वह राज्यों के साथ समझौता करके समान व्यवस्था बनाए, राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता सीमित करके नहीं।

खनिज राजस्व घटा तो नुकसान किसका होगा?

सबसे बड़ा नुकसान झारखंड की आम जनता का होगा। राज्य के पास यदि खनिज से मिलने वाला अतिरिक्त राजस्व कम होता है, तो सरकार की विकास योजनाओं के लिए उपलब्ध वित्तीय गुंजाइश भी प्रभावित हो सकती है।

इसका असर पड़ सकता है—गरीबों के कल्याणकारी कार्यक्रमों पर, ग्रामीण सड़कों पर, पेयजल योजनाओं पर, स्वास्थ्य सुविधाओं पर, विद्यालयों पर, सिंचाई पर, रोजगार और कौशल विकास पर, खनन प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास पर और पर्यावरण संरक्षण पर।

झारखंड की समस्या यह है कि यहां खनिज संपदा बहुत है, लेकिन खनन प्रभावित जनता के जीवन की गुणवत्ता अभी भी उस अनुपात में नहीं सुधरी है। इसलिए खनिज राजस्व राज्य के लिए विलासिता नहीं, बल्कि विकास का महत्वपूर्ण साधन है।

कांग्रेस का सवाल—झारखंड को उसकी खनिज संपदा का न्यायपूर्ण हिस्सा कब मिलेगा?

कांग्रेस की सोच स्पष्ट है। देश के खनिज संसाधन राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि खनिज उत्पादक राज्यों को उनके आर्थिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाए।

भारत का संघीय ढांचा तभी मजबूत होगा, जब दिल्ली और रांची दोनों मजबूत हों। केंद्र मजबूत हो, लेकिन राज्य कमजोर नहीं। उद्योग मजबूत हो, लेकिन स्थानीय जनता गरीब नहीं। खनन कंपनियां लाभ कमाएं, लेकिन खनन प्रभावित परिवार बदहाल नहीं रहें। यही कांग्रेस का मॉडल है।

कांग्रेस का सात सूत्रीय समाधान

पहला—राज्यों के राजस्व अधिकार सुरक्षित हों: खनिज उत्पादक राज्यों को अपनी वित्तीय आवश्यकताओं के अनुसार उचित राजस्व जुटाने की शक्ति मिलनी चाहिए।

दूसरा—राजस्व सुरक्षा की गारंटी: यदि केंद्र किसी राज्य की खनिज-आधारित लेवी लगाने की क्षमता सीमित करता है, तो संभावित राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था हो।

तीसरा—खनिज राजस्व का निश्चित हिस्सा खनन प्रभावित जिलों को: खनिज से मिलने वाले राजस्व का एक निश्चित हिस्सा स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, सड़क, सिंचाई और रोजगार पर खर्च होना चाहिए।

चौथा—स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी: आदिवासी-मूलवासी और स्थानीय युवाओं को खनन परियोजनाओं में रोजगार और व्यवसाय के अवसरों में प्राथमिकता मिले।

पांचवां—पर्यावरण की कीमत कंपनियां चुकाएं: खनन से होने वाली पर्यावरणीय क्षति की वैज्ञानिक गणना हो और उसके पुनर्स्थापन की पूरी जिम्मेदारी खनन कंपनियों की हो।

छठा—केंद्र-राज्य संयुक्त खनिज परिषद: खनिज नीति दिल्ली में अकेले तय नहीं होनी चाहिए। खनिज उत्पादक राज्यों के मुख्यमंत्रियों और विशेषज्ञों की भागीदारी जरूरी है।

सातवां—स्थानीय समुदाय को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए: जिस गांव की जमीन और प्राकृतिक संसाधन प्रभावित होते हैं, उस गांव की आवाज को खनिज नीति में स्थान मिलना चाहिए।

भाजपा के झारखंड सांसदों से मेरा सीधा सवाल

मैं झारखंड के भाजपा सांसदों से पूछना चाहता हूं—आप पहले झारखंड के प्रतिनिधि हैं या भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के?

यदि आप झारखंड के हित में हैं, तो केंद्र सरकार से पूछिए कि राज्य की खनिज आय प्रभावित होने पर उसकी भरपाई कैसे होगी? पूछिए कि खनन कंपनियों को मिलने वाली लागत की पूर्वानुमेयता के बदले झारखंड को क्या आर्थिक सुरक्षा मिलेगी? पूछिए कि खनिज संपदा के कारण विस्थापित और प्रभावित आदिवासी-मूलवासी परिवारों को क्या अतिरिक्त अधिकार मिलेगा?

और सबसे महत्वपूर्ण—जब झारखंड की धरती से खनिज निकलेगा, तो झारखंड की जनता को उसका न्यायपूर्ण हिस्सा क्यों नहीं मिलेगा? भाजपा को इस सवाल का जवाब देना होगा।

हेमंत सोरेन सरकार के संघर्ष के साथ कांग्रेस मजबूती से खड़ी है

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा केंद्र सरकार के सामने यह मुद्दा उठाना झारखंड के आर्थिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। कांग्रेस राज्य सरकार की उस पहल का समर्थन करती है, जो झारखंड के राजस्व और संघीय अधिकारों की रक्षा के लिए है।

लेकिन यह लड़ाई केवल हेमंत सोरेन या कांग्रेस की नहीं है। यह झारखंड के अधिकार की लड़ाई है। यह उस किसान की लड़ाई है, जिसकी जमीन खनन के लिए जाती है। यह उस आदिवासी परिवार की लड़ाई है, जिसका जंगल उजड़ता है। यह उस युवा की लड़ाई है, जिसे खनिज संपदा के बावजूद रोजगार नहीं मिलता। यह उस गरीब परिवार की लड़ाई है, जिसे बेहतर अस्पताल और विद्यालय चाहिए। और यह झारखंड के भविष्य की लड़ाई है।

झारखंड कोई खनिज उपनिवेश नहीं है

भाजपा की केंद्र सरकार को समझना होगा कि झारखंड केवल देश को कोयला और लौह अयस्क देने वाला राज्य नहीं है। झारखंड के लोग भी हैं। उनके अधिकार हैं। उनकी जमीन है। उनके जंगल हैं। उनकी नदियां हैं। उनकी संस्कृति है। उनका भविष्य है। और सबसे बढ़कर—उनका अपने संसाधनों पर न्यायपूर्ण आर्थिक अधिकार है।

कांग्रेस का स्पष्ट संदेश है—खनन कंपनियों को सुविधा चाहिए, तो झारखंड को भी राजस्व सुरक्षा चाहिए। केंद्र को समान नीति चाहिए, तो राज्यों की सहमति भी जरूरी है। देश को खनिज चाहिए, तो खनिज उत्पादक जनता को विकास का अधिकार भी चाहिए।

भाजपा सरकार कॉरपोरेट को लागत की निश्चितता देकर झारखंड के राजस्व अधिकारों को अनिश्चित नहीं कर सकती। झारखंड ने देश को बहुत कुछ दिया है। अब समय है कि देश झारखंड को उसका न्यायपूर्ण हिस्सा दे।

झारखंड की खनिज संपदा देश की संपदा जरूर है, लेकिन झारखंड की जनता के अधिकारों की कीमत पर नहीं। दिल्ली से कानून बन सकता है, लेकिन झारखंड के अधिकारों का फैसला झारखंड की जनता की आवाज को दबाकर नहीं किया जा सकता।

कांग्रेस इस लड़ाई को संवैधानिक अधिकार, सहकारी संघवाद, सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और जल-जंगल-जमीन के सम्मान के साथ आगे बढ़ाएगी।

झारखंड के खनिज पर दिल्ली का शिकंजा नहीं चलेगा। झारखंड की धरती पर फैसला झारखंड के हित में ही होगा।

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Edited By: Mohit Sinha
Mohit Sinha Picture

Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.

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