Opinion: अपने समय से आंखें चुराना सबसे बड़ी मक्कारी है, यह ईमानदार साहित्यकारिता से भी गद्दारी है
वैचारिक अहंकार और संवादहीनता समाज में कटुता और अविश्वास को बढ़ावा देती है
अपने समय की सामाजिक समस्याओं से आंखें चुराना क्या साहित्य और मानवीयता के प्रति ईमानदारी हो सकती है? राजीव थेपड़ा के इस विचार लेख में इसी मूल सवाल के माध्यम से समाज में बढ़ती वैचारिक कटुता, अहंकार, संवादहीनता और आपसी अविश्वास पर गंभीर विमर्श किया गया है। लेख में कहा गया है कि किसी भी समस्या का समाधान स्वस्थ संवाद, आत्ममंथन और सभी पक्षों के प्रति सदाशयता से ही संभव है।
गर्मी से जगह जगह धरती धधक रही है। जंगलों में आग लग रही हैं, जानवर भी जान बचाकर भाग रहे हैं। और अपने आप को ठंडे रखने के लिए लोग मौसम के परिवर्तन से लड़ रहे हैं और यह भी सच है कि सदा से ही लड़ते रहे हैं किंतु यहां पर बात कुछ गर्मी की नहीं हो रही। बल्कि एक गर्मी और भी है, जिससे लोग हर मौसम में तपते रहते हैं और वह है अपने अपने विचारों की गर्मी!! देखा जाए तो हर आदमी सोचने वाली प्रवृत्ति का होता है, अलबत्ता सोचने के विषय अलग-अलग होते हैं। बहुत सारे विषय अपने अपने कामकाज के अनुसार और बहुत सारे विषय अपने अन्य स्वार्थों के अनुसार हुआ करते हैं।
यूँ सोचा जाए, तो हर किसी का अपना-अपना कामकाज भी उसके लिए उसका स्वार्थ ही है, जिससे उसके जीवन की समस्त गतिविधियां पूर्ण होती हैं और उसके अलावा कुछ कामकाज ऐसे हैं, जो भौतिक स्तर पर किसी प्रकार के लेनदेन के रूप में दिखाई नहीं देते, बल्कि विचारों के आलोड़न और उनका अतिशय बहाव और उनकी बेहतरह गतिशीलता से कहीं समाज वैचारिक विमर्श के द्वारा अपनी नानाविध समस्याओं का निदान पाता है, तो कहीं उन्हीं विचारों की उलझनों से तरह तरह की समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं। यहां पर एक बात कहना समीचीन जान पड़ती है कि वास्तव में अपने समाज की किन्हीं भी समस्याओं का समाधान यदि अपने स्वार्थों को परे रखकर, सभी के हितों की बात सोचते हुए, इमानदारी पूर्वक संवाद करते हुए ढूंढा जाए, तो उन समस्याओं के समाधान नहीं पाने की कोई वजह नहीं दिखती।
तो यह सारा खेल सिर्फ और सिर्फ अहंकार का है, यह अहंकार किसी कला में स्वयं को श्रेष्ठ मानने का भी हो सकता है। यह अहंकार अपने पंथ को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ मानने का भी हो सकता है। यह अहंकार अपने ईश्वर को भी सर्वश्रेष्ठ मानने का हो सकता है। किंतु समझना सिर्फ यही है कि इस धरती पर ईश्वर के अलावा सर्वश्रेष्ठ कुछ है भी ?? लेकिन जिस सर्वश्रेष्ठ ईश्वर के बारे में बातें करते हुए हम उसे भी तरह-तरह के पंथों में बिठाकर उसका जिस प्रकार का नगाड़ा बजाए हुए हैं, उस नगाड़े का शोर बहुत ही कटु है!! इस प्रकार इससे संबंधित समस्त विषयों से हमारे संवाद पूरी तरह से विषयों से परे, मानवीयता से विलग और कटुता से परिपूर्ण हैं। और यही कटुता बढ़ती-बढ़ती नफरत बनती जाती है और हम एक दूसरे के प्रति एक के बाद एक और और और ज्यादा शक से और नफरत से भरते चले जाते हैं।
तो अब इसके बाद का प्रश्न यह है कि इन विषयों पर विचार कौन करेगा? इन विषयों पर क्या कोई कलाकार, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर, नेता, कोई ठेलेवाला, कोई छोटा मोटा इंसान, कोई स्त्री, कोई थोड़ा बहुत सोचने वाला कोई भी व्यक्ति, क्या इनमे से कोई भी इन विषयों पर बातचीत करने का अधिकारी नहीं है?? और जिस साहित्यकारिता की बात करते हुए हम इन विषयों को राजनीतिक बताते हुए इन विषयों पर साहित्य के क्रम में संवाद करने से जिस प्रकार परहेज करते हैं, क्या हमारी इस बेबात की परहेजी जी वृत्ति से समाधान पैदा होते हैं?? या समस्याएं और उलझती हैं?? क्या हमें इन विषयों का तनिक भी भान है? हम संवाद की बात पर भी लोगों को चुनना शुरू कर देते हैं! इस बात पर यहां पर संवाद होगा! उस पर वहां पर संवाद होगा! इस विषय पर यहां पर कुछ नहीं होगा! उस विषय पर वहां पर कुछ नहीं होगा!
जबकि हम सभी उन सभी विषयों से आपस में लगातार गुत्थम गुत्था हैं! लेकिन एक दूसरे की स्वस्थ आलोचना के बजाय एक गंदी और इर्ष्यामूलक निंदा करते हुए, एक दूसरे के प्रति विरक्ति ही पैदा करते हैं! क्या हमारी यह वृत्ति सही है? इस मंच में यह नहीं होगा! उस मंच में वह नहीं होगा! यह बेशक किन्हीं बातों पर, अथवा किन्हीं विषयों पर लागू हो सकता है, लेकिन समाज के बीच की वह बातें, जिनसे हम सब संबंधित हैं हममें से हर एक संबंधित है और जिन पर हम सबको विशेषतया पहल करके संवाद करना चाहिए, उसके बारे में हम यह कहते हुए पाए जाते हैं कि यह राजनीति है!? यह किस किस्म की हमारी सोच है? यह मेरी समझ से परे है! वे सामाजिक समस्याएं, जिसके कारण आपस में कटुता पनप रही है, हमारी गलती हम मानने को तैयार नहीं हैं! उनकी गलती वो मानने को तैयार नहीं है!
उल्टा मवाद की तरह बहती हुई उलजलूल समस्याओं के विषय में भी यही कहते हैं कि यहां पर यह बातें नहीं होनी चाहिए! तो कहां पर यह बातें होनी चाहिए? यह हमें तय कर लेना चाहिए! या यूँ कहें कि यह बातें कहीं होनी ही नहीं चाहिए! बल्कि अपने मन ही मन में इन्हें और बड़ा और लाइलाज करते हुए अपने आप को एक ऐसा धधकता हुआ गोला बना लेना चाहिए, जिसके सामने उसका कोई भी विपक्षी या प्रतिद्वंद्वी आए तो एकदम से जलकर खाक हो जाए!! यही चाहते हैं ना शायद हम ? क्या मजाक है यह कि हम अपना आत्ममंथन करना जानते नहीं! हम अपने भीतर उतरना जानते नहीं! और सिर्फ और सिर्फ दूसरों की ओर उंगली उठाते हुए हमें इस बात का तनिक भी भान नहीं होता कि एक अंगुली सामने की ओर है तो बाकी की चारों अंगुलियां स्वयं की ओर उठी हुई होती हैं!!
हम कब संवाद करना सीखेंगे? हम कब इतने ईमानदार बनेंगे कि एक दूसरे की सोच के बारे में सदाशयता रखते हुए आपस में सामंजस्य बहाल करने की चेष्टा करेंगे और वैसे पंथ, जो वास्तव में किसी भी प्रकार की अतिशयता का शिकार होते हुए भी अपने आपको बार-बार सर्वश्रेष्ठ मानने की गलती करते हुए, बार-बार मानवीयता को तार करते हैं, सबसे ज्यादा प्रश्न उन्हीं के ऊपर उठते हैं। जिन्हें कई बार हम उठाने से इसलिए भी डरते हैं कि उससे हमारे आपस के संबंध खराब ना हो जाएँ! लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि इन चीजों से डरने के बजाय सामने वाले को बहुत नम्रतापूर्वक और डटकर यह बताया जाए कि दुनिया पिछले 2000/5000 सालों से बहुत आगे बढ़ चुकी है और 2000/5000 साल पूर्व जो घटित हुआ और जिसके अनुसार जो कुछ भी लिख दिया गया है, उसे अमिट नहीं कहा जा सकता। उसे रद्दो-बदल करने लायक बताए जाने को गलत करार देना भी एक बहुत ही गलत बात है और इस गलत बात की स्वस्थ आलोचना करते हुए लगातार हम सभी को ऐसे विचारों को धार देनी चाहिए, जिससे कि यदि कोई वास्तव में अतिशयता का शिकार है, तो उसके भीतर उस विकार से समाधान पाने का विचार जागृत हो!
अलबत्ता इस आलेख में किसी को गलत या सही ठहराने की कोई चेष्टा नहीं की जा रही। बल्कि सिर्फ यह बताया जा रहा है कि कुछ है, जो अतिशयता पूर्ण है और अगर वह चंद मुट्ठी भर लोगों द्वारा किया जाता है, तो भी बाकी के लोगों द्वारा ऐसे करने वालों का बचाव किया जाना ही उस समूचे पंथ के लोगों को शक के दायरे में लाता है और यहीं पर वह बातें हो जाती हैं, जो नहीं होनी चाहिए। इस विषय पर हर पक्ष को सोचना होगा। इस विषय पर हर पक्ष को निरपेक्ष होना होगा और अंत में यही कि इस समाज में रहने वाला हर व्यक्ति हर प्रकार के संवाद का हकदार हैं, हर विषय पर बातचीत करने का अधिकारी है और जिन समस्याओं से हम सभी जूझ रहे हैं, उन्हें उपयुक्त मंच पर बातचीत के द्वारा, संवाद के द्वारा किसी सही मुकाम तक पहुंचाना भी हमारा एक महत्ती कर्तव्य है। इससे हम कभी च्यूत नहीं हो सकते। और हमारे द्वारा ऐसा किया जाना हमारी साहित्यकारिता के प्रति मक्कारी होगी और साथ ही मानवीयता के प्रति गद्दारी भी! हमें किसी भी भय के परे जाकर सदा ऐसा करना ही चाहिए, क्योंकि यही करना हमारी हमारे समय के प्रति ईमानदारी है और मानवीयता के प्रति सदाशयता भी। हमें सदा ऐसा करना चाहिए, बस इससे ज्यादा कुछ नहीं।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.










