Opinion: ढाका का बदलता मौसम, पूर्वोत्तर भारत की नई चुनौती: डॉ. अतुल मलिकराम
भारत-बांग्लादेश संबंधों का सीधा असर पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, व्यापार और विकास पर
भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों की कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और विकास पर पड़ता है। डॉ. अतुल मलिकराम अपने लेख में शेख हसीना सरकार के दौर में दोनों देशों के बीच बढ़े सुरक्षा सहयोग, भूमि सीमा समझौते, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और आर्थिक साझेदारी का उल्लेख करते हुए 2024 के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों का विश्लेषण करते हैं।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते केवल दो पड़ोसी देशों के संबंध नहीं हैं। यह इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा, व्यापार और भूगोल से जुड़ा ऐसा रिश्ता है जिसका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर पर पड़ता है। पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शेख हसीना के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों ने कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए। लेकिन अगस्त 2024 में हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने इस साझेदारी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों की बुनियाद 1971 के मुक्ति संग्राम में पड़ी थी। हालांकि आजादी के बाद अवैध प्रवास, सीमा विवाद, तीस्ता जल बंटवारा, व्यापार असंतुलन और आतंकवाद जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के रिश्तों को कई बार तनावपूर्ण बनाया। 2009 में शेख हसीना के दोबारा सत्ता में आने के बाद स्थिति बदली। बांग्लादेश ने अपनी जमीन पर भारत विरोधी उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की और सुरक्षा सहयोग का एक नया दौर शुरू हुआ। मोदी सरकार के आने के बाद इस रिश्ते को निर्णायक गति मिली। 2015 का भूमि सीमा समझौता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके तहत भारत और बांग्लादेश ने क्रमशः 111 और 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया। दशकों से चली आ रही इस जटिल समस्या का समाधान केवल सीमा प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि यह दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास का भी बड़ा प्रमाण बना।
लेकिन 2024 के बाद तस्वीर बदल गई। शेख हसीना भारत आ गईं और बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण शुरू हुआ। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार फरवरी 2026 में समाप्त हुई और चुनाव के बाद बीएनपी नेता तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। अब भारत के सामने चुनौती यह है कि वह नई सरकार के साथ रिश्तों को पुराने राजनीतिक समीकरणों से अलग रखते हुए अपने दीर्घकालिक हितों को कैसे सुरक्षित करता है। शेख हसीना का भारत में रहना आज भी रिश्तों का संवेदनशील मुद्दा है। बांग्लादेश ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की है और भारत ने स्पष्ट किया है कि इस अनुरोध की समीक्षा कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत की जा रही है। अगस्त 2026 में भी यह मुद्दा दोनों देशों के बीच चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।
ऐसे समय में भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता टकराव नहीं, बल्कि संतुलित कूटनीति है। मेरे अनुसार सुरक्षा सहयोग जारी रखना होगा, व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से बचाना होगा और बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संस्थागत संबंध मजबूत करने होंगे। साथ ही, चीन और अन्य बाहरी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव को केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि बेहतर आर्थिक और रणनीतिक विकल्प देकर चुनौती देनी होगी।
आखिरकार, बांग्लादेश की स्थिरता भारत के लिए केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। यह पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, व्यापार और विकास से सीधे जुड़ा प्रश्न है। इसलिए ढाका में बदलती सरकारों के बीच नई दिल्ली की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह व्यक्ति-केंद्रित रिश्तों से आगे बढ़कर भारत-बांग्लादेश संबंधों को संस्थागत, दीर्घकालिक और राष्ट्रीय हित आधारित साझेदारी में बदल सके। यही पूर्वोत्तर के लिए भी सबसे सुरक्षित और लाभकारी रास्ता होगा।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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