तकनीक और परंपरा के समन्वय से संभव है आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सपना

मातृभाषा का संरक्षण ही हमारी असली पहचान है

तकनीक और परंपरा के समन्वय से संभव है आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सपना
(सांकेतिक इमेज)

आशुतोष प्रसाद द्वारा लिखित यह आलेख झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति पर आधुनिकता और तकनीक के प्रभाव का व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कैसे नई पीढ़ी तकनीक और शिक्षा के सही प्रयोग तथा मातृभाषा के संरक्षण के माध्यम से अपनी परंपराओं को वैश्विक पहचान दिला सकती है।

संध्या का समय है। झारखंड के एक गाँव में मांदर की थाप पर करमा नृत्य प्रारंभ होने वाला है। गाँव के बुजुर्ग उत्साह से युवाओं को पारंपरिक गीत सिखाने के लिए बुलाते हैं, किंतु कई युवा अपने मोबाइल फोन में व्यस्त हैं। कुछ ही देर बाद वही युवा अपने फोन से नृत्य का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करते हैं और देखते-ही-देखते लाखों लोग उस लोकनृत्य की प्रशंसा करने लगते हैं। यह दृश्य आज के झारखंड की एक नई सच्चाई को सामने लाता है। नई पीढ़ी परंपरा से दूर भी हो रही है और वही नई पीढ़ी आधुनिक तकनीक के माध्यम से उस परंपरा को विश्व मंच तक भी पहुँचा सकती है। यही संभावना आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की सबसे बड़ी आशा है।

झारखंड की आदिवासी संस्कृति हजारों वर्षों की साधना, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और सामुदायिक जीवन के अनुभवों से निर्मित हुई है। सरहुल, करमा, सोहराय, मागे और बाहा जैसे पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के प्रतीक हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, हस्तशिल्प, जनजातीय भाषाएँ, पारंपरिक वाद्य और लोककथाएँ इस सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य निधि हैं। किंतु बदलती जीवनशैली, शहरीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव से यह विरासत अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में नई पीढ़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

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हर युग में सांस्कृतिक परिवर्तन हुए हैं, परंतु वर्तमान परिवर्तन की गति अभूतपूर्व है। इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और वैश्विक संचार ने युवाओं की सोच और जीवनशैली को बदल दिया है। यह परिवर्तन स्वाभाविक है, किंतु चिंता तब होती है जब युवा अपनी मातृभाषा बोलने में संकोच करने लगते हैं, पारंपरिक गीतों को पुराना मानने लगते हैं और लोकसंस्कृति को आधुनिकता के विपरीत समझने लगते हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले दशकों में अनेक सांस्कृतिक परंपराएँ केवल अभिलेखों तक सीमित रह सकती हैं।
फिर भी निराश होने का कोई कारण नहीं है। झारखंड के अनेक युवा आज अपनी संस्कृति को नए रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। कोई संथाली गीतों को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ रहा है, कोई मांदर की थाप को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचा रहा है, तो कोई जनजातीय चित्रकला, हस्तशिल्प और लोकनृत्य को डिजिटल माध्यम से लोकप्रिय बना रहा है। यह संकेत है कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल अतीत की ओर लौटना नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच सृजनात्मक संवाद स्थापित करना है।

नई पीढ़ी के लिए सबसे पहला दायित्व अपनी मातृभाषा को जीवित रखना है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह इतिहास, लोकज्ञान और सामूहिक स्मृतियों की वाहक होती है। मुंडारी, कुड़ुख, संथाली, हो और खड़िया जैसी भाषाओं में हजारों लोकगीत, कहावतें और कथाएँ सुरक्षित हैं। यदि भाषा कमजोर होगी, तो उसके साथ जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी धीरे-धीरे विलुप्त होती जाएँगी। इसलिए परिवारों और विद्यालयों को मिलकर मातृभाषा के संरक्षण का वातावरण बनाना होगा।

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शिक्षा भी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त माध्यम बन सकती है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय इतिहास, लोकसाहित्य, लोकसंगीत, पारंपरिक पर्यावरण ज्ञान और महान जनजातीय विभूतियों के योगदान को उचित स्थान मिलना चाहिए। विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझने के लिए भी इन विषयों से परिचित कराया जाना चाहिए। जब शिक्षा अपनी मिट्टी से जुड़ेगी, तभी युवा अपनी जड़ों पर गर्व करना सीखेंगे।

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तकनीक इस पुनर्जागरण की सबसे प्रभावी सहयोगी बन सकती है। यदि युवा लोकगीतों का डिजिटल संग्रह तैयार करें, लोककथाओं का वीडियो दस्तावेजीकरण करें, जनजातीय भाषाओं के मोबाइल ऐप विकसित करें और लोककला को ऑनलाइन मंचों पर प्रस्तुत करें, तो यह विरासत सीमित भौगोलिक दायरे से निकलकर वैश्विक पहचान प्राप्त कर सकती है। आज दुनिया मौलिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की ओर आकर्षित हो रही है। झारखंड की आदिवासी संस्कृति में वह मौलिकता भरपूर है।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल कलाकारों का कार्य नहीं है। इसमें परिवार, समाज, शिक्षण संस्थान, सरकार, मीडिया और सांस्कृतिक संगठनों की समान भागीदारी आवश्यक है। गाँवों में सांस्कृतिक कार्यशालाएँ, लोकगीत प्रतियोगिताएँ, जनजातीय भाषा महोत्सव, पारंपरिक खेलों का आयोजन और लोककला प्रशिक्षण शिविर नियमित रूप से आयोजित किए जाएँ। इससे युवाओं को अपनी संस्कृति के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने का अवसर मिलेगा।

आर्थिक दृष्टि से भी यह पुनर्जागरण महत्वपूर्ण है। यदि जनजातीय हस्तशिल्प, प्राकृतिक उत्पाद, लोकसंगीत, सांस्कृतिक पर्यटन और पारंपरिक कलाओं को बाज़ार से जोड़ा जाए, तो युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होंगे। तब संस्कृति केवल विरासत नहीं रहेगी, बल्कि सम्मानजनक आजीविका का आधार भी बनेगी। यही सतत विकास का वास्तविक मार्ग है।

वास्तव में, सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं है। इसका अर्थ है—उन मूल्यों को नए युग के अनुरूप जीवंत बनाना, जो मानवता को बेहतर भविष्य दे सकते हैं। प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक सहयोग, श्रम की गरिमा, स्त्री-पुरुष की सहभागिता और सामाजिक समरसता जैसे आदिवासी जीवन-मूल्य आज पूरे विश्व के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी अपनी पहचान को आधुनिकता के साथ जोड़कर देखे, उसके विपरीत नहीं। मोबाइल हाथ में हो सकता है, लेकिन मांदर की थाप भी हृदय में गूँजनी चाहिए। आधुनिक शिक्षा प्राप्त की जा सकती है, पर अपनी मातृभाषा का सम्मान भी बना रहना चाहिए। विश्व नागरिक बनने की आकांक्षा हो, पर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव भी उतना ही गहरा हो।

झारखंड की आदिवासी संस्कृति का भविष्य किसी सरकारी योजना से अधिक नई पीढ़ी की चेतना पर निर्भर है। यदि युवा अपनी विरासत को बोझ नहीं, बल्कि गौरव मानेंगे, तो सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल एक विचार नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सशक्त आंदोलन बन जाएगा। तब मांदर की थाप केवल गाँवों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विश्व मंच पर झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का स्वर बनकर गूँजेगी। यही नई पीढ़ी का सबसे बड़ा योगदान और आदिवासी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वास्तविक लक्ष्य होगा।

आशुतोष प्रसाद
साहित्यकार एवं  समीक्षक
9934302065

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Edited By: Anjali Sinha
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