Opinion: निजता का प्रश्न और भ्रम में हम!
निजता आज के दौर में एक महत्वपूर्ण सामाजिक और बौद्धिक प्रश्न बन चुकी है। राजीव थेपड़ा अपने विचार लेख में निजता, सामाजिक संबंधों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तकनीक के बदलते प्रभाव को लेकर कई सवाल उठाते हैं।
राजीव थेपड़ा
निजता! एक ऐसा शब्द, जो हमारी स्वयं की निजी स्वतंत्रता से जुड़ा और एक ऐसे अर्थ को समेटे हुए हमारे द्वारा अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने का एक ऐसा प्रयास है, जिसे करते हुए हमें लगता है कि हम अपने आप में एक संप्रभु एवं सार्वभौम व्यक्तित्व हों! किंतु क्या सचमुच ही ऐसा है? आइए आज हम इस बात की पड़ताल करते हैं!
उसी प्रकार शहरों में भी एक संयुक्त साहचर्य निभाया जाता था। हमारे बच्चों को न भी पता हो, तो हम तो कम से कम वह दिन याद कर सकते हैं। जब किसी जमाने में एक रेडियो हुआ करता था और पूरा परिवार उसका आनंद उठाया करता था। कुछ समय पश्चात पूरे परिवार के बीच में एक टीवी आया और तब उस घर के सारे के सारे सदस्य तो क्या, बल्कि अगल बगल के मोहल्ले वासी भी एक साथ बैठकर टीवी के सभी मनोरंजक सीरियलों का आनंद उठाया करते थे। तो कुल मिलाकर आप देखिए कि यहाँ निजता का कहीं कोई पहलू ही नहीं दिखाई देता। कम से कम हमारे समाज में तो बिल्कुल भी नहीं।
समय बीता, अन्य स्थानों के लोगों ने भारत में प्रवेश किया। भारत के लोगों पर राज किया और बहुत सारी बातें भारत के लोगों पर ऐसी भी लाद दी गईं, जो भारत के लोगों के स्वभाव के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं थी। बहुत सारे दबावों में या बहुत सारे अन्य कारणों के चलते भारत के बहुत सारे लोगों ने उन बातों को अपना लिया और दो-तीन पीढ़ी, चार पीढ़ी में लगभग वे समस्त बातें आदतन सबके स्वभाव में शामिल होती चली गईं। लेकिन सच तो यह है कि भारत का मन, भारत के लोगों का स्वभाव और उनकी परिपाटी पूरी तरह से तो आज तक भी नहीं बदली है। ऐसे में निजता का प्रश्न समाज के थोड़े से लोगों को भले ही आंदोलित क्यों न करे। किंतु इस प्रश्न का समाज के एक बहुत बड़े हिस्से में कोई अस्तित्व ही नहीं है। क्योंकि वहां इस प्रश्न के अब भी रत्ती भर भी उठने का भाव नहीं दिखता।
निजता का प्रश्न सच पूछो तो बौद्धिक लोगों का प्रश्न है या यूं कहूं तो मुझे ऐसा भी लगता है कि यह खाली बैठे लोगों का प्रश्न है। एक ऐसे समाज में जहां हर कोई एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। एक दूसरे के बिना के किसी का कोई भी कार्य नहीं निभ सकता है। ऐसे में निजता जैसी बात एक उलजुलूल सोच से अधिक कुछ और नहीं लगती। अरे निजता तो राजाओं की भी नहीं रही। सच पूछा जाए तो जैसा कि परिभाषित है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज के बगैर नहीं जी सकता। हम इसे और भी ज्यादा विस्तार दें, तो इस संसार का हरेक जीव भी सामाजिक प्राणी ही है और कोई भी अपने समूह/समाज के बिना नहीं जी सकता। तो हर जीव समूह में जीता है और एक समूह दूसरे समूह के साथ अपने अस्तित्व के लिए झगड़ा भी करता है। किंतु अन्य जीवों के लिए क्योंकि निजता जैसी बातों की कल्पना की भी नहीं जा सकती।
देखा जाए तो मनुष्य के लिए जिस निजता की बात की जाती है, उसमें कोई विशेष सार नहीं दिख पड़ता, क्योंकि संभवत: ऐसी कोई भी बात नहीं, जिसकी चर्चा हम किसी न किसी से नहीं करते। सेवक से, दासी से, दोस्त से, रिश्तेदारों से, भाई बंधुओं से, निकट सगे संबंधियों से, यहां तक कि बहुत सारी बातें तो हम अनजान लोगों से भी कर लेते हैं! यहां तक कि आप गौर कीजिएगा कि बिल्कुल अनजान लोगों से ही अचानक से भेंट होने पर कुछ देर में घुलते-मिलते ही हम उनसे अपने जीवन की ऐसी बहुत सारी बातें शेयर कर डालते हैं, जिनको बौद्धिक जुगाली में निजता के प्रश्न कहा जाता है! तो सच पूछा जाए तो मां-बाप, भाई-बहन, चाचा-ताऊ, दोस्त, मोहल्लेवासियों, शहरवासियों, देशवासियों के बीच बराबर रहने के कारण हम हर वक्त किसी न किसी के संपर्क में रहते हैं। यहां तक कि सोते वक्त भी अपने किसी भाई-बंधु, अपने मां-बाप या जिस किसी के भी साथ हम हुआ करते हैं, उनसे बहुतों सारी बातें तो करते ही हैं।
और कुछ और नहीं तो तकनीक के इस युग में हमारे गैजेट्स ही हमारे साथ हुआ करते हैं। जिनके माध्यम से हम अपने किसी यार-रिश्तेदार से सोने से भी पहले बहुत सारी बातें करते हैं और यह भी सच है कि उनमें से अधिकांश बातें हमारे ही उन लोगों के द्वारा, जिनसे हमने वह बातें साझा की होती हैं, किसी न किसी रूप में अन्य लोगों तक भी पहुंच जाती हैं। यह बाबा आदम काल से होता आया है, हो रहा है, आगे भी होता रहेगा! हम केवल और केवल वही बात किसी दूसरे से साझा नहीं करते, जिसमें हमें हमारी प्रकट बदनामी का भय हो। किंतु कई बार इन बातों में भी हमारे और भी दूसरे भागीदार हुआ करते हैं, जिनसे यह बातें इधर-उधर जाती हैं। तो जब भी हम कोई बात किसी न किसी से साझा करते हैं और हमारे द्वारा साझा की गई वह बात किसी ना किसी मुख से कहीं ना कहीं और भी पहुंच जाती है। तो निजता जैसी किसी बात का अस्तित्व तो यहीं खत्म हो जाता है।
किंतु पश्चिमी जगत से आया यह विचार पिछले कुछ वर्षों से हमारे भीतर एक आंदोलन बनने के क्रम में एक अजीबोगरीब, किंतु लगभग बेतुका-सा प्रश्न पैदा कर रहा है! तो अब मजेदार बात यह है कि हमारा स्वभाव तो बिल्कुल अलग। लेकिन किसी और जगत से या किसी बौद्धिक जगत से आया हुआ यह अपरिचित प्रश्न! अलग क्या सचमुच इसका हल है? या दूसरे शब्दों में पूछें, तो क्या सचमुच एक क्षण भी हम स्वतंत्र हैं? क्या हमें प्रतिपल लोगों के साथ रहते हुए लोगों की भावनाओं को न दुखाने के अनुसार अपना आचरण नहीं करना पड़ता? या उनके अनुकूल बोल नहीं बोलने पड़ते? मां-बाप से लेकर भाई-बहन, पति-पत्नी, अन्य सगे संबंधी, दोस्त, समाज, संगठन, समूह, मंदिर, मस्जिद अथवा किसी भी स्थल पर क्या कोई भी बात हम ऐसी कर सकते हैं, जहां लोगों का दिल टूट जाए? तो क्या समाज के बीच ही जीते हुए समाज के अनुसार अथवा समाज की इच्छाओं के अनुसार या अपनी आवश्यकताओं के अनुसार किया जा रहा हमारा आचरण या हमारी बोली क्या हमारी सीमा नहीं है? वस्तुत: क्या यहीं पर हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा तय नहीं हो जाती है?
जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए हम न जाने कितनी बौद्धिक जुगालियाँ करते हैं और मंच से अपने लिए लोगों से तालियां बजाते हैं! क्या सचमुच हम किसी भी वक्त इतने स्वतंत्र हैं कि कुछ भी बोल जाएं? कुछ भी कर जाएं? गहराई से विचार कीजिए, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और ऐसा कभी हो भी नहीं पाएगा! तो अभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता का प्रश्न यहीं पर समाप्त हो जाते हैं। बाकी इस विषय में हम जो कुछ भी बात करते हैं, वे सभी वस्तुत: हमारी कल्पनाओं, हमारे अनुमानों पर आधारित एक कोरी गल्प भर होती है। जिसे हम माने या ना माने यह हमारी मर्जी है और यह भी हमारी निजता है!यह हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है कि हम कोई भी बात सच होने के बावजूद सिर्फ इसलिए ना माने, क्योंकि हम उसे मानना नहीं चाहते!
तो कुल मिलाकर यह प्रश्न अपने आप में बड़ा गड्डमगड्ड है कि कहां तक निजता? कहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? कहां तक समाज से हमारा जुड़ाव हो? और कहां तक समाज के लोगों के अनुसार हमारा आचरण? और ऐसी कौन-सी बात है, जिसे हम समाज के किसी न किसी सदस्य से साझा नहीं करते! जिस दिन गहराई से हम इन बातों पर विचार कर डालेंगे, उस दिन अपने आप हमें यह आभास हो जाएगा कि हम अंधेरे को भगाने के लिए लाठियां भांज रहे हैं! लेकिन अंधेरा जस का तस है! और हमारे भीतर शुद्ध और सही विचारों की रोशनी जब हमारे भीतर उतरेगी, तो वह अंधेरा अपने आप दूर हो जाएगा। हमारे लाठियां भांजने से न कभी अंधेरा भागा है और ना कभी भागेगा!
किसी भी तरह की निजता की हम बात क्यों ना करें, तो सबसे पहले तो यही प्रश्न पैदा होता है कि क्या हम स्वयं अपनी निजता को अपने ही द्वारा तय किए गए प्रावधानों के अंतर्गत निभा पाते हैं? हमारे बहुत सारे कार्य, हमारे आचरण ऐसे होते हैं, जो भले ही हमारे अत्यंत निकट संबंधियों तक को ना पता हों, लेकिन हमारे सेवकों, दास-दासियों, ड्राइवरों, सुरक्षा गार्डों या किन्ही होटल या रिसॉर्ट के कर्मचारियों या ऐसे ही किसी अन्य स्थानों के लोगों को पता होती है! यहां तक कि हमारे द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की जा रही जानकारियां भी इसी प्रकार लोगों के बीच तैरती रहती हैं। ऐसे में हमारी कौन-सी निजता कब तक और कहाँ तक लोगों से छिपी रह पाती है, यह भी अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है!
अक्सर हमने देखा होगा कि ऐसे कुछ लोग, जो कई जगह एक साथ काम करते हैं या वे दाईयाँ, जो दिन भर में आधा दर्जन घरों में काम करती हैं और उनमें से कई तो एक के बाद एक घर बदलते-बदलते सैकड़ों घरों में काम कर चुकी होतीं हैं। उन सब घरों की निजी और गोपनीय जानकारियां वे, जहां जहां काम वे काम करती हैं, उन लोगों से बातें करते वक्त नमक मिर्च लगाकर यानि छौंक लगाकर आपस में साझा कर ली जाती हैं! इस प्रकार ऐसी बहुत सारी गोपनीय जानकारियां, जिन्हें हम सिर्फ अपने तक ही सीमित समझते हैं, वे उन दाईयों या स्टॉप्स या ड्राइवरों, यह अन्य किन्ही कर्मचारियों आदि के द्वारा न जाने कितनी ही जगह जाकर बाकायदा नमक-मिर्च या पूरे मसालों का छौंक लगाकर पल्लवित-पुष्पित होती रहती हैं!!
तो जिसे हम निजता कहते हैं, उस निजता के बारे में भी हमें पूरी तरह से कुछ भी नहीं पता होता और च्युँकि हम किसी न किसी माध्यम के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं या उन्हीं जुड़ाव से हमारा प्रत्येक काम होता है। तो हमारे काम के अंतर्गत आने वाले समस्त माध्यम हमारी उन समस्त निजताओं को अपने अपने संपर्कों से साझा कर डालते हैं, जिसका हमें पता तक भी नहीं होता! अब पुनः प्रश्न यह है कि मैंने तो अपने लिए निजता का एक स्वर चुन लिया, एक सीमा चुन ली, लेकिन मैंने जिससे अपनी जानकारियां साझा कीं या अनजाने में मुझसे साझा हुईं, तो जिनसे यह जानकारियां साझा हुईं, उनको हम कहां तक रोक सकते हैं? असल में सबके अपने-अपने नियम कानून हैं या कोई नियम कानून ही नहीं है! ऐसे में ये सारे प्रश्न बिल्कुल उलझ जाते हैं, जिनका कोई सम्यक उत्तर हम शायद ही कभी दे पाएं!!
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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