आदिवासी समाज और उसकी सामाजिक, राजनीतिक चेतना
पेसा कानून और स्वशासन का ज़मीनी संघर्ष
यह आलेख झारखंड के परिप्रेक्ष्य में आदिवासी समाज की बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक चेतना, उनके अधिकारों और सामूहिकता पर मंडराते खतरों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें विस्थापन, बाजारवादी शक्तियों के प्रभाव और राजनीतिक सौदेबाजी के खिलाफ आदिवासी पहचान, स्वशासन तथा जल-जंगल-जमीन के ऐतिहासिक संरक्षण संघर्ष को रेखांकित किया गया है।
अशोक सिंह
पिछले कुछ दशकों में आदिवासी समाज की सामाजिक राजनीतिक चेतना में बड़ी तेजी से उभार आया है। यहां तक कि सोशल मीडिया के इस दौर में संघर्ष के कई मोर्चों पर बहुत हद तक प्रभावी भी दिख रहा है। जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक राजनीतिक संगठनों की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन विडंबना यह है कि आदिवासी चेतना का यह जन उभार विभिन्न राजनीतिक संगठनों के भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के प्रभाव में आकर जहां एक अपनी एकता और सामूहिकता को खो रहा है, वहीं दूसरी ओर अपने समय के सतही मुद्दों को लेकर आपस में ही उलझ रहा है। ऐसे में आदिवासी समुदाय के विकास की मूल अवधारणा और उससे जुड़े सवाल बहुत पीछे छूट जा रहे हैं। तब आदिवासी हित अधिकारों को लेकर अपने आस पास चल रहे आंदोलनों में यह फर्क समझना मुश्किल हो जाता है कि लोग गड्ढे से लड़ रहे हैं या फिर गड्ढा खोदने वालों से !

आजादी के बाद के शासकों ने झारखंड स्वयत्तता की मांग को देखते हुए ऐसा ही खेल खेला और झारखण्ड की स्थापना के बाद भी यहां की जनता को न केवल कमजोर किया बल्कि उनकी एकता और सामूहिकता को भी तोड़ने का षड्यंत्र किया और सफलता भी पाई। देखा जा सकता है कि झारखण्ड में ऐसे कानून बनाए गए जो यहां की प्रकृति और सांस्कृतिक मान्यताओं से मेल नहीं खाते और विकास के नाम पर विस्थापन का आतंक पैदा कर दिया गया। झारखण्ड की जनता को बचाव के संघर्ष में उलझा दिया गया। ऐसे में झारखण्ड के वास्तविक इतिहास की रचना के बीच आत्मविश्वास कमजोर हुआ।
झारखण्ड की जनता के साथ यह खेल बिरसा उलगुलान और संताल विद्रोह के बाद से ही किया जाता रहा। लेकिन हर बार यह देखा गया है कि जनता अपने बीच से नए इतिहास प्रतीकों को खोज लेती है और संघर्ष को तेज कर देती है। आजादी के संघर्ष के समय ही जब आदिवासी पहचान का सवाल उठाया गया तो उनकी कम आलोचना नहीं हुई। यहां तक कहा गया कि इससे अंग्रेज ही मजबूत हो रहे हैं। वास्तव में पहचान के सवाल को पूरी गंभीरता के साथ देखने समझने का नजरिया ही विकसित नहीं हुआ था लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी यह आंदोलन कमजोर नहीं हुआ और झारखंड की जनता ने न केवल अपनी पहचान के सवाल को महत्वपूर्ण बना दिया बल्कि आजादी मिलने तक यह सवाल देश के ऐजेंडा का हिस्सा बन गया।
संविधान सभा ने इस बात को स्वीकार किया कि आदिवायियों के सवाल कुछ अलग हैं और उनके विकास के लिए खास व्यवस्था की जरूरत है। यह भी कहा गया कि आदिवासी प्रशासन की परंपराओं को नकारा नहीं जा सकता। इन स्वीकृतियों के बाद भी आदिवासियों को उनका वास्तविक हक नहीं मिला। उनकी आकांक्षा के साथ इंसाफ नहीं किया जा सका और आदिवासी विकास को विनाशकारी परिणामों की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया। विकास की नीति परंपरागत जरूरतों के अनुरूप नहीं बनाए गए।
आदिवासियों को उस बाजार के हवाले कर दिया गया जिसका आधार ही मोलतोल है जबकि यह तो सब जानते हैं कि आदिवासी परंपरा और उनके जीवन व्यवहार में मोलतोल का कोई स्थान नहीं है। जब से नई आर्थिक नीति आई है बाजार का हमलावर रूख आदिवासी समाज पर बढ़ गया है। आदिवासियों की विरासतों के साथ ज्यादा खेल किया जा रहा है और यह बताने की कोशिश की जा रही है कि आदिवासी समाज अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकता।
आदिवासी क्षेत्र के संसाधनों को लूटने की नीयत से इतिहास के मिथकों की रचना की जा रही है और आदिवासियों की सामाजिकता को व्यक्तिवाद में बदलने की साजिश की जा रही है। आदिवासी जिस तरह जंगल और जमीन के बिना खानाबदोश हो जाते हैं, उसी तरह वह अपने ऐतिहासिक प्रतीकों से कटकर सदा के लिए खत्म हो जाता है । दुनिया के कुछ कथित विकसित देशों में यह देखा जा सकता है। यही कारण है कि आज का आदिवासी समाज अपनी परंपरा को ज्यादा याद करता है और उन हमलों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहता है, जिसने उसकी सामूहिकता को ही नष्ट कर दिया है या करने का तरीका ईजाद कर दिया है।
आदिवासी जन राजनीति की बुनियाद उस जनतंत्र की स्थापना है जिसमें व्यक्ति से ज्यादा समूह का स्थान होगा। इसे स्थापित करने के लिए आदिवासियों को अपनी उस इतिहास चेतना को फिर से स्थापित करना होगा जो कि उपनिवेशकालीन और बाद में आंतरिक उपनिवेशवादी संस्कृतिकरण के शिकार हो गए हैं।
आदिवासी राजनीति के सामने आज अनेक गंभीर सवाल हैं। झारखण्ड की विविधता को उसे बचाना है तो दूसरी और उसे यह भी साबित करना है कि आज की नैतिकता की तुलना में उनकी सामाजिक नैतिकता कहीं ज्यादा कारगर है, जिससे आज की चुनौती का सामना किया जा सकता है। झारखण्ड के सामने यह भी चुनौती है कि आज की बाजार अर्थव्यवस्था के फांस को वह तोड़ दे और एक ऐसी नीति का निर्माण करे जिससे जनता की ताकत और निर्णयकारी प्रवृति स्पष्ट दिखे।
समानता की अपनी विरासत पर आदिवासी समाज गर्व कर सकता है लेकिन उसे आज के अनुकूल ऐसी समानता की भी स्थापना करनी है जिसमें स्त्रियाँ अपने अधिकारों के साथ समाज और सत्ता का संचालन कर सके। आदिवासी इतिहास के यही सबक हैं और इन्हें कारगर हथियार बनाकर ही झारखण्डी चेतना की बात को स्थापित किया जा सकता है। यह इसलिए भी जरूरी है कि हर किस्म के राजनीतिक दल बिना झारखंड की बात किए इस क्षेत्र में सफल नहीं हो सकते। उन लोगों ने इस राग को अलापना भी शुरू कर दिया है। लेकिन जनता ही बता सकती है कि झारखण्ड का सवाल केवल राजनीतिक सौदाबाजी नहीं बल्कि जीवनपद्धति है और इसे अपनाने के लिए दलों को अपना एजेंडा भी बदलना होेगा।
आज आदिवासी समाज की अवस्था को लेकर जो तरह-तरह की व्याख्याएँ दी जा रही हैं उसकी संस्कृति का जो विश्लेषण किया जा रहा है। उसमें वास्तविकता से परे जाकर बदलावों को दरकिनार कर दिया जाता है। जिससे समकालीन चुनौतियों को समझना आज कठिन हो गया है। ऐसी रणनीति अपनायी जाती है कि उसमें समानता तथा सामाजिक न्याय के पहलू बहस के केन्द्र में नहीं उभरे।
गौरतलब है कि किसी भी परंपरागत समाज के अन्तर्विरोधों और उसकी प्रक्रिया को समझने के लिए उस समाज के स्वरूप, उसकी सामाजिक संरचना और उसके सामाजिक यर्थाथ के बीच के अंतर को समझना होगा। सवाल चाहे नये समाज की रचना का हो या पुरातन प्रणाली के रचनात्मक व सकारात्मक संबंधों को विकसित करने का, इस राह से गुजरना ही होगा। परंपरा के बारे में भी साफ और स्पष्ट समझ विकसित करने के लिए यह जरूरी है।
ताकि उन भ्रमों से मुक्त हुआ जा सके जो इतिहास के एक खास दौर में पैदा होकर परंपरा और अंधविश्वास में गहन घालमेल कर देते हैं। जिससे समाज अपने ही इतिहास के बारे में भ्रांति का शिकार हो जाता है और वैज्ञानिकता तथा गतिशीलता के बदले स्थिरता को ही परंपरा मान लेता है। वैसे भी आज परंपरा का सवाल वास्तव में बार-बार परीक्षण की माँग करता है। खासकर आदिवासी परंपरा को समझने के लिए इतिहास और समाजशास्त्र की दोहरी जानकारी जरूरी है। साथ ही एक देशज और एथनिक नजरिया भी चाहिए। आज का आदिवासी समाज परंपरा के ऐसे संतुलन के लिए बेचैन है, जिसमें एक और वह अपनी पहचान भी कायम रख सके और विकास की दौड़ में पीछे भी न छूटे। वह यह भी चाहता है कि उसकी परंपरा को केवल इतिहास अध्ययन का विषय नहीं रहने दिया जाय बल्कि उसका एक क्रांतिकारी विकल्प बने।
लोकतंत्र का वर्त्तमान ढांचा जनप्रतिनिधि पर जननियंत्रण का कोई भी तरीका विकसित नहीं कर पाया और इस कारण जनता के प्रति जो जिम्मेदारी राजनीतिक दलो में होनी चाहिए वह नहीं दिखती है। इसलिए झारखण्ड में भी बाहरी भितरी का जादू चल जाता है। जबकि हर कोई यह स्वभाव जीता है कि झारखण्ड का मतलब ही है मेलजोल और प्रकृति अराधना की इस धरती पर बाहरी भितरी और सांप्रदायिकता की राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं है।
यह सच्चाई है कि आजादी के बाद आकर बसे हुए लोगों ने सांप्रदायिकता की राजनीति को यहां स्थापित करने का प्रयास किया और इसमें स्थानीय जनों को भी शामिल कर लिया लेकिन स्थानीय लोगों की इस भागीदारी के पहले उनकी सांस्कृतिक विरासतों के बारे में गलत मिथक बनाए गए। उसके आधार पर सांस्कृतिक खासियत के सवाल को गौण कर दिया गया। यह काम करने वाले लोगों ने इतिहास की आदिवासी अवधारणा के साथ पूरा खिलवाड़ किया और आदिवासी पहचान के सवाल को भी गौण किया। ऐसा किए बिना ऐसा खिलवाड़ संभव ही नहीं था। लेकिन आदिवासी जनता ने इस भ्रम को जल्द ही पहचानने का काम किया। खासकर विस्थापन विरोधी आंदोलनों ने आदिवासी चेतना की परंपरा को कुंद होने से बचाने का काम किया और उन्हें अपने को बचाए रखने के लिए सामूहिक संघर्ष करने की प्रेरणा से भी भर दिया।
आदिवासी समाज को लेकर बाहर की दुनिया के भी भ्रम टूटे हैं और एक बड़ी बात यह हुई है कि ऐसे ही समूहों की ओर से बात की जाने लगी है कि वर्तमान समस्याओं से देश और समाज ही नहीं दुनिया को केवल आदिवासी परंपरा ही बचा सकती है। जब यह बात की जाती हैं तब आदिवासियों को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि ज्यादातर मौखिक परंपरा और इतिहास चेतना के कारण यह खतरा बना ही रहता है कि आदिवासियों की वास्तविक चेतना को बाह्य तत्व अपने अनुकूल बना ले सकते हैं या ऐसी व्याख्या कर सकते हैं जिससे संस्कृति का मूल स्वरूप ही प्रभावित हो जाए। शोषण करने का यह भी एक तरीका है कि समाज अपने में ही दिग्भ्रम का शिकार हो जाए। आदिवासी समाज को जागना होगा ताकि उनके इतिहास के साथ कोई भी खिलवाड़ नहीं किया जा सके।
आदिवासी परंपरा के बारे में भी कुछ थोपा नहीं जा सके। अंग्रेज इतिहासकारों ने तो आदिवासी इतिहास की बुनियाद को ही बदल दिया है और मानव शास्त्रियों के अध्ययन में भी देशज बोध का अभाव है। ऐसी हालत में केवल मौखिक परंपरा के आधार पर ही आदिवासी जनतंत्र की निरंतरता को समझा जा सकता है और इंसाफपसंद नई दुनिया में यात्रा की जा सकती है।
बार-बार यह बात दुहराना होगा कि आदिवासियों के प्रतिरोध आंदोलन केवल क्षणिक विद्रोह नहीं थे बल्कि उसमें परंपरा के आधार पर अपनी स्वयत्तता को बहाल करने का इरादा था। यह इरादा इतना मजबूत था कि तमाम बौद्धिक हमलों के बाद भी आदिवासी स्वाभिमान को पूरी तरह कुचला नहीं जा सका। आदिवासी सामूहिकता खत्म नहीं की जा सकी और स्त्री-पुरूष बराबरी को भी खत्म नहीं किया जा सका। आदिवासी समाज ने पूरी ताकत के साथ सामंतवादी होने से अपने को बचाया और वह बराबरी वाले समाजतंत्र के लिए अब भी संघर्ष कर रहा है।
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