24 एकादशियों के पुण्य के समान फलदायी है निर्जला एकादशी व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को रखा जाता है निर्जला एकादशी का व्रत
निर्जला एकादशी हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण और कठिन एकादशी व्रतों में से एक मानी जाती है। इस दिन श्रद्धालु अन्न और जल दोनों का त्याग कर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि निर्जला एकादशी का व्रत रखने से 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ सबसे कठिन भी मानी जाती है, क्योंकि इस दिन अन्न और जल दोनों का त्याग करना होता है। यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है, जो इस वर्ष 25 जून को पड़ रही है।
एकादशी तिथि जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु की पूजा का दिन माना जाता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि एकादशी तिथि पर व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने पर भगवान विष्णु सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इसे सभी एकादशी व्रतों में विशेष स्थान प्राप्त है।

इस वर्ष निर्जला एकादशी पर बन रहे शुभ योग

निर्जला एकादशी के दिन दान का विशेष महत्व माना गया है। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार दान कर सकते हैं। इसके अलावा गोदान, जलदान, छाता दान एवं अन्नदान का विशेष महत्व बताया गया है, जो शुभ फलों की प्राप्ति कराता है।
मुहूर्त
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य प्रणव मिश्रा ने बताया कि 24 जून को रात्रि 08:09 बजे एकादशी तिथि प्रारंभ होगी, जबकि 25 जून को रात्रि 09:15 बजे इसका समापन होगा। 25 जून को पूरे दिन एकादशी तिथि रहने के कारण इसी दिन निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाएगा। व्रत का पारण 26 जून को किया जाएगा।
भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है?
वेदव्यास जी ने महाभारत में उल्लेख किया है कि पांडवों में भीम ने ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिना जल ग्रहण किए व्रत किया था।
पांडव भाइयों में भीम विशेष रूप से भोजन प्रिय थे। एक बार उन्होंने महर्षि वेदव्यास से कहा कि उनके सभी भाई और माता नियमित रूप से एकादशी व्रत रखते हैं, लेकिन उनके लिए महीने में दो बार उपवास करना अत्यंत कठिन है। उन्होंने पूछा कि क्या कोई ऐसा व्रत है, जिसे वर्ष में केवल एक बार करने से सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो सके।
तब वेदव्यास जी ने उन्हें ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने तथा अगले दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान देने का विधान बताया। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके बाद भीम ने निर्जला एकादशी का व्रत करना प्रारंभ किया। इसी कारण निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है।
आचार्य प्रणव मिश्रा www.samridhjharkhand.com वेबसाइट में ज्योतिष विभाग देखते हैं. वे झारखण्ड के रांची के रहने वालें हैं. समृद्ध झारखण्ड वेबसाइट में ज्योतिष, राशिफल, धर्म- ज्ञान, वास्तु इत्यादि विषयों पर लिखते हैं. आचार्य प्रणव को ज्योतिष में 20 साल से ज्यादा का अनुभव है. उन्होंने झारखण्ड के रांची यूनिवर्सिटी से ज्योतिष की पढ़ाई की है. आचार्य प्रणव ने हिंदुस्तान न्यूज़ पेपर, रांची से करियर की शुरुआत की. हिंदुस्तान न्यूज़ पेपर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर में लिखने का काम किया है.

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