JPSC-JSSC आंदोलन: बैरिकेड नहीं भरोसा चाहिए!
10 अगस्त के छात्र आंदोलन ने झारखंड की भर्ती व्यवस्था पर बढ़ते भरोसा-संकट को सामने ला दिया।
JPSC-JSSC आंदोलन पर आलेखकार संजय कुमार धीरज ने 10 अगस्त के छात्र प्रदर्शन को झारखंड की भर्ती व्यवस्था में गहराते भरोसा-संकट का प्रतीक बताया है। आलेख में विधानसभा की ओर बढ़ते छात्रों, पुलिस कार्रवाई और 9 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता देवेंद्रनाथ महतो की स्थिति का उल्लेख किया गया है। सरकार और छात्रों के बीच हुई वार्ता के बाद मांगों पर बनी सहमति के बावजूद दोनों पक्षों के दावों में अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
आलेख: संजय कुमार धीरज
10 अगस्त की दोपहर रांची की सड़कें गवाह बनीं एक ऐसे दृश्य की, जो महज़ प्रदर्शन नहीं था। यह झारखंड की भर्ती व्यवस्था पर लगे गहरे भरोसा-संकट का सार्वजनिक विस्फोट था। JPSC-JSSC रिफॉर्म मंच के बैनर तले हजारों छात्र विधानसभा की ओर बढ़े। हाथों में तख्तियां, गले में नारे। मानव-श्रृंखला बनी, बैरिकेड टूटे। पुलिस ने भीड़ रोकने के लिए वाटर कैनन चलाई, आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया।
भीड़ के बीच स्ट्रेचर पर लेटा एक चेहरा सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा - देवेंद्रनाथ महतो। 9 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता एंबुलेंस से उतरकर सीधे आंदोलन में शामिल हुए। उनकी कमजोर हालत ने इस संघर्ष की तीव्रता और छात्रों की हताशा दोनों को एक साथ सामने रख दिया।

सवाल ये है कि क्या 10 अगस्त को हुआ बल-प्रयोग "आवश्यक, न्यूनतम और विधिसंगत" था? लोकतंत्र में छात्र "अराजक" नहीं हैं। वे जवाबदेही मांगने वाले नागरिक हैं। राज्य का काम आवाज दबाना नहीं, संस्थागत जवाब देना है। झारखंड जैसे राज्य में सरकारी भर्ती का मतलब सिर्फ रोजगार नहीं है। यह सामाजिक गतिशीलता है। यह एक गरीब घर के बच्चे का भविष्य है।
जब परीक्षाएं बार-बार विवाद, बैकलॉग, रद्दीकरण और जांच में घिरती हैं, तो युवा के मन में एक बात बैठ जाती है - "मेहनत से ज्यादा सिस्टम की पकड़ जरूरी है"। यह एक परीक्षा का टूटना नहीं है। यह पूरे सामाजिक अनुबंध का टूटना है। इसलिए ये आंदोलन "त्काल मांग" से आगे निकलकर उस व्यवस्था से सवाल पूछ रहा है जो नौकरी को अवसर नहीं, अनिश्चित इंतजार बना रही है। राजनीति के लिए इस मुद्दे को पार्टी लाइन में बांटना सबसे आसान है। पर सबसे खतरनाक भी।
अगर समाधान सीबीआइ जांच, समयबद्ध पुनर्परीक्षा और निष्पक्ष प्रक्रिया तक नहीं पहुंचा, तो हर समझौता सिर्फ अस्थायी शांति होगा। और अगर खबरें सिर्फ पुलिस-कार्रवाई की बनती रहीं, तो ये आंदोलन छात्रों की नहीं, राज्य की कठोरता की कहानी बन जाएगा। नौ दिन भूखे रहकर एंबुलेंस से मार्च में आया छात्र बता रहा है कि यह लड़ाई भावनात्मक नहीं, अस्तित्वगत है।
सरकार और आंदोलनकारी दोनों के लिए सीख एक ही है - समाधान वाटर कैनन से नहीं निकलेगा। वो निकलेगा पारदर्शिता, समयबद्ध जांच और संस्थाओं पर भरोसे की बहाली से। बैरिकेड हट सकते हैं। पर उससे पहले भरोसे की दीवारें फिर से खड़ी करनी होंगी। तभी "जय झारखंड" का नारा सड़क से सदन तक सार्थक होगा।
(लेखक समृद्ध झारखंड के ब्यूरो और युवा पत्रकार संगठन के सदस्य हैं।)









