Dhavatal Akhara History: 1836 में अंग्रेजों को हराने वाला रांची का धवताल अखाड़ा आज भी भाईचारे की मिसाल

Dhavatal Akhara History: 1836 में अंग्रेजों को हराने वाला रांची का धवताल अखाड़ा आज भी भाईचारे की मिसाल

1836 में अंग्रेजों की चुनौती को स्वीकार कर जीत हासिल करने वाले धवताल अखाड़े की विरासत आज भी रांची में हिंदू-मुस्लिम एकता और शौर्य का प्रतीक बनी हुई है।

रांची का धवताल अखाड़ा: रांची में जब भी मुहर्रम के मौके पर अखाड़ों और जुलूसों की चर्चा होती है, एक नाम हर जुबान पर अपने आप आ जाता है 'धवताल अखाड़ा'। यह महज लाठी-डंडे और पारंपरिक हथियार चलाने वालों का अड्डा नहीं है। यह अखाड़ा उस शौर्य, उस गौरव और उस अनूठे सांप्रदायिक भाईचारे की जीती-जागती मिसाल है जो शायद पूरे देश में कहीं और नहीं मिलती। सन 1836 से आज तक यानी करीब 190 साल का सफर तय कर चुका यह अखाड़ा झारखंड की वह धरोहर है जिसकी तारीफ स्थानीय प्रशासन से लेकर दूसरे राज्यों के अधिकारी तक करते हैं।

आइए इतिहास के उन पन्नों को पलटते हैं जो बताते हैं कि धवताल कौन थे, कैसे उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम किया और क्यों उनका जीता हुआ परचम आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता की सबसे बड़ी पहचान है।

कौन थे वीर धवताल?

यह कहानी 1860 में IPC बनने से भी 24 साल पहले की है। 1836 का वह दौर था जब छोटानागपुर के पठारों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का जुल्म अपनी चरम सीमा पर था। जल, जंगल और जमीन पर काबिज अंग्रेज अधिकारी स्थानीय लोगों को रोज अपमानित करते थे। जबरन कर वसूली, बेगारी और कोड़ों की सजा आम थी।

उसी दौर में रांची में एक शख्स था जिसका नाम था धवताल। वे मुस्लिम समुदाय की गद्दी बिरादरी से थे जो मुख्यतः दूध बेचने और पशुपालन का काम करती थी। धवताल को घोड़ों से बेहद लगाव था। दौड़ते घोड़े पर वे ऐसे करतब दिखाते थे कि देखने वाले हैरान रह जाते। उनकी बहादुरी की चर्चा धीरे-धीरे पूरे रांची में फैल चुकी थी।

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जब अंग्रेजों की चुनौती धवताल ने स्वीकार की

1836 में ब्रिटिश हुक्मरानों ने एक प्रतियोगिता रखी जिसका असल मकसद भारतीयों को नीचा दिखाना था। रांची के एक बड़े मैदान में ऊंचा काला परचम गाड़ा गया। अंग्रेज अधिकारियों ने ऐलान किया कि जो दौड़ते घोड़े पर सवार होकर बिना गिरे इस परचम को उखाड़कर फिनिशिंग लाइन तक पहुंचाएगा, जीत उसी की होगी।

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अंग्रेजों को यकीन था कि उनके सिवा यह कोई नहीं कर सकता। राजा-रजवाड़ों और जमींदारों ने हाथ आजमाए लेकिन सब नाकाम रहे। कई लोग घोड़े से गिरकर चोटिल हुए। अंग्रेज ठहाके लगाते रहे।

यह अपमान धवताल से सहा नहीं गया। वे अपने घोड़े के साथ मैदान में उतरे और अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर चुनौती स्वीकार की। हवा की रफ्तार से घोड़ा दौड़ा, धूल का गुबार उठा और परचम के पास पहुंचते ही धवताल ने बिजली की तेजी से झुककर एक हाथ से उस भारी झंडे को जड़ से उखाड़ लिया। न संतुलन बिगड़ा, न घोड़े से गिरे। परचम लहराते हुए वे पूरी शान से मंजिल तक पहुंचे।

मैदान में पल भर के लिए सन्नाटा छा गया। फिर हजारों देशवासियों की तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा रांची गूंज उठा। अंग्रेजों के ठहाके बंद हो गए थे।

परचम मिला उपहार में, बनी अनोखी परंपरा

अपनी हार से हैरान अंग्रेजों ने वह ऐतिहासिक काला परचम धवताल को पुरस्कार में दे दिया। गुलामी के उस दौर में ब्रिटिश हुकूमत से ऐसी जीत का प्रतीक हासिल करना बहुत बड़ी बात थी। पूरे छोटानागपुर में जश्न मना। यह जीत किसी एक जाति या धर्म की नहीं, पूरे हिंदुस्तान की थी।

1890 में धवताल इस दुनिया से रुखसत हो गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है। रांची के अपर बाजार स्थित महावीर चौक के कर्बला में हर साल मुहर्रम की पहली तारीख को यह परचम फहराया जाता है। सबसे खूबसूरत बात यह है कि इस झंडे को उठाने में हिंदू और मुस्लिम दोनों कंधे से कंधा मिलाकर शामिल होते हैं। यह परचम अब महज एक धार्मिक निशान नहीं, देशप्रेम और भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।

रांची में पहला मुहर्रम जुलूस भी इसी अखाड़े का
एक और रिकॉर्ड इस अखाड़े के नाम है। रांची में मुहर्रम का पहला पारंपरिक जुलूस धवताल अखाड़े ने ही निकाला था। जब पहली बार यह जुलूस लेक रोड से होते हुए महावीर चौक पहुंचा तो हिंदू समाज ने फूलों की बारिश और गर्मजोशी से इसका स्वागत किया। यह रिवायत आज भी कायम है।

वक्त के साथ शहर में कई अखाड़े बने लेकिन धवताल अखाड़े का रुतबा वैसा ही रहा। आज भी जब मुहर्रम का जुलूस निकलता है तो यही अखाड़ा अगुवाई करता है। लेक रोड के मिलन चौक पर करीब 35 अखाड़ों को एकजुट कर धवताल अखाड़ा उन्हें महावीर चौक के कर्बला मैदान तक ले जाता है। वहां लाठी, तलवारबाजी और पट्टाबाजी के हैरतअंगेज करतब होते हैं जिनमें जाति-धर्म की दीवारें गिर जाती हैं। सबसे आखिर में जब बाकी सभी अखाड़े विदा हो जाते हैं तब धवताल अखाड़ा शांति से अपनी राह पकड़ता है। इसी अनुशासन और बड़प्पन की वजह से 190 साल बाद भी रांची का बच्चा-बच्चा इस अखाड़े को सलाम करता है।

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Edited By: Samridh Media Desk
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