Ranchi News: 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस: संघर्ष, संस्कृति और स्वाभिमान की विरासत से समावेशी विकास तक आदिवासी समाज का सफर
PESA, वनाधिकार कानून और संविधान के प्रावधान आदिवासी समाज के अधिकारों और स्थानीय स्वशासन का आधार
विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त को दुनिया के मूलनिवासी समुदायों के अधिकार, संस्कृति, परंपरा और योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। भारत में आदिवासी समाज की पहचान उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जल-जंगल-जमीन से गहरे संबंध और संघर्ष की गौरवशाली परंपरा से जुड़ी है। तिलका मांझी से बिरसा मुंडा और संथाल हूल से झारखंड आंदोलन तक आदिवासी समाज ने अपने अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया है। संविधान, पांचवीं अनुसूची, PESA और वनाधिकार कानून ने उनके अधिकारों को कानूनी आधार दिया है।
रांची: विश्व आदिवासी दिवस केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि दुनिया के मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों, संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को समझने का अवसर है। सदियों से आदिवासी समाज जंगल, पहाड़, नदियों और जमीन के साथ सह-अस्तित्व की जीवनशैली अपनाता रहा है। उनके लिए प्राकृतिक संसाधन महज आर्थिक संपदा नहीं, बल्कि जीवन, पहचान, संस्कृति और आध्यात्मिक आस्था का आधार रहे हैं।
इसी ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1994 में प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस (International Day of the World's Indigenous Peoples) के रूप में मनाने की घोषणा की। यह दिवस दुनियाभर के मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों पर चर्चा का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।

भारत की सांस्कृतिक विविधता में आदिवासी समाज की अहम भूमिका
झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और पूर्वोत्तर के राज्यों में आदिवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं आज भी जीवंत हैं। मुंडा, संथाल, उरांव, हो, खड़िया, बिरहोर, असुर, गोंड, भील, मीणा, नागा, मिजो, खासी और गारो सहित अनेक समुदाय भारत की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करते हैं।
आदिवासी जीवन-पद्धति में सामुदायिक सहयोग, प्रकृति के प्रति सम्मान, श्रम की गरिमा और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की परंपरा रही है। सरहुल, करमा और सोहराय जैसे पर्व प्रकृति और समुदाय के बीच संबंध को अभिव्यक्त करते हैं।
आज जब पूरी दुनिया सतत विकास और जलवायु न्याय की बात कर रही है, तब आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली इन अवधारणाओं का व्यवहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है।
औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष की गौरवशाली विरासत
भारत के इतिहास में आदिवासी प्रतिरोध की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। औपनिवेशिक शासन द्वारा जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिशों ने आदिवासी समुदायों की पारंपरिक व्यवस्था को प्रभावित किया। भूमि हस्तांतरण, बेगारी और वन अधिकारों के हनन के खिलाफ अनेक आंदोलन खड़े हुए।
तिलका मांझी, कोल विद्रोह (1831-32), संथाल हूल (1855-56) और भगवान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान (1899-1900) आदिवासी प्रतिरोध की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।
बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक शोषण के खिलाफ भी आवाज उठाई। भूमि अधिकार और आदिवासी अस्मिता के लिए उनका संघर्ष आज भी प्रेरणा का स्रोत है। बिरसा मुंडा को आज केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश में आदिवासी स्वाभिमान और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
झारखंड आंदोलन से राज्य निर्माण तक
स्वतंत्रता के बाद भी आदिवासी समाज की पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक अधिकार और जल-जंगल-जमीन के सवाल बने रहे। झारखंड क्षेत्र में अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे एक व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन में बदल गई।
मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में आदिवासी समाज के अधिकारों और विशिष्ट पहचान की प्रभावी वकालत की। बाद के दौर में अनेक जननेताओं ने जल, जंगल, जमीन और स्थानीय अधिकारों के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा।
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष और जनआंदोलन का परिणाम था। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन राज्य का गठन होना आदिवासी इतिहास और अस्मिता के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है।
संविधान ने दिया अधिकारों का मजबूत आधार
भारतीय संविधान ने अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण और विकास के लिए विशेष प्रावधान किए हैं। इनमें प्रमुख रूप से—
- अनुच्छेद 46 अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने की बात करता है।
- अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष व्यवस्था प्रदान करते हैं।
- छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में स्वायत्त प्रशासन की व्यवस्था करती है।
- अनुच्छेद 275(1) अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष केंद्रीय अनुदान का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 338A के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन किया गया है।
इन संवैधानिक व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल संरक्षण देना नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों को न्यायपूर्ण और सहभागी विकास का अवसर उपलब्ध कराना भी है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में आदिवासी ज्ञान की प्रासंगिकता
आज दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के संकट और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में आदिवासी समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
जल संरक्षण, सामुदायिक वन प्रबंधन, पारंपरिक बीजों का संरक्षण, औषधीय पौधों का ज्ञान और टिकाऊ कृषि जैसी व्यवस्थाएं आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय से मौजूद रही हैं।
इसलिए जरूरत केवल आदिवासी समाज की रक्षा करने की नहीं है, बल्कि उनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक पर्यावरण और विकास नीति का हिस्सा बनाने की भी है।
पेसा और वनाधिकार कानून से मजबूत हो सकता है ग्राम लोकतंत्र
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी PESA, 1996 ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाया। इसी तरह वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने वन पर निर्भर समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को कानूनी मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।
इन कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत कर सकता है। झारखंड जैसे राज्य में ग्राम सभा को वास्तविक अधिकार देकर जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा स्थानीय विकास के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
न्यायपालिका ने भी माना ग्राम सभा का महत्व
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर आदिवासी समुदायों के भूमि, वन और आजीविका संबंधी अधिकारों की व्याख्या की है। समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी हितों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए।
वहीं नियामगिरि मामले (2013) में ग्राम सभा की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया और आदिवासी समुदायों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े मामलों में ग्राम सभा की राय की अहमियत को रेखांकित किया गया।
ये फैसले बताते हैं कि विकास और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कायम करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
वैश्विक स्तर पर भी बढ़ी अधिकारों की स्वीकार्यता
वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples (UNDRIP) को स्वीकार किया। इसमें मूलनिवासी समुदायों के आत्मनिर्णय, संस्कृति, भाषा, शिक्षा, स्वास्थ्य और पारंपरिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों को महत्व दिया गया।
सतत विकास लक्ष्यों में भी गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, लैंगिक समानता, जलवायु संरक्षण और असमानता कम करने जैसे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आदिवासी समुदायों की भागीदारी आवश्यक मानी जाती है।
आज भी कई चुनौतियां कायम
संवैधानिक और कानूनी संरक्षण के बावजूद आदिवासी समाज के सामने आज भी कई चुनौतियां हैं। भूमि और विस्थापन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, भाषाई-सांस्कृतिक संरक्षण और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर प्रमुख मुद्दे हैं।
विश्व आदिवासी दिवस को केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय इन चुनौतियों के समाधान की दिशा में ठोस पहल का अवसर बनाना होगा।
इसके लिए आवश्यक है कि—
- पांचवीं अनुसूची और PESA का प्रभावी क्रियान्वयन हो।
- वनाधिकार कानून के लंबित दावों का समयबद्ध निपटारा किया जाए।
- मातृभाषा आधारित प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए।
- आदिवासी युवाओं के लिए कौशल विकास और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं।
- आदिवासी बहुल क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा और पुस्तकालयों की सुविधा विकसित की जाए।
- स्थानीय युवाओं को उद्योग और विकास परियोजनाओं में उचित अवसर मिले।
- पारंपरिक ज्ञान को पर्यावरण और जलवायु नीति से जोड़ा जाए।
- ग्राम सभाओं को वास्तविक निर्णयकारी अधिकार प्रदान किए जाएं।
- आदिवासी महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाए।
आदिवासी समाज को विकास का भागीदार बनाना होगा
विश्व आदिवासी दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि विकास की प्रक्रिया में आदिवासी समाज की भूमिका क्या होनी चाहिए। आदिवासी समुदायों को केवल सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में देखने के बजाय विकास के साझेदार, नीति-निर्माण में सहभागी और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षक के रूप में स्वीकार करना जरूरी है।
भारत की वास्तविक ताकत उसकी सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक परंपराओं में है। आदिवासी समाज ने देश को प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ संघर्ष, स्वाभिमान, सामुदायिक जीवन, लोकतांत्रिक सहभागिता और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का दर्शन भी दिया है।
यदि सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकार, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक विविधता को साथ लेकर विकास की दिशा तय की जाए, तो भारत अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी लोकतंत्र का उदाहरण बन सकता है।
विश्व आदिवासी दिवस का संदेश स्पष्ट है—किसी राष्ट्र की समृद्धि केवल उसकी खनिज संपदा या आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की गरिमा, सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक अधिकारों के सम्मान से तय होती है।
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