Opinion: संघ प्रमुख 75 में ‘सेवानिवृत्ति’ के पक्ष में, तो मोदी क्यों अपवाद!
भागवत का यह बयान विपक्षी दलों के लिए एक सुनहरा अवसर
भागवत का यह बयान कोई नया नहीं है. 2019 में भी उन्होंने इसी तरह की टिप्पणी की थी, लेकिन तब उन्होंने स्पष्ट किया था कि नरेंद्र मोदी इस नियम से अपवाद हैं, क्योंकि उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रासंगिकता असाधारण है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत (mohan bhagwat) ने हाल ही में नागपुर में एक पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान तल्ख टिप्पणी की कि 75 वर्ष की आयु पूरी होने पर नेताओं को सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए और नई पीढ़ी को अवसर देना चाहिए. यह बयान उन्होंने दिवंगत आरएसएस विचारक मोरोपंत पिंगले के हवाले से दिया, जिन्होंने कथित तौर पर कहा था कि 75 वर्ष की आयु में शॉल ओढ़ाए जाने का अर्थ है कि व्यक्ति को अब रुक जाना चाहिए और दूसरों को आगे आने देना चाहिए. भागवत का यह बयान, जो सामान्य प्रतीत होता है, ने भारतीय राजनीति में तीव्र चर्चा को जन्म दिया है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि यह बयान ऐसे समय में आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्वयं भागवत, दोनों सितंबर 2025 में 75 वर्ष के हो जाएंगे. इस बयान ने विपक्षी दलों को यह सवाल उठाने का अवसर दिया कि क्या यह टिप्पणी मोदी के लिए एक सूक्ष्म संदेश है या यह केवल एक सामान्य वैचारिक सिद्धांत की पुनरावृत्ति है.
सबसे पहले बता दें भागवत का यह बयान कोई नया नहीं है. 2019 में भी उन्होंने इसी तरह की टिप्पणी की थी, लेकिन तब उन्होंने स्पष्ट किया था कि नरेंद्र मोदी इस नियम से अपवाद हैं, क्योंकि उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रासंगिकता असाधारण है. इस बार, हालांकि, भागवत ने ऐसा कोई अपवाद स्पष्ट नहीं किया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या उनका दृष्टिकोण बदल गया है. यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारतीय जनता पार्टी (BJP) और आरएसएस के बीच संबंधों को लेकर चर्चा को हवा देता है. बीजेपी, जो आरएसएस की वैचारिक शाखा मानी जाती है, में पहले भी 75 वर्ष की आयु सीमा का अनौपचारिक नियम रहा है, जिसके तहत लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय राजनीति से हटाकर मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया गया था. लेकिन नरेंद्र मोदी के मामले में इस नियम को लागू करने की संभावना पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उनकी लोकप्रियता, वैश्विक कद, और पार्टी पर पकड़ अभी भी मजबूत है.

दूसरी ओर, भागवत का बयान स्वयं उनके लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि वह भी 75 वर्ष के हो रहे हैं. आरएसएस में कोई औपचारिक सेवानिवृत्ति की आयु सीमा नहीं है, और पिछले सरसंघचालकों ने तब तक पद संभाला, जब तक उनकी शारीरिक स्थिति अनुमति देती थी. उदाहरण के लिए, राज्जू भैया और के.एस. सुदर्शन ने 78 वर्ष की आयु में स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ा, जबकि बालासाहेब देवरस 79 वर्ष तक सरसंघचालक रहे. इस संदर्भ में, भागवत का बयान उनके अपने भविष्य के बारे में भी सवाल उठाता है. क्या वह स्वयं इस सिद्धांत का पालन करेंगे, या यह केवल एक वैचारिक टिप्पणी थी? आरएसएस के सूत्रों ने इस बयान को हल्का करने की कोशिश की है, यह कहते हुए कि यह केवल पिंगले के हास्यप्रिय स्वभाव को दर्शाने वाली कहानी थी, न कि कोई नीतिगत सुझाव.
इस बयान का समय भी महत्वपूर्ण है. यह बयान ऐसे समय में आया है, जब आरएसएस अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है, और बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटी है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान आरएसएस और बीजेपी के बीच शक्ति संतुलन को लेकर एक सूक्ष्म संदेश हो सकता है. 2024 के चुनावों से पहले भी दोनों संगठनों के बीच कुछ तनाव की खबरें थीं, विशेष रूप से जब बीजेपी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कहा था कि बीजेपी को अब आरएसएस की जरूरत नहीं है. भागवत के इस बयान को कुछ लोग आरएसएस की वैचारिक प्रभुता को पुनः स्थापित करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं.
इसके अलावा, यह बयान भारतीय राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन और उत्तराधिकार के व्यापक सवाल को भी उठाता है. बीजेपी में मोदी के बाद नेतृत्व की दौड़ में अमित शाह, नितिन गडकरी, और देवेंद्र फडणवीस जैसे नाम उभर रहे हैं. भागवत का बयान, चाहे वह सामान्य हो या लक्षित, इस चर्चा को और हवा देता है कि क्या बीजेपी में अब एक नई पीढ़ी को तैयार करने का समय आ गया है. हालांकि, मोदी की वैश्विक छवि और पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुए, उनके सेवानिवृत्त होने की संभावना कम लगती है, जब तक कि वह स्वयं इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाते.
लब्बोलुआब यह है कि मोहन भागवत का यह बयान एक साधारण वैचारिक टिप्पणी से कहीं अधिक है. यह न केवल बीजेपी और आरएसएस के बीच संबंधों की जटिलता को दर्शाता है, बल्कि भारतीय राजनीति में उम्र, नेतृत्व, और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डालता है. विपक्ष इसे एक अवसर के रूप में देख रहा है, जबकि बीजेपी इसे खारिज करने की कोशिश कर रही है. भागवत का यह बयान, चाहे वह सामान्य हो या लक्षित, भारतीय राजनीति में एक नए विमर्श को जन्म दे चुका है, और इसका प्रभाव आने वाले महीनों में और स्पष्ट होगा.
