महाराष्ट्र की राजनीति को क्या झारखंड के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए?

महाराष्ट्र की राजनीति को क्या झारखंड के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए?

 

क्या त्रिशंकु विधानसभा बनने पर भाजपा-झामुमो एक साथ आ सकते हैं?

रांची : महाराष्ट्र में सत्ता के उलटफेट ने सबको भौंचक कर रखा है. आमने-सामने की दो पार्टियां भाजपा-एनसीपी एक साथ आ गयीं. झारखंड में भी आमने-सामने की दो पार्टियां हैं भाजपा एवं झामुमो. यह चुनाव भाजपा बनाम झामुमो के बीच ही हो रहा है. झामुमो विपक्षी दलों के गठबंधन का अगुआ है. अगर विपक्षी गठबंधन को ठोस बहुमत मिलता है तो सरकार हेमंत सोरेन के नेतृत्व में बनेगी. अगर भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलता है तो सरकार रघुवर दास के नेतृत्व में ही बनेगी. पर, यह त्रिशंकु विधानसभा बनती है तो फिर क्या होगा.

मात्र 81 सदस्यों वाले झारखंड विधानसभा में बहुमत का मामला उलझा रहा है. पिछली बार भी भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था. वह आजसू के साथ बहुमत हासिल कर पायी थी और चुनाव बाद में बाबूलाल मरांडी की पार्टी झाविमो के सात में पांच विधायकों के दल-बदल से भाजपा ने अपने बूते बहुमत का जादुई नंबर प्राप्त किया. यानी चुनाव ने झारखंड में कभी किसी दल को बहुमत नहीं दिया. यह दलों का अपना राजनीतिक कौशल कहिए या पराक्रम जो उन्होंने बहुमत हासिल किया. राजनीतिक रूप से इतने छोटे राज्य में इतनी पार्टियों के सक्रिय होने का दूसरा उदाहरण भी शायद ही दिखे.

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झारखंड के राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी एवं झारखंड मुक्ति मोर्चा ही दो बड़ी पार्टियां हैं. बाकी सभी दलों चाहे वह कांग्रेस, आजसू, झाविमो या आजसू हो उनकी भूमिका सहयोगी की ही रही है.

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अब अगर झारखंड में एक बार फिर पुराना चुनाव परिणाम आता है और भाजपा बहुमत से कुछ संख्या से पीछे रहती है तो पुराने सहयोगी आजसू उससे सहज मित्रता कर सकती है, क्योंकि वह सिर्फ सीटों की संख्या से नाखुशी के आधार पर अलग हुई है, अन्य कोई बड़ा मुद्दा नहीं है.

पर, यदि बहुमत से भाजपा काफी पीछे रहती है और विपक्षी गठबंधन को भी बहुमत नहीं हासिल होता है तो एक वैकल्पिक सरकार के लिए भाजपा एवं झामुमो को एक साथ खड़े होने की जरूरत पड़ सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र तिवारी के अनुसार, अमित शाह ने लातेहार-लोहरदगा के दौरे के दौरान कांग्रेस को ही निशाना बनाया, उन्होंने हेमंत सोरेन पर कोई हमला नहीं किया, बल्कि उन्हें पुचकारा. उनका मानना है कि ऐसा चुनाव बाद की संभावनाओं के मद्देनजर किया गया है. राजेंद्र तिवारी के अनुसार, हेमंत पर केंद्रीय नेतृत्व की जगह मुख्यमंत्री रघुवर दास राजनीतिक हमले करते हैं. उन पर कुछ मामले भी हैं और चुनाव एलान के पूर्व उन्हें नोटिस भी भेजा गया है. भाजपा की राज्य इकाई जमीन खरीद मामले में बार-बार हेमंत सोरेन को घेरती रही है. महाराष्ट्र में अजीत पवार पर भी कई तरह के आरोप रहे हैं और भाजपा लगाती रही है. सितंबर में उन पर इडी ने एक केस भी दर्ज किया था. आज की राजनीति में यह सब संयोग ही है.

2009 के विधानसभा चुनाव में झारखंड में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. तब भाजपा एवं झामुमो को 18-18, कांग्रेस को 14, झाविमो को 11, आजसू को पांच एवं जदयू को दो सीटें प्राप्त हुई थीं. ऐसे में शिबू सोरेन के नेतृत्व मेें झामुमो-भाजपा सरकार बनी जिसमें रघुवर दास डिप्टी सीएम थे. हालांकि तब सांसद रहे शिबू सोरेन द्वारा अमेरिका के साथ मनमोहन सरकार के परमाणु संधि पर लोकसभा में कांग्रेस के पक्ष में वोट देने से नाराज भाजपा ने शिबू सोरेन सरकार गिरा दी. बाद में सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू रहा. पर, 2010 के उत्तरार्ध में फिर भाजपा-झामुमो सरकार की कवायद शुरू की गयी. इस बार भाजपा के अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में सरकार बनी और हेमंत सोरेन व सुदेश महतो डिप्टी सीएम बने. पर, फिर हेमंत सोरेन पर मुख्यमंत्री पद के बंटवारे का मामला उठाकर सरकार गिरा दी और फिर उनके नेतृत्व में कांग्रेस, राजद आदि के समर्थन से सरकार बनी.

यानी झामुमो समय-समय पर भाजपा से दोस्ती करता रहा है. यह हालात पर निर्भर करता रहा है. 23 दिसंबर के बाद हालात क्या होंगे यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यकीन मानिए कि अब भारतीय राजनीति में कुछ भी संभव है. यह मत भूलिए कि बिहार में आमने-सामने के दो दल जदयू-राजद भी एक साथ सरकार चला चुके हैं.

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Edited By: Samridh Jharkhand

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