बुद्ध और शंकराचार्य को एक साथ स्थान देती है काशी: आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण
काशी उत्सवों की भूमि है’— शब्दोत्सव 2025 में गूंजे आचार्य के विचार
काशी शब्दोत्सव 2025 में आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने कहा कि काशी बुद्ध और शंकराचार्य दोनों को समान स्थान देने वाली भूमि है। उन्होंने शब्दों की शक्ति, संस्कृत की संपदा और काशी की उत्सवधर्मी संस्कृति पर अपने विचार रखे।
वाराणसी: मिथिलेशनन्दिनीशरण महाराज ने अपनी ही आग में जो जल मरे, जहां अधजली चिताओं से मिलकर, रचा है शब्दोत्सव (काशी), इन पंक्तियों को रखते हुए कहा कि काशी के अर्थों में महत्वपूर्ण है 'उत्सव'। अब 'उत्सव' कम रह गए हैं। शब्दोत्सव में शब्द जुड़ा है। जब उत्स बचा रहेगा, तभी उत्सव होगा। काशी, बुद्ध और शंकराचार्य को एक साथ जगह देती है। काशी की गुणवत्ता सिर्फ चंदन कमंडल में नहीं है, बल्कि चांडाल के शब्द में भी दिखता है। यहां गुरु का शब्द उच्चारण किसी उत्सव की तरह प्रतिदिन होता है।
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण महाराज यहां रविवार काे वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग और विश्व संवाद केंद्र (काशी) की ओर से स्वतंत्रता भवन में आयोजित काशी शब्दोत्सव 2025 'विश्व कल्याण : भारतीय संस्कृति' को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।

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