पुस्तक संस्कृति और पुस्तकालय: किताबें कुछ कहना चाहती हैं
सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने पढ़ने की आदतों को बदल दिया है
टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने पढ़ने की आदत और पुस्तक संस्कृति के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। पुस्तकालय कभी ज्ञान, विचार और संवाद के महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करते थे, लेकिन बदलते समय में उनकी भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है।
अशोक सिंह
एक ऐसे समय में जब टेक्नोलॉजी के इस दौर में किताबें पढ़ने का चलन कम होता जा रहा है, मुझे लगता है कि आज पुस्तक संस्कृति, पुस्तकालय और किताबों के पठन-पाठन पर भी विमर्श होना चाहिए।

गूगल ने तो किताबों को लेकर एक बड़ी योजना शुरू की है उसने 200 देशों के चार सौ भाषाओं में करीब डेढ़ करोड़ किताबें डिजिटलाइज्ड की है। उसका मानना है कि भविष्य में अधिकतर लोग किताबें ऑनलाइन पढ़ना पसंद करेंगे। वह सिर्फ ई-बुक ही खरीदेंगे। उन्हें वर्चुअल रैक या यूं कहें कि अपनी निजी लाइब्रेरी में रखेंगे। एक पक्ष यह भी है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट ने किताबों को सर्व सुलभ कराने में मदद की है। एक शोध के मुताबिक अमेरिका में ई-बुक डिवाइस का इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग 2 करोड़ तक पहुंच जाएगी।
यह भी सच है कि ऑनलाइन बिक्री के आंकड़े तो बताते हैं कि हिन्दी किताबों की बिक्री बड़ी है। हिन्दी भाषी महानगरों से तो ऐसा आभास होता है कि हिन्दी का विस्तार हो रहा है लेकिन थोड़ा दूर जाते ही हकीकत सामने आ जाती है। वो हकीकत यह है कि पहले हिंदी पट्टी के तमाम छोटे-बड़े सभी शहरों में साहित्यिक पत्र पत्रिकाएं और किताबें आसानी से उपलब्ध हो जाती थीं। लोगों खरीदते भी थे और पढ़ते भी थे लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्थितियां बदल गई। हिंदी के जाने-माने लेखक की भी किताबें आज आपको आसानी से नहीं मिलेंगी। हिंदी भाषी क्षेत्र की समस्या यह रही है कि वह पुस्तक और पुस्तकालय संस्कृति को विकसित नहीं कर पाए।
आज हर छोटे-बड़े शहरों में मॉल कल्चर बहुत तेजी से विकसित हो रहा है। नई मॉल संस्कृति में हम किताबों के लिए कोई स्थान नहीं निकाल पाए। आप अपने आसपास के मॉल पर नजर डालें तो आपको एक भी किताबों की दुकान नजर नहीं आएगी।
कैसी विडम्बना है कि हम सब आधुनिकता के एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां जूते चमचमाती दूकानों पर शो केस में दिख रहे हैं, वहां किताबें फूटपाथ पर बिक रही हैं।
यह जान लीजिए कि एक अच्छी लाइब्रेरी के बिना सूचनाएं तो मिल जायेंगी लेकिन ज्ञान अर्जित नहीं किया जा सकता। अपने आसपास देख लीजिए जो अच्छे पुस्तकालय थे, वह बंद हो रहे हैं। कुछ थोड़े बहुत बचे भी हैं तो उनकी हालत अच्छी नहीं है। हां, यह भी सच है कि इधर हाल के कुछ वर्षों में छोटे बड़े शहरों में नई नई लाइब्रेरी खुल भी रही है जिसमें अपवाद स्वरूप कुछ एक सरकारी लाइब्रेरी को छोड़कर अधिकतर लाइब्रेरी वैसी है जो पुस्तक संस्कृति विकसित करने वाली लाइब्रेरी नहीं बल्कि व्यावसायिक लाइब्रेरी है जिसका मुख्य उद्देश्य प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने और उसमें सम्मिलित होने वाले विद्यार्थियों के लिए सिर्फ सुविधायुक्त स्थान और घर से दूर पठन-पाठन का एक वातावरण देने वाला रहा है। वो भी सुविधा शुल्क की शर्तों पर जिसके मूल में व्यावसायिकता है।
एक दौर था जब लोगों की निजी लाइब्रेरी हुआ करती थी और इसको लेकर एक गर्व का भाव होता था कि उनके पास इतनी बड़ी संख्या में किताबों का संग्रह है लेकिन आज हम ऐसी संस्कृति विकसित नहीं कर पा रहे हैं।
हमारे समय का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि इस दौर में किताबों का संग्रह रखने वाले और उससे जुड़े पढ़ने लिखने वाले लोगों को उस कदर सम्मान नहीं दिया जाता, जिस कदर धन-बल से सम्पन्न रहने वाले लोगों का सम्मान किया जाता है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि आज पुस्तक संस्कृति और पुस्तकालय ही नहीं बल्कि पढ़ने लिखने वाले गंभीर लोग, पुस्तकालयाध्यक्ष और पुस्तकालय कर्मी उपेक्षा के शिकार हैं। पुस्तकालय दिवस जैसे अवसरों पर भी उनकी सुध लेने वाला आज कोई नहीं है।
पुस्तक संस्कृति और पुस्तकालय की उपेक्षा का दूसरा सबसे बड़ा नुकसान विचारधारा के मोर्चे पर उठाना पड़ रहा है क्योंकि तकनीक ने पढ़ने के तौर-तरीकों को आसान तो बनाया है लेकिन पढ़ने की प्रवृत्ति को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है। इसका नतीजा यह है कि आज नई पीढ़ी के विद्यार्थी किसी भी विचारधारा के साहित्य को गंभीरता से नहीं पढ़ रहे, वे सिर्फ नारों में ही उलझ कर रह जा रहे हैं। उन्हें विचारों की गहराई का ज्ञान नहीं हो पाता है। जो बाद में जाकर सिर्फ भीड़ का हिस्सा भर बन कर रह जाते हैं। यह एक बड़ी सच्चाई है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। यह पुस्तकालय, पुस्तक संस्कृति और पठन-पाठन पर विमर्श के लिए जरूरी भी है और समय की मांग भी। पुस्तकालय दिवस पर आज लाइब्रेरी के बुकसेल्फ में बंद पड़ी किताबों से आती आवाजों को हमें गंभीरता से सुनना और गुनना चाहिए! सफदर हाशमी के शब्दों में कहें तो किताबें कुछ कहना चाहती हैं ..... पास रहना चाहती हैं.......!
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.









