Book Review: छऊ की देह, आत्मा और परंपरा का समग्र वितान प्रस्तुत करती है यह पुस्तक
संगीत नाटक अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक में छऊ का व्यापक सांस्कृतिक विश्लेषण
संजय कुमार चौधरी की पुस्तक 'छऊ नृत्य : विन्यास व वितान—एक वीक्षण' छऊ नृत्य को केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, लोक स्मृति और परंपरा के व्यापक आयामों के रूप में प्रस्तुत करती है। संगीत नाटक अकादमी द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक इतिहास, कलात्मक संरचना, मुखौटा परंपरा, साधना, लोकजीवन और समकालीन चुनौतियों का गंभीर अध्ययन करती है।
छऊ नृत्य पर पर्याप्त लिखा गया है, किंतु किसी जीवंत लोक-परंपरा पर लिखने की सार्थकता केवल नई सूचनाएँ जुटाने में नहीं, बल्कि परिचित तथ्यों के भीतर छिपे सांस्कृतिक अर्थों को नए ढंग से उद्घाटित करने में होती है। संजय कुमार चौधरी की पुस्तक ‘छऊ नृत्य : विन्यास व वितान—एक वीक्षण’ इसी अर्थ में उल्लेखनीय कृति है। संगीत नाटक अकादमी द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक छऊ को केवल एक नृत्य-शैली या मंचीय प्रदर्शन के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसके इतिहास, साधना, सामाजिक संरचना, लोक-स्मृति, धार्मिक-सांस्कृतिक आधार और बदलते समय की चुनौतियों को एक विस्तृत सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करती है।
छऊ भारतीय नृत्य-परंपरा का ऐसा विशिष्ट रूप है, जिसमें युद्ध-कौशल की ऊर्जा, लोकजीवन की सहजता, पौराणिक आख्यानों की स्मृति, संगीत की लय और देह की नाटकीय भाषा एक साथ उपस्थित होती हैं। सरायकेला, मयूरभंज और पुरुलिया की तीन प्रमुख शैलियों में विकसित छऊ की अपनी-अपनी विशिष्टताएँ हैं। संजय चौधरी की पुस्तक की विशेषता यह है कि वह इस बहुरंगी परंपरा को किसी एक शैली अथवा प्रादेशिक सीमा में बाँधकर नहीं देखते। लेखक के लिए छऊ एक प्रदर्शन मात्र नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का बहुआयामी रूप है।

पुस्तक छऊ के ऐतिहासिक विकास, क्षेत्रीय विविधताओं, कलात्मक संरचना, शास्त्रीय संदर्भों और सांस्कृतिक आधारभूमि की पड़ताल करते हुए एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचती है कि छऊ को केवल ‘लोकनृत्य’ कह देना उसके विराट स्वरूप को सीमित कर देना है। इसमें लोक और शास्त्र, परंपरा और प्रयोग, सामुदायिक स्मृति और व्यक्तिगत साधना का अद्भुत समन्वय है। रामायण, महाभारत, पुराणों तथा अन्य धार्मिक आख्यानों से कथावस्तु ग्रहण कर छऊ कलाकारों ने नृत्य, संगीत, मुखौटे और शारीरिक भंगिमाओं के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है।
विशेष रूप से मुखौटा छऊ में केवल चेहरे को ढकने वाला उपकरण नहीं रह जाता; वह चरित्र की दूसरी देह बन जाता है। मुखौटे की स्थिर अभिव्यक्ति के बावजूद कलाकार अपनी देह, गति, उछाल, मुद्रा और लय से भावों का संसार रचता है। यही छऊ की कलात्मक चुनौती और सौंदर्य है। पुस्तक का ‘विन्यास’ इसी दृश्य संरचना की ओर संकेत करता है तो ‘वितान’ उसके विस्तृत सांस्कृतिक आकाश को सामने लाता है।
कृति का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष छऊ के साधकों के प्रति लेखक की संवेदनशीलता है। यह कला बड़े संस्थानों से पहले उन ग्रामीण कलाकारों, गुरुओं और समुदायों की देन है, जिन्होंने सीमित साधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद इसे जीवित रखा। लेखक उनकी साधना को उचित सम्मान देते हुए यह रेखांकित करते हैं कि किसी लोककला का इतिहास केवल उसकी प्रस्तुतियों का इतिहास नहीं होता, वह उन अनाम अथवा अल्पज्ञात साधकों के संघर्ष का इतिहास भी होता है जिन्होंने उसे पीढ़ियों तक सँजोया।
पुस्तक समकालीन प्रश्नों से भी मुँह नहीं मोड़ती। आधुनिक मंच, नई दर्शक-रुचि, संस्थागत हस्तक्षेप और वैश्विक सांस्कृतिक संपर्कों ने छऊ की प्रस्तुति में परिवर्तन किए हैं। लेखक परिवर्तन का विरोध नहीं करते, किंतु इस बात के प्रति सजग करते हैं कि नवाचार ऐसा हो जिससे कला की मूल संवेदना और सांस्कृतिक संदर्भ नष्ट न हों। संरक्षण का अर्थ परंपरा को संग्रहालय में रख देना नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता बनाए रखते हुए उसे समय से संवाद करने योग्य बनाना है।
स्त्रियों की बढ़ती भागीदारी को भी पुस्तक छऊ की समकालीन यात्रा के महत्त्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में देखती है। इसके साथ प्रशिक्षण, शोध, प्रलेखन, पाठ्यक्रम निर्माण और कलाकारों को आर्थिक-संस्थागत सहयोग देने की आवश्यकता पर बल पुस्तक को भविष्यदृष्टि प्रदान करता है।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक शोधपरक होते हुए भी बोझिल अकादमिकता से यथासंभव बचती है। कहीं-कहीं विवरण और संदर्भों का विस्तार सामान्य पाठक से अतिरिक्त धैर्य की माँग अवश्य करता है, किंतु विषय की व्यापकता को देखते हुए यह स्वाभाविक है। इसका महत्त्व इस बात में है कि यह छऊ को देखने के साथ-साथ उसे पढ़ने, समझने और उसके पीछे सक्रिय समाज को पहचानने की दृष्टि देती है।
"यह पुस्तक पढ़ने के बाद छऊ केवल मंच पर दिखाई देने वाला नृत्य नहीं रह जाता; वह भारतीय लोकचेतना की एक जीवित सांस्कृतिक परंपरा के रूप में पाठक के सामने उपस्थित होता है। यही किसी गंभीर अध्ययन की वास्तविक सफलता है।"
संगीत नाटक अकादमी द्वारा इसका प्रकाशन इस अध्ययन की उपयोगिता को और व्यापक बनाता है। छऊ के अध्येताओं, कलाकारों, शोधार्थियों और भारतीय लोक एवं प्रदर्शन कलाओं में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह कृति निश्चय ही एक उपयोगी संदर्भ-ग्रंथ के रूप में अपनी जगह बनाने की क्षमता रखती है।
आशुतोष प्रसाद
साहित्यकार एवं समीक्षक
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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