नवजात के शव कुत्तों को परोसे गए, कलंकित हुई मानवता
समृद्ध डेस्क: कहते हैं मानवता संवेदना पर आश्रित है। आचरण यदि इसके प्रतिकूल हो तो इसकी परिभाषा बदल जाती है। सभ्यता असभ्यता में परिणत हो जाती है। इसी कड़ी में हम वैसी घटना का जिक्र करते हैं, जो रोंकटे खड़े करा कर देगी। सवाल यह भी है कि यदि नवजात का शव कुत्तों को भोजन के रुप में परोसा जाए, तो इसे क्या कहा जा सकता है ? बावजूद प्रशासन यदि ऐसे घृणित वारदातों पर लगात नही कसता तो सवालिया निशान लगना लाजमीय है। ये भावना झारखंड की एक स्वयं सेवी संगठन यानि एनजीओं ने गढ़वा में एक हृदय विदारक घटना के बाद अपने fb में शेयर की है, इस पक्ष को मजबूती से रखने के लिए समृद्ध झारखंड की टीम ने इसमें भाषाई रुप से फेरबदल की है।
सही मायने में यह सभ्य समाज की मुंह पर असभ्यता का करारा तमाचा कहा जा सकता है। 2019 में गढ़वा में परित्यक्त नवजात बच्चों की कई घटनाओं की रिर्पोट हुई हैं। इसका सबसे दुखद पक्ष ये है कि अधिकांश बच्चे ने महज लापरवाही व सटीक इलाज के आभाव में दम तोड़ा है। संगठन की झारखंड प्रमुख मोनिका आर्य का पक्ष है कि ऊपर बैठे अधिकारियों ने इस पर यदि कोई कार्रवाई की होगी, जिससे सभी संबंधित स्टेकहोल्डर्स को कड़ा मेसेज मिलता कि बच्चों के संरक्षण में बरती जाने वाली लापरवाही बर्दाश्त नही होगी। इनका मानना है कि शायद ही ऐसे कोई आलाधिकारी होंगे, जो इससे अनभिज्ञ होंगे। ऐसे में कार्रवाई के नही होने से लोगों के मन में आक्रोश का जन्म भी हो रहा है। संस्था का यह भी पक्ष है कि झारखंड में ही ऐसा संभव है, अन्यथा दिल्ली जैसे क्षेत्र में इससे संबंधित अधिकारी नप गए होते। विडंबना है कि यहां ये तय ही नही हो पा रहा है, कि ऐसे मामलों का संज्ञान जिले व राज्य स्तर पर बाल संरक्षण से जुड़ी कौन सी एजेंसी, विभाग या अधिकारी लेंगे ? लाख टके का सवाल ये है कि जहां हृदय बच्चों के लिए नही पिघल रहे, वहां मानवता कैसे सांस ले सकेगी ?




