Sahibganj News: उत्तरवाहिनी गंगा बनी अभिशाप, गदाई दियारा सहित 14 गांवों में जिंदगी पानी-पानी
कच्चे-पक्के घर और खेत जलमग्न, कई परिवार बांधों और सड़कों पर लेने को मजबूर हुए शरण
साहिबगंज में उत्तरवाहिनी गंगा का जलस्तर बढ़ने से राजमहल के गदाई दियारा सहित करीब 14 गांव बाढ़ की चपेट में हैं। हजारों परिवार प्रभावित हैं और मवेशियों के लिए चारे का संकट गहरा गया है।
संजय कुमार धीरज
साहिबगंज। झारखंड का गौरव और एकमात्र जिला जहां मां गंगा उत्तरवाहिनी होकर बहती हैं, वो है साहिबगंज। इसी उत्तरवाहिनी गंगा के नाम पर लोग अपने पाप धोने आते हैं, इसे वरदान मानते हैं। लेकिन बरसात के मौसम में यही वरदान दियारा वासियों के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है। गंगा का रौद्र रूप इस बार फिर राजमहल प्रखंड को निगलने लगा है। और इस अभिशाप की सबसे दर्दनाक, रुला देने वाली तस्वीर सामने आई है राजमहल प्रखंड के महाराजपुर स्थित गदाई दियारा से, जिसने हर देखने वाले की आंखें नम कर दी हैं।तस्वीर ऐसी जो दिल चीर दे
14 गांवों में मातम जैसा सन्नाटा, हजारों परिवार प्रभावित
मवेशी ही पूंजी, वही डूब रही है
दियारा के लोगों के लिए ये मवेशी सिर्फ जानवर नहीं, उनकी एटीएम हैं, उनकी पूंजी हैं, उनके परिवार का हिस्सा हैं। दूध बेचकर ही उनका घर चलता है। आज वही पूंजी आंखों के सामने पानी में घिरी मरने की कगार पर है। चारा कहीं नहीं है। जो थोड़ा बहुत सूखा भूसा रखा था, वो भी पानी में बह गया। ग्रामीण बताते हैं कि मवेशी दो-दो दिन से भूखे हैं। बीमारियां फैलने का डर अलग सता रहा है।
राहत सामग्री ऊंट के मुंह में जीरा
सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल है। हां, प्रशासन की तरफ से राहत सामग्री बांटी जरूर जा रही है, लेकिन दियारा के लोगों का कहना है कि यह मदद समंदर में एक बूंद के बराबर है। नावों की भारी कमी है। कई टोलों तक अभी तक सरकारी नाव या राहत नहीं पहुंची है। जो पैकेट मिल रहा है, उसमें 1-2 किलो चूड़ा और थोड़ा गुड़ है, जो एक बड़े परिवार के लिए एक वक्त के लिए भी काफी नहीं है। पीने के साफ पानी के लिए लोग तरस रहे हैं। लोग गंगा का ही गंदा पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे डायरिया और बुखार फैलने का डर है।
प्रशासन से मार्मिक अपील
बाढ़ पीड़ितों ने जिला प्रशासन और राजमहल अनुमंडल प्रशासन से हाथ जोड़कर गुहार लगाई है कि हर टोले में तुरंत सरकारी नाव की व्यवस्था की जाए। मवेशियों के लिए तत्काल हरे चारे और पशु चिकित्सक की व्यवस्था हो। पीने के पानी, जीवन रक्षक दवाईयां, पॉलीथिन शीट, और सूखा राशन पर्याप्त मात्रा में पहुंचाया जाए।
किसानों की मजबूरी या सिस्टम की लाचारी
ये तस्वीर सिर्फ बाढ़ की तबाही नहीं दिखाती, ये इंसान और बेजुबान के बीच के अटूट रिश्ते, किसान की मजबूरी और सिस्टम की लाचारी को भी दिखाती है। जहां इंसान और जानवर दोनों एक ही टापू पर जिंदगी की भीख मांग रहे हैं। यह सिर्फ राजमहल प्रखंड की बात नहीं है, सदर प्रखंड और उधवा प्रखंड के सैकड़ों गांवों के 60 हजार से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। सवाल अब भी वही है - बाढ़ पीड़ितों की यह दर्द भरी चीख क्या जिला प्रशासन के अधिकारियों से होते हुए रांची के सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी? क्या इन बेजुबानों और इंसानों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा?
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
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