डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड को जस्ट ट्रांज़िशन के रणनीतिक वित्तीय साधन के रूप में विकसित करने की जरूरत
डीएमएफ के माध्यम से जस्ट ट्रांज़िशन की तैयारी मजबूत करने हेतु टास्कफोर्स और सीड ने जारी की रिपोर्ट
टास्कफोर्स–सस्टेनेबल जस्ट ट्रांज़िशन और सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) ने झारखंड में डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) फंड की स्थिति और जस्ट ट्रांज़िशन की तैयारी पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की।
रिपोर्ट की प्रमुख बातें
- अप्रैल 2026 तक झारखंड ने डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) फंड के तहत 18,231 करोड़ रुपये संग्रहित किए हैं, जो राष्ट्रीय कुल का 16.3 प्रतिशत है। इस मामले में राज्य ओडिशा के बाद देश में दूसरे स्थान पर है।
- झारखंड का डीएमएफ राजस्व मुख्यतः कोयला क्षेत्र से आता है, जिसका योगदान लगभग 69.15 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर कोयला-आधारित डीएमएफ संग्रह में राज्य की हिस्सेदारी करीब 29.83 प्रतिशत है।
- धनबाद, पश्चिमी सिंहभूम, चतरा, रामगढ़, बोकारो और हजारीबाग जैसे जिलों के पास कुल डीएमएफ फंड का लगभग 77.8 प्रतिशत हिस्सा है, जहां प्रत्येक जिले के पास हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि उपलब्ध है।
- राज्य के सभी 24 जिलों में डीएमएफ लागू है। इनमें 62 प्रतिशत जिलों ने 60 प्रतिशत से अधिक राशि उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में आवंटित की है, जबकि केवल 37 प्रतिशत जिले ही पीएमकेकेकेवाई दिशा-निर्देशों के 70 प्रतिशत मानक को पूरा कर पाए हैं।
- झारखंड के डीएमएफ फंड में अप्रैल 2026 तक 8,434 करोड़ रुपये की अप्रयुक्त राशि उपलब्ध है।
रांची: टास्कफोर्स–सस्टेनेबल जस्ट ट्रांज़िशन, झारखंड सरकार और सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) ने संयुक्त रूप से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ‘एलाइनिंग डीएमएफ फॉर फ्यूचर-रेडी झारखंड: ए डिस्ट्रिक्ट रेडिनेस फ्रेमवर्क फॉर रेजिलिएंस एंड जस्ट ट्रांज़िशन’ जारी की।
यह रिपोर्ट झारखंड में डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ) फंड की वर्तमान स्थिति और जस्ट ट्रांज़िशन की तैयारी में इसकी संभावित भूमिका का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। टास्कफोर्स एवं सीड द्वारा तैयार यह रिपोर्ट मुख्य रूप से फाइनेंशियल रेडिनेस (वित्तीय तैयारी), इंस्टीट्यूशनल रेडिनेस (संस्थागत तैयारी) और सामाजिक-आर्थिक संदर्भ के विश्लेषण पर आधारित है।

टास्कफोर्स–सस्टेनेबल जस्ट ट्रांज़िशन, झारखंड सरकार के अध्यक्ष ए.के. रस्तोगी (आईएफएस, सेवानिवृत्त) ने कहा कि प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेकेवाई) दिशा-निर्देशों में हालिया संशोधन डीएमएफ की भूमिका को और अधिक मजबूत बनाते हैं। उन्होंने कहा कि डीएमएफ देश के खनन-प्रभावित जिलों के लिए जिला-आधारित सार्वजनिक वित्त का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभरा है, जिसमें आर्थिक विविधीकरण, आजीविका संवर्धन, ऊर्जा योजना और पर्यावरणीय रूप से सतत विकास को बढ़ावा देने की व्यापक क्षमता है।
खनन एवं भूतत्व विभाग, झारखंड सरकार के निदेशक-खनन राहुल कुमार सिन्हा (आईएएस) ने कहा कि डीएमएफ को दीर्घकालिक, स्थानीय और भविष्य-उन्मुख विकास के रणनीतिक साधन के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि योजनाओं को इस प्रकार तैयार किया जाना चाहिए कि वे स्थानीय समुदायों की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करें और उन्हें आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाएं।
एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड के रीजनल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर एवं सीईओ नवीन जैन ने डीएमएफ योजना प्रणाली को मजबूत करने, संशोधित पीएमकेकेकेवाई ढांचे के अनुरूप जिला-स्तरीय निवेश सुनिश्चित करने तथा जस्ट ट्रांज़िशन की दिशा में इसकी रणनीतिक भूमिका को लेकर साझा समझ विकसित करने पर बल दिया।
सीड के सीईओ रमापति कुमार ने कहा कि संसाधन-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में क्लाइमेट फाइनेंस और जस्ट ट्रांज़िशन से जुड़े वित्त-पोषण की कमी महसूस की जा रही है। ऐसे में डीएमएफ स्थानीय स्तर पर ट्रांज़िशन प्लानिंग को गति देने वाला एक महत्वपूर्ण वित्तीय स्रोत बन सकता है। उन्होंने कहा कि जिला-स्तरीय योजना में विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और समुदाय की भागीदारी से डीएमएफ के बेहतर क्रियान्वयन एवं कन्वर्जेन्स की आवश्यकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि डीएमएफ का उद्देश्य खनिज राजस्व के एक हिस्से को प्रभावित जिलों के कल्याण और विकास में उपयोग करना है, लेकिन मुख्य चुनौती संसाधनों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उन्हें योजनाबद्ध, लक्षित और दीर्घकालिक विकास परिणामों में परिवर्तित करने की क्षमता है।
रिपोर्ट के अनुसार, संशोधित पीएमकेकेकेवाई दिशा-निर्देश (2024), जिनमें पांच वर्षीय परिप्रेक्ष्य योजना और उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अनिवार्य व्यय का प्रावधान शामिल है, जवाबदेही, योजना दक्षता और दीर्घकालिक विकास परिणामों को बेहतर बनाने पर जोर देते हैं।
विश्लेषण में यह भी रेखांकित किया गया कि डिस्ट्रिक्ट रेडिनेस वित्तीय निवेश, संस्थागत क्षमता और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों जैसे कारकों के संतुलन पर निर्भर करती है, जो विभिन्न जिलों में असमान है। बोकारो, पूर्वी सिंहभूम और रामगढ़ जैसे जिले अपेक्षाकृत बेहतर मानव विकास संकेतकों के कारण बेहतर स्थिति में हैं, जबकि पाकुड़, पश्चिमी सिंहभूम और लातेहार जैसे जिले अब भी पीछे हैं।
रिपोर्ट में इन जिलों में अधिक लक्षित, क्षमता-विकास आधारित और समुदाय-केंद्रित निवेश की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
कार्यक्रम के दौरान डीएमएफ की उपयोगिता पर तकनीकी सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें प्रमुख वक्ताओं और विशेषज्ञों ने भाग लिया। इनमें ममता कुमारी (अध्यक्ष, जिला परिषद, चतरा), अर्पित शर्मा (सीईओ, स्किल काउंसिल फॉर ग्रीन जॉब्स), राम बाबू प्रसाद (एडवाइजर, एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड), सौमित्र सिंह (विशेषज्ञ), अरविंद कुमार ठाकुर (डायरेक्टर-रिसर्च, सीड), सृष्टि पल्लव (डायरेक्टर, पॉलिसी एवं पार्टनरशिप, सीड) और श्वेता चौधरी (मैनेजर-पॉलिसी, सीड) प्रमुख रूप से शामिल थे।
तकनीकी सत्र में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा हुई। इनमें डीएमएफ के वित्तीय क्रियान्वयन, सुशासन और योजना प्रणाली को मजबूत करना, संस्थागत नवाचार और बेस्ट प्रैक्टिसेज को बढ़ावा देना, जिला-केंद्रित आवश्यकताओं के अनुरूप निवेश को प्राथमिकता देना, सामुदायिक भागीदारी एवं सोशल ऑडिट के जरिए पारदर्शिता सुनिश्चित करना, खनन-निर्भर जिलों में आर्थिक विविधीकरण को प्रोत्साहित करना, श्रमिकों के कौशल विकास में निवेश बढ़ाना, ऊर्जा सुरक्षा को डीएमएफ योजना में एकीकृत करना तथा इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन और क्लाइमेट रेजिलिएंस उपायों को प्राथमिकता देना शामिल रहा।
कार्यक्रम में नीति-निर्माताओं, विभागीय अधिकारियों, खनन क्षेत्र से जुड़े सार्वजनिक उपक्रमों, उद्योग जगत, शोधकर्ताओं, सिविल सोसाइटी संगठनों और सामुदायिक प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी रही।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.
