आंगनवाड़ी सेविका सड़कों पर उतरी, सब्र का बांध टूटा: जे.पी. पांडेय
राजस्थान आंदोलन के बाद देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
भाजपा किसान मोर्चा नेता एवं झारखंड राज्य समाज कल्याण आंगनवाड़ी कर्मचारी संघ के संयोजक जय प्रकाश पांडेय ने आंगनवाड़ी सेविका-सहायिकाओं की समस्याओं को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर निशाना साधा।
रांची: भाजपा किसान मोर्चा झारखंड प्रदेश के नेता सह झारखंड राज्य समाज कल्याण आंगनवाड़ी कर्मचारी संघ के संयोजक जय प्रकाश पांडेय ने राजस्थान में कई दिनों से जारी आंगनवाड़ी सेविका एवं सहायिका आंदोलन पर चर्चा करते हुए कहा कि आंगनवाड़ियों का सब्र का बांध टूट चुका है। थक-हारकर सभी सेविका एवं सहायिकाएं सड़कों पर उतर आई हैं। उन्होंने पूरे राजस्थान में सड़कों को जाम कर दिया है तथा सभी जिलों के कलेक्टर कार्यालयों के रास्तों पर चक्का जाम किया है।
उन्होंने कहा कि इसके कारण बाध्य होकर राज्य सरकार को अन्य राज्यों की भांति वेतन बढ़ाने पर लिखित समझौता करना पड़ा है। फिलहाल आंदोलन को कुछ समय के लिए स्थगित किया गया है, समाप्त नहीं किया गया है।


जय प्रकाश पांडेय ने कहा कि आखिर मानदेय पर छिड़ा यह संघर्ष "ऊंट के मुंह में जीरा" कब तक बना रहेगा। राज्य सरकारें आंगनवाड़ी कर्मियों को राज्यकर्मी का दर्जा क्यों नहीं देना चाहतीं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं, जन्म से छह माह तक के बच्चों, छह माह से तीन वर्ष तथा तीन से छह वर्ष तक के बच्चों के पोषण, भोजन एवं देखभाल की पूरी जिम्मेदारी आंगनवाड़ी कर्मियों पर होती है।
उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त टीकाकरण, बीएलओ, मेडिकल कार्य, जनगणना, एफआरएस, राशन वितरण सहित अनेक सरकारी कार्य भी आंगनवाड़ी सेविकाओं से कराए जाते हैं। कई बार उन्हें वर्तमान दर पर उधार राशन खरीदकर बच्चों में वितरित करना पड़ता है और उसकी राशि भी लगभग छह माह बाद बड़ी मुश्किल से मिलती है। मकान भाड़ा, मोबाइल रिचार्ज, पोषाहार की राशि और मानदेय के भुगतान में भी लगभग छह माह का समय लग जाता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आंगनवाड़ी केंद्र किन परिस्थितियों में संचालित किए जाते हैं।
उन्होंने मांग की कि जब तक आंगनवाड़ी कर्मियों को राज्यकर्मी का दर्जा नहीं मिलता, तब तक सेविका को कम-से-कम 35,000 रुपये तथा सहायिका को 25,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाए।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आंगनवाड़ी कर्मियों की समस्याओं पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो पूरे देश के सभी राज्यों की सेविका एवं सहायिकाएं सड़कों पर उतरेंगी। इसकी आंच दिल्ली तक पहुंचेगी तथा जंतर-मंतर और संसद मार्ग को भी जाम किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि गांवों में पसीना बहाने वाली आंगनवाड़ी महिलाएं अब दिल्ली में भी अपनी ताकत दिखाने को तैयार हैं। जो सरकार आंगनवाड़ी महिलाओं का शोषण करती है, वह महिला सशक्तिकरण की बात कैसे कर सकती है।
उन्होंने कहा कि आज आंगनवाड़ी सेविकाएं पूछ रही हैं कि 20 लाख रुपये की ग्रेच्युटी और कम-से-कम 15 हजार रुपये मासिक पेंशन कब लागू होगी। आखिर कब तक आंगनवाड़ी केंद्रों को लूट का केंद्र बनाया जाता रहेगा। कब तक सीडीपीओ और सुपरवाइजरों द्वारा आंगनवाड़ी सेविकाओं से 3,000 रुपये की वसूली की जाती रहेगी।
उन्होंने कहा कि सीडीपीओ, डीएसडब्ल्यू और महिला सुपरवाइजर को राज्यकर्मी का दर्जा मिल सकता है, लेकिन आंगनवाड़ी कर्मियों को कब मिलेगा। क्या बिना राज्यकर्मी का दर्जा दिए सरकार कुपोषण मुक्त राज्य की घोषणा कर सकती है? कदापि नहीं।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार राजस्थान में आंगनवाड़ी केंद्रों में ताले जड़कर आंदोलन किया गया, उसी प्रकार का आंदोलन देश के सभी राज्यों में करने की तैयारी चल रही है। अब आंगनवाड़ी कर्मियों का केवल गुस्सा ही नहीं, बल्कि आक्रोश भी फूट पड़ा है। जो भी सरकारें इस मुद्दे की अनदेखी करेंगी, उन्हें इसका राजनीतिक परिणाम भुगतना पड़ेगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी घोषणा-पत्रों पर अमल नहीं हो रहा है, जिसके कारण पूरे देश की आंगनवाड़ी महिलाओं में भारी नाराजगी है।
उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि राज्य सरकारें आंगनवाड़ी कर्मियों के शोषण में व्यस्त हैं, जबकि केंद्र सरकार भी मूकदर्शक बनी हुई है। केंद्र सरकार को राज्यों के हिस्से को बढ़ाकर कम-से-कम 30,000 रुपये करना चाहिए, ताकि राज्य सरकारों को अपना 40 प्रतिशत अंश देना अनिवार्य हो जाए।
उन्होंने कहा कि कुपोषण का दुष्प्रभाव पूरे देश में देखा जा रहा है। यदि समय रहते आंगनवाड़ी कर्मियों की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो पूरे देश के प्रत्येक राज्य में चक्का जाम आंदोलन किया जाएगा।
Mohit Sinha is a writer associated with Samridh Jharkhand. He regularly covers sports, crime, and social issues, with a focus on player statements, local incidents, and public interest stories. His writing reflects clarity, accuracy, and responsible journalism.


