EXPLAIN: दो-तिहाई बहुमत नहीं, फिर भी बिल पेश, क्या सरकार ने पहले से तय कर रखी थी सियासी चाल?
बिल पेश करने के पीछे क्या चुनावी गणित काम कर रहा था?
आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं, जबकि उत्तर भारत के सिर्फ दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलाकर 120 सीटें हैं। अब नए परिसीमन के बाद इस अंतर में इजाफा होने की आशंका के चलते दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनेता खासे चिंतित हैं।
Explain: लोकसभा में शुक्रवार को 131वें संविधान संशोधन बिल को पेश किया गया और इस पर वोटिंग हुई, लेकिन यह बिल अंततः पारित नहीं हो सका। संविधान में बदलाव के लिए लोकसभा में दो‑तिहाई बहुमत की मांग होती है, जिसे एनडीए गठबंधन हासिल करने में सफल नहीं हुआ। अधिवक्ताओं के मुताबिक इस बिल के पक्ष में 298 मत पड़े, वहीं विरोध में 230 मत आए। बिल को सफलता दिलाने के लिए कम से कम 352 सदस्यों का समर्थन ज़रूरी था, जो नहीं मिल पाया।
इस बिल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण के 33 फ़ीसदी के प्रावधान को लागू करना, 2026 से पहले होने वाली जनगणना के आधार पर सीटों का पुनः परिसीमन करने की अनुमति देना और लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करना था। लेकिन इस बात पर सवाल उठ रहे हैं कि जब सरकार को पहले से पता था कि उसके पास दो‑तिहाई बहुमत नहीं है, तो फिर भी इस बिल को क्यों लाया गया। कई विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे सरकार की मंशा शायद न केवल कानून‑सुधार दिखाने की थी, बल्कि विपक्ष को चुनावी रणनीति में कोने में खड़ा करके “महिला आरक्षण विरोधी” छवि बनाने की भी रही हो सकती है।


संविधान संशोधन बिल पर चली बहस के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ मानसिकता रखता है। बिल लोकसभा में गिरने के बाद अपने एक्स (पुराना ट्विटर) पोस्ट में उन्होंने लिखा:
“आज लोकसभा में बहुत अजीब दृश्य दिखा। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए ज़रूरी संविधान संशोधन बिल को कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी ने पारित नहीं होने दिया। महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के बिल को गिरा देना और उसका उत्साह मनाना सचमुच निंदनीय और कल्पना से परे है।”https://twitter.com/AmitShah/status/2045158258311348348?s=20
हालांकि, विपक्ष इस 131वें संविधान संशोधन बिल को व्यापक रूप से “संविधान पर हमला” बता रहा है। मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने साफ कहा कि यह न केवल महिला आरक्षण का मुद्दा था, बल्कि पूरे चुनावी ढांचे को बदलने की कोशिश थी।
Read More.. सिया हत्याकांड पर उबाल: सैंकड़ों महिलाओं का प्रदर्शन, ‘कातिलों को सजा दो’ के नारों से गूंजा गांवhttps://twitter.com/RahulGandhi/status/2045148723488145841?s=20
राहुल गांधी ने कहा:
“ये संविधान पर हमला था, और इसको हमने हरा दिया है तो अच्छी बात है। हमने साफ़ कहा है कि ये महिला बिल नहीं है, भारत का जो चुनावी ढांचा है उसे बदलने की कोशिश है। मैं प्रधानमंत्री से कह रहा हूं कि अगर आप महिला बिल चाहते हैं तो 2023 का महिला बिल लाइए और उसे आज से लागू कीजिए और पूरा विपक्ष 100 फीसदी आपको समर्थन देगा।”
“राजनीतिक विशेषज्ञ आदेश रावल के मुताबिक जो महिला आरक्षण वाला बिल 2023 में ही संविधान का हिस्सा बन चुका था और जिसे लगभग 10 साल बाद लागू होने की योजना थी, उसे अब विधानसभा चुनावों के मौके पर फिर से लाया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार का इरादा शायद विपक्ष को वहाँ खड़ा करना है, जहाँ उसे देश की आधी आबादी यानी महिलाओं के खिलाफ खड़ा दिखाया जा सके, न कि सिर्फ कानून‑सुधार की तत्काल आवश्यकता को दर्शाना।”
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने एक्स पर लिखकर कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया और कहा कि उसने “गुनाह किया है”। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि महिला आरक्षण बिल रोकने से कांग्रेस पर “ज़िंदगी भर के लिए काला धब्बा” लग गया है और भारत की जनता, खासकर महिलाएं, इसे कभी माफ़ नहीं करेंगी।
https://twitter.com/KirenRijiju/status/2045193641187291236?s=20
नए परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत की चिंता
आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं, जबकि उत्तर भारत के सिर्फ दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलाकर 120 सीटें हैं। अब नए परिसीमन के बाद इस अंतर में इजाफा होने की आशंका के चलते दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनेता खासे चिंतित हैं।
मंगलवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने साफ चेतावनी दी कि अगर सरकार परिसीमन के जरिए उत्तर भारतीय राज्यों को ज़्यादा राजनीतिक ताक़त देने की दिशा में आगे बढ़ी तो तमिलनाडु पूरी तरह ठहर सकता है। उन्होंने कहा कि अगर तमिलनाडु की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हुई तो वे भारत के संविधानकर्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम से इस मुद्दे को उठाएंगे और यह “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए तमिलनाडु से अंतिम चेतावनी” है कि अगर हालात खराब हुए तो तमिलनाडु न सिर्फ लड़ेगा बल्कि जीतेगा भी।
आदेश रावल बताते हैं कि दक्षिण के नेताओं को डर है कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत में इतनी ज़्यादा सीटें हो जाएं कि सरकार बनाने के लिए दक्षिण भारत पर भरोसा करने की ज़रूरत ही न रहे। उनके मुताबिक इससे भाषाई और क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है और यह पूरे देश के लिए विभाजनकारी प्रभाव छोड़ सकता है।
विजय त्रिवेदी का विचार है कि चूंकि यह बिल लोकसभा में पास नहीं हुआ, इसलिए तमिलनाडु में यह अकेला बड़ा मुद्दा नहीं बनेगा, क्योंकि वहां असली चिंता परिसीमन और सीटों के बंटवारे से जुड़ी है। उनके अनुसार पश्चिम बंगाल में इसे अलग तरह से देखा जा सकता है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक महिला नेता के रूप में ही बड़ी भरोसेमंद छवि बना चुकी हैं और उनके साथ जुड़ी महिला वोटर बेस को लक्षित करने की कोशिश बीजेपी कर सकती है। उनके हिसाब से एक राजनीतिक पार्टी द्वारा ऐसे कैलकुलेशन‑आधारित रणनीति अपनाना न केवल अपेक्षित है, बल्कि ग़लत भी नहीं माना जा सकता; हालांकि यह तय अभी बाकी है कि बीजेपी इस मोर्चे पर कितनी कामयाब रह पाती है।
बिल का समय निशाने पर
राजनीतिक विशेषज्ञ आदेश रावल का मानना है कि देश में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच इस संविधान संशोधन बिल को लाने का मकसद शायद विपक्ष के ख़िलाफ़ इसे राजनीतिक हथियार बनाना है। बीबीसी न्यूज़ से बात करते हुए उन्होंने बताया कि यह संशोधन पारित नहीं हुआ, लेकिन इससे यह साफ़ दिखता है कि इसका फोकस बंगाल विधानसभा चुनाव पर है। उनके मुताबिक सरकार को लगता है कि बंगाल की महिलाएं ज़्यादा प्रोग्रेसिव हैं, सामाजिक‑राजनीतिक मामलों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं और टीएमसी अपने यहाँ महिलाओं को सबसे ज़्यादा नेतृत्व व टिकट देती है। रावल का यह भी कहना है कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री बार‑बार यह नैरेटिव दोहराएंगे कि सरकार ने महिला आरक्षण लाने की पूरी कोशिश की, लेकिन विपक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया।
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी भी इसी बात से सहमत नजर आते हैं। बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को पता था कि उसके पास दो‑तिहाई बहुमत नहीं है, फिर भी इस बिल को लाना राजनीतिक गणित और संभावित मनोवैज्ञानिक फायदे की गणना से जुड़ा फैसला लगता है। उनका मानना है कि सरकार शायद भविष्य के चुनावों में यह नैरेटिव बनाना चाहती है कि विपक्ष महिला अधिकारों और महिला आरक्षण के खिलाफ खड़ा है, जबकि सत्ता धारक दल “नारी शक्ति” का समर्थन करता है।


