विकास की बाट जोह रहा झारखंड
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आकांक्षा राॅय
रांची: भगवान बिरसा के जन्मदिन पर बिहार से पृथक होकर अस्तित्व में आया झारखंड 19 वर्षों बाद भी भाग्योदय का इंतजार कर रहा है। कयास लगाया जा रहा है, कि विकास के मापदंड पर पिछड़े झारखंड का कायाकल्प लोकसभा चुनाव के बाद चुनकर आयी सरकार के हाथों होगा। वो झारखंड के सर्वांगीण विकास का बीड़ा उठाएगी। लेकिन बगैर सक्रिय जन अभिक्रम, सशक्त विपक्ष के साथ-साथ गतिशील सत्ता के ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता।
चुनावी तपीश से अपने उफान पर है। राजनीतिक दल पुराने व नए वादों के साथ दम-खम से प्रचार अभियान में जुटे हैं। विगत 19 वर्षों में आदिवासी मुख्यमंत्रियों की अगुवाई वाली 9 सरकारों की नीतियों पर सवाल खड़े हैं। हालांकि यह भी कटु सत्य है, कि नकारात्मक आधार पर की जा रही राजनीति से किसी बेहतर कल का निर्माण संभव नहीं है। चुनाव के समय सामायिक सफलताओं के लिए जिस तरह के अवसरवाद को राजनीतिक दल अपना रहे हैं, वह चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष उससे न तो भ्रष्टाचार का खात्मा संभव है न ही सामाजिक तौर पर विघटनकारी प्रक्रियाओं को रोका जा सकता है। लोस 2014 के चुनाव में उम्मीद की गयी थी कि राज्य और देश के वंचित समूहों के लिए विकास का मार्ग प्रशस्त होगा, लेकिन पिछले पांच सालों में विकास के ये विषय सरकारी विज्ञापन में ही दिखे। प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के लिए ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा दिया, जो कम-से-कम झारखंड में पूरा होता नहीं दिख रहा है। आदिवासी का दर्द कम होने के बजाय बढ़ गया है। सम्मान और स्वशासन के लिए लड़ने, जीने व मरने की बात कही गयी थी, यहां भूख से कई लोगों की जानें गईं। कुपोषण प्रदेश का ज्वलंत सवाल है व आज भी पलायन एक विकट समस्या के तौर पर हमे मुंह चिढ़ा रहा है। इन सवालों से अलग विपक्ष भी 2019 चुनाव में विकास की कसौटी से दूर समाज को बांटने की प्रवृति के साथ-साथ भाजपा के भय के नाम पर राजनीति झारखंड में भी दिखने लगी है।
अधिवास नीति
वोटों के नुकसान की आशंका पर किसी भी सरकार ने स्पष्ट नीति लाने की हिम्मत नहीं की। जब झारखंड को 19 साल पहले बिहार से अलग किया गया था, तो माना गया की आदिवासी स्थानीय लोगों की अपनी गरिमा, उनकी आकांक्षाएं और स्वराज्य के लिए संघर्ष किए इन सब के परिणाम उन्हें, उनके अनुकूल मिलेंगे। अधिवास नीति पर झारखंड के राजनीतिक वर्ग द्वारा हेरफेर करने से आदिवासी और गैर-आदिवासी समुदायों के बीच अविश्वास पैदा हुआ है।
आदिवासी केंद्रित विकास
इस राज्य का गठन आदिवासियों के कल्याण के लिए किया गया था। आदिवासियों का स्वशासन का अपना तरीका है जिसे ग्रामीण शासन कह सकते हैं। पंचायतें ऐसे समुदायों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए विकास को आदिवासी केंद्रित करना होगा। दुर्भाग्य से, सरकारों द्वारा अपनाए गए तरीकों को व्यापक रूप से अब तक आदिवासी विरोधी माना जाता रहा है। आदिवासियों को विकास की भ्रामक धारणा बनाकर राज्य द्वारा उनके संसाधनों को हटा दिया गया है। विकास के नाम पर झारखंड में अब तक 7 मिलियन से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। आदिवासी जंगलों और कृषि भूमि के वास्तविक मालिक रहे हैं और बड़ी कंपनियों को अपनी जमीन देना कभी भी सराहा नहीं जा सकता है।
खनिज खनन
झारखंड में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं जो झारखंड का मेरुदंड है। यह देश के 40 प्रतिशत खनिजों का भंडार है, लेकिन ऐसी कोई स्पष्ट नीतियां नहीं हैं जो आदिवासियों को भी स्वीकार्य हों। कितनी ही कंपनियों ने आदिवासियों के जमीन पर उनके ही विपक्ष में विकास की सीमा तय करनी शुरू की परिणामस्वरूप आर्सेलर मित्तल, टाटा स्टील से लेकर जिंदल स्टील एंड पावर जैसी बड़ी कंपनियों को स्थानीय लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा है। यह माना जाता है कि खनिज नीति का बड़ी कंपनियों को लाभ देने से अधिक है। खनिज खदानों के लिए केंद्र सरकार द्वारा तय रॉयल्टी बहुत कम है, इस प्रकार राज्य की तुलना में निजी खनन फर्मों को लाभ होता है।
भाषा और संस्कृति
पिछले 19 वर्षों में भाषा प्रबंधन या सांस्कृतिक प्रबंधन के लिए किसी भी सरकार द्वारा किसी भी प्रकार के उचित प्रयास नहीं किए गए हैं और न ही कोई संस्थान स्थापित किया गया है। आदिवासी संस्कृति देश की सबसे पुरानी संस्कृति रही है लेकिन कुछ बाहरी लोगों द्वारा उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कम अनव्रत जारी है ।
जमीन के अधिकार
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भूमि के नुकसान से स्वाभाविक रूप से जनजातीय पहचान का नुकसान होगा। यदि सरकार बुलडोजर खड़ी कर फसलों को नुकसान पहुंचाकर उद्योगपतियों के लिए रास्ता बनाती है, तो अलग राज्य के उद्देश्य गर्त में चला जायेगा।
आदिवासियों को उद्योग विरोधी या विकास विरोधी नहीं कहा जा सकता। वो भी विकास चाहते हैं लेकिन प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकारों की कीमत पर नहीं। अशांति से बचने के लिए, नई सरकार को विस्थापन और भूमि अधिग्रहण पर स्पष्ट रुख बनाना चाहिए। ऐसे में ईमानदारी से पक्ष-विपक्ष को मिलकर विजन के साथ विकास की दिशा को आगे बढ़ाना होगा।
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Edited By: Samridh Jharkhand
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