EXPLAINER: भारत पहुंचने से पहले हिंद महासागर में क्या करता है मॉनसून? जानिए बारिश की पूरी कहानी

EXPLAINER: भारत पहुंचने से पहले हिंद महासागर में क्या करता है मॉनसून? जानिए बारिश की पूरी कहानी
भारत आने से पहले...समंदर में क्या करता है मॉनसून?

Monsoon Explained: भारत में हर साल मानसून लाखों लोगों के जीवन, खेती और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत पहुंचने से पहले मॉनसून हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में क्या करता है? जानिए समुद्र की गर्मी, लो प्रेशर, नमी से भरी हवाओं और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं की वह पूरी कहानी, जो भारत में बारिश की शुरुआत की वजह बनती है।

Monsoon Explained: जून का महीना दस्तक देते ही पूरे देश की निगाहें आसमान पर टिक जाती हैं। बच्चे हों, जवान हों या बुजुर्ग हर कोई बारिश का बेसब्री से इंतज़ार करने लगता है। किसी के होंठों पर "काले मेघा-काले मेघा, पानी तो बरसाओ..." गूंज रहा होता है, तो कोई "बरसों रे मेघा-मेघा" की धुन में खो जाता है। यानी हर तरफ एक ही चाहत- बारिश। लेकिन क्या कभी मन में यह सवाल आया कि भारत पहुंचने से पहले यह मॉनसून हिंद महासागर में आखिर क्या करता रहता है?

टीवी और अखबार हमें बता देते हैं कि मॉनसून कब आएगा, केरल में कब पहुंचा, मुंबई कब जलमग्न हुई और दिल्ली की सड़कें कब नहरों में तब्दील हुईं। लेकिन यह सोचना कम ही होता है कि आखिर समंदर की लहरों के साथ मॉनसून का क्या रिश्ता है और हर साल यह हम तक देर से क्यों पहुंचता है।

अगर आपके मन में भी ऐसे सवाल उठ रहे हैं, तो जवाब अगले कुछ पैराग्राफ में मिलने वाला है। तो चलते हैं उस सफर पर -जहाँ अरब सागर और हिंद महासागर के नीले पानी में मॉनसून अपनी तैयारी करता है। जानते हैं कि कैसे तपता हुआ समंदर ठंडी फुहारों की वजह बनता है। आइए इस पहेली को परत-दर-परत सुलझाते हैं।

समुद्र का उबलना और लो प्रेशर का खेल

हर कहानी में एक नायक, एक नायिका और एक खलनायक होता है। इस मॉनसूनी कहानी में नायिका की भूमिका में हैं हिंद महासागर और अरब सागर, जबकि हीरो और विलेन दोनों का किरदार सूरज अकेले निभाता है। मार्च-अप्रैल में जब उत्तर भारत की धरती सूरज की तपिश से तवे की तरह गर्म होने लगती है, तभी भूमध्य रेखा के आसपास का समंदर भी सूरज की गर्मी से खौलने लगता है।

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यहीं कहानी में एंट्री होती है विज्ञान की। नियम सीधा है  पानी गर्म होते ही भाप बनकर ऊपर उठता है, चाहे वो रसोई की केतली का पानी हो या समंदर का। जब समंदर से भाप उठती है तो ऊपर की हवा भी गर्म हो जाती है। यह गर्म हवा हल्की होकर आसमान की तरफ दौड़ने लगती है और पीछे छोड़ जाती है एक खालीपन जिसे विज्ञान की भाषा में 'लो प्रेशर एरिया' यानी कम दबाव का क्षेत्र कहते हैं।

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इस खाली जगह को भरने के लिए दक्षिणी हिंद महासागर से ठंडी और भारी हवाएं तेज़ी से दौड़ पड़ती हैं। रास्ते में ये हवाएं समंदर के ऊपर से गुज़रते हुए करोड़ों लीटर पानी भाप के रूप में अपने साथ समेट लेती हैं। हिंद महासागर की यही बढ़ती गर्मी आगे जाकर मॉनसून की असली ताकत बनती है, जिसके दम पर ये हवाएं हज़ारों किलोमीटर का सफर तय करती हैं।

अरब सागर और बंगाल की खाड़ी का रास्ता कैसे तय होता है?

तो अब तक यह समझ आया कि सूरज की गर्मी से उबलते समंदर से भाप उठती है और तेज़ हवाएं उसे अपने साथ ले उड़ती हैं। अब आगे की कहानी। जब नमी से लदी ये हवाएं समंदर को चीरते हुए आगे बढ़ती हैं तो शुरू होता है वो सफर जो इन्हें हिंदुस्तान की धरती तक लाता है। भूमध्य रेखा पार करते ही धरती के घूमने के कारण इन हवाओं की दिशा अचानक पलट जाती है। (धरती के घूमने की बारीकियां NCERT की किताबें समझा देंगी - हम मॉनसून की कहानी पर बने रहते हैं।)

इस दिशा बदलाव को वैज्ञानिक 'कोरिओलिस फोर्स' कहते हैं। इसी के चलते हवाएं दक्षिण-पश्चिम दिशा से भारत की ओर रुख करती हैं - इसीलिए इन्हें साउथ-वेस्ट मॉनसून कहा जाता है। जैसे ही ये हवाएं भारत के दक्षिणी छोर के पास पहुंचती हैं, देश का भौगोलिक नक्शा इन्हें दो धाराओं में बाँट देता है - एक अरब सागर की तरफ और दूसरी बंगाल की खाड़ी की तरफ।

अरब सागर वाली धारा भारत के पश्चिमी तट - केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र - से टकराती है। पश्चिमी घाट के ऊंचे पहाड़ इन हवाओं को रोककर वहाँ जमकर बारिश कराते हैं। वहीं बंगाल की खाड़ी वाली धारा पूर्वी भारत से होते हुए नॉर्थ-ईस्ट के पहाड़ों की तरफ निकल जाती है और असम-मेघालय में दुनिया की सबसे अधिक बारिश वाले इलाकों को जन्म देती है -जैसे कि चेरापूंजी।

इस पूरे सफर में हिंद महासागर और अरब सागर इन हवाओं के लिए पेट्रोल पंप की तरह काम करते हैं, जहाँ से ये और ज़्यादा नमी भरकर पूरे भारत को भिगोने के लिए तैयार हो जाती हैं।

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Edited By: Samridh Media Desk
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