मोदी जी की पदयात्रा व बचपन
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ज्योति चौहान
एक बार फिर मोदी सरकार, हर हर मोदी घर-घर मोदी, नरेंद्र मोदी की जय……। चलिए मुद्दे पर आते हैं। बचपन में एक बार नहीं कई बार मेरे साथ ऐसा हुआ था कि मेरे दोस्त कोई गलती करते थे, तो वो अपने बचाव के लिए अपने मां, पिता या किसी अभिभावक को लेकर मुझसे लड़ने चले आते थे। एक बार की बात है, मैं अपने दोस्तों के साथ जा रही थी और कुछ बदमाश बच्चों ने पीछे से आकर मुझे धक्का मारा। मैं जमीन पर गिर गई। दोस्तों ने मुझे उठाया और उनलोगों को दौड़ाकर पकड़ना चाहा, लेकिन वो लोग भाग गए। मुझे काफी चोट आयी थी, पर मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। क्योंकि सारे दोस्त पड़ोसी थे। मुझे मालूम था, कि मेरा अपने घरवालों को यह घटना नहीं बताना उनपर भारी पडे़गा। हुआ भी कुछ ऐसा ही।
शाम ढलते ही वो बिगड़ैल दोस्त अपने पापा के साथ मेरे घर पहुँच गया। उसके पापा ने भी न कुछ पूछा न कुछ सोचा। लगे सुनाने…..। कुछ देर तक बिना कुछ जाने मुझे लंबा भाषण देते रहे। मां को कहने लगे, आपकी बेटी बिगड़ गई हैं। लड़कों को धक्का देकर गिराने का शौक पाल रखा है। फिर मेरी मां ने कहा, भईया बैठिए न, बैठकर बोलिए। फिर बैठकर घंटो भाषण का सिलसिला चलता रहा। जब उनलोगों का चाय नास्ता हो गया। तब जाकर मां ने मुझे बुलावा भेजा। मैं तो सारी बातें सुन चुकी थी, आते के साथ, आंखें दिखाती हुई पूछ बैठी, क्यूं रे मैंने तूझे गिराया था या तूने मुझे गिराया था ? क्षण भर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। फिर मां ने कहा कोई बात नहीं, होता है।
मोदी जी का यह पदयात्रा मुझे उस दोस्त की याद दिला गया, जिसने अपने बचाव के लिए अपने पापा तक को बुलवा लिया। मेरा जीवन भी ऐसी ही खट्टी-मीठी यादों से भरा हुआ है। लेकिन मोदी जी के प्रत्याशी मेरे उस दोस्त के जैसे हो गए हैं। जिन्हें पता है कि हमें सिर्फ और सिर्फ मोदी जी ही बचा सकते हैं। अपनी नाकामयाबी, अपनी कमजोरी को मोदी के नाम के सहारे छुपाने की कोशिश की जा रही है। अगर प्रत्याशी मनोबल के धनी, अच्छे व योग्य नेता होते तो आज पीएम मोदी को, जनता को रिझाने के लिए पदयात्रा नहीं करना पड़ता।
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Edited By: Samridh Jharkhand
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