Sabarimala Verdict: 'धर्म की आत्मा को अदालत की तराजू पर तौलना आसान नहीं', सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान परंपरा और लैंगिक समानता के मुद्दे पर गहन बहस हुई। नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला देने की दिशा में सुनवाई कर रही है।
नई दिल्ली: केरल के पहाड़ों के बीच बसा सबरीमाला मंदिर, जहाँ भगवान अयप्पा विराजते हैं- एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के केंद्र में आ गया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई तो माहौल ऐसा था जैसे इतिहास अपनी अगली करवट लेने की तैयारी में हो। नौ जजों की विशाल संविधान पीठ के सामने एक तरफ थी धार्मिक परंपरा, और दूसरी तरफ थी लैंगिक समानता की माँग।
पहले समझें मामला है क्या?
सबरीमाला मंदिर में सदियों से 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहा है। मंदिर प्रबंधन और परंपरावादियों का तर्क है कि भगवान अयप्पा "नैष्ठिक ब्रह्मचारी" हैं, इसलिए रजस्वला उम्र की महिलाओं का प्रवेश धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध है।

कोर्ट का वो सवाल जिसने सबको चौंकाया

अदालत ने पूछा "उत्तर भारत में रहने वाला कोई ऐसा व्यक्ति, जिसकी सबरीमाला में कोई आस्था नहीं, जो वहाँ के भगवान को भी नहीं मानता — वो आखिर किस आधार पर उस मंदिर में प्रवेश का अधिकार माँग सकता है?"
यह सवाल सुनते ही कोर्टरूम में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। दरअसल यह सवाल उन याचिकाकर्ताओं की ओर इशारा था जो खुद मंदिर की परंपरा से जुड़े नहीं हैं, लेकिन महिलाओं के प्रवेश की माँग उठा रहे हैं।
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि धार्मिक स्थलों के मामलों में यह देखना जरूरी है कि याचिकाकर्ता की उस स्थान में आस्था है या नहीं। बिना आस्था के प्रवेश का दावा करना धर्म की मूल भावना को ठेस पहुँचाना है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना — इतिहास को नकार नहीं सकते
नौ जजों की पीठ में शामिल न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने आज की सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ कीं।
उन्होंने कहा कि भारत कोई नया देश नहीं है। यहाँ की सभ्यता हजारों साल पुरानी है, यहाँ की धार्मिक परंपराएँ और मान्यताएँ सदियों के अनुभव से बनी हैं। इन्हें महज "पुरानी सोच" कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 — जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं — वो भी इसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। इसलिए जब हम संविधान की व्याख्या करते हैं, तो उस ऐतिहासिक संदर्भ को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति नागरत्ना की यह बात इशारा कर रही थी कि संविधान और धर्म को एक-दूसरे का दुश्मन मानना गलत है — दोनों एक ही जमीन से उगे हैं।
इंदिरा जयसिंह — महिलाओं के 40 साल छीन लिए गए हैं
दूसरी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने बड़े जोश और दृढ़ता के साथ महिलाओं का पक्ष रखा।
उन्होंने अदालत को याद दिलाया कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा था कि यह प्रतिबंध असंवैधानिक है। वो फैसला आज भी कानूनी रूप से जिंदा है, उस पर कोई रोक नहीं लगी है। लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है? महिलाएँ अब भी मंदिर नहीं जा पा रहीं। और इसकी जिम्मेदारी सीधे केरल सरकार पर है जिसने फैसले को लागू करने में कोई खास इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।
जयसिंह ने एक भावुक लेकिन तार्किक दलील दी — "10 से 50 साल की उम्र एक औरत की जिंदगी के सबसे जरूरी 40 साल होते हैं। उसकी पढ़ाई, नौकरी, शादी, माँ बनना — सब इन्हीं सालों में होता है। और इन्हीं सालों में उसे भगवान के दर से रोका जा रहा है। यह सिर्फ धार्मिक भेदभाव नहीं, यह एक औरत की पूरी पहचान पर सवाल है।"
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत धर्म की परिभाषा तय करने नहीं बैठी है — वो सिर्फ यह देखेगी कि कोई प्रथा संविधान के मूल्यों के साथ चल सकती है या नहीं।
कोर्ट ने दिया संतुलित जवाब
जयसिंह की दलीलों पर अदालत ने स्पष्ट किया कि महिलाओं पर यह प्रतिबंध उनके "स्त्री होने" के कारण नहीं बल्कि एक खास आयु वर्ग के आधार पर है और इन दोनों में फर्क करना जरूरी है।
अदालत ने यह भी कहा कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यहाँ हर धर्म, हर संप्रदाय को संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत अपने धार्मिक मामलों को खुद संभालने का अधिकार मिला हुआ है। इस अधिकार को नजरअंदाज करके कोई फैसला नहीं थोपा जा सकता।
कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बात कही किसी भी धार्मिक प्रथा को "अनिवार्य" या "गैरजरूरी" घोषित करना न्यायपालिका के लिए बेहद कठिन काम है। धर्म की आत्मा को अदालती तराजू पर तौलना आसान नहीं।
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