उच्च न्यायालय ने 20 पुलिसकर्मियों के ट्रांसफर आदेश किए रद्द, कहा-स्थानांतरण के बहाने दंड नहीं दे सकता विभाग

उच्च न्यायालय ने 20 पुलिसकर्मियों के ट्रांसफर आदेश किए रद्द, कहा-स्थानांतरण के बहाने दंड नहीं दे सकता विभाग
झारखंड उच्च न्यायालय (फाइल)

झारखंड हाई कोर्ट ने धनबाद के 20 पुलिसकर्मियों के तबादले को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया और कहा कि विभाग स्थानांतरण के जरिए दंड नहीं दे सकता।

रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने धनबाद जिला पुलिस बल से अन्य जिलों में स्थानांतरित किए गए 20 पुलिसकर्मियों के ट्रांसफर आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि विभाग प्रशासनिक जरूरत के नाम पर किसी कर्मचारी को दंडित नहीं कर सकता और यदि विभागीय कार्रवाई आवश्यक हो, तो उसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

उच्च न्यायालय ने स्थानांतरण और कार्यमुक्ति (ट्रांसफर और रिलीविंग) दोनों आदेशों को निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि सभी याचिकाकर्ता अपने मूल कार्यस्थल धनबाद में पुनः योगदान दें और संबंधित अधिकारी उनकी जॉइनिंग स्वीकार करें। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ में हुई। अदालत ने अपने फैसले में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि स्थानांतरण प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसका उपयोग दंडात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं किया जा सकता। यदि किसी पुलिसकर्मी पर लापरवाही या अनुशासनहीनता का आरोप है, तो विभाग को नियमानुसार विभागीय कार्रवाई करनी चाहिए, न कि स्थानांतरण के माध्यम से दंड देना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अर्पण मिश्रा ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि 24 फरवरी 2025 को मेमो नंबर 238/पी के तहत 20 पुलिसकर्मियों का स्थानांतरण प्रशासनिक आवश्यकता बताकर किया गया था। इसके बाद 11 मार्च 2025 को रिलीविंग आदेश संख्या 642 जारी कर उन्हें अन्य जिलों में भेज दिया गया।

हालांकि सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी से यह सामने आया कि यह स्थानांतरण वास्तव में दंडात्मक कार्रवाई थी। धनबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) ने कथित लापरवाही के आरोपों के आधार पर इनके स्थानांतरण की सिफारिश की थी, लेकिन बिना उचित विभागीय प्रक्रिया अपनाए सीधे स्थानांतरण कर दिया गया।

अदालत ने उच्चतम न्यायालय के ‘सोमेश तिवारी बनाम भारत संघ’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि स्थानांतरण आदेश दंडात्मक प्रकृति का हो, तो उसे प्रशासनिक आदेश नहीं माना जा सकता और वह कानूनन टिक नहीं सकता। इसी आधार पर न्यायालय ने संबंधित आदेशों को अवैध करार दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा नए स्थान पर योगदान देने से उनकी याचिका स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। यदि स्थानांतरण आदेश को बाद में रद्द कर दिया जाता है, तो वह आदेश मूल तिथि से ही अमान्य माना जाएगा।

इस मामले में याचिकाकर्ताओं में सूरज कुमार दास, अनुज कुमार सिंह, बलजीत कुमार, कौशल कुमार दुबे सहित कुल 20 पुलिसकर्मी शामिल थे, जो मुख्य रूप से धनबाद, चतरा, गया, पटना और आसपास के क्षेत्रों के निवासी हैं। सभी लंबे समय से धनबाद जिला पुलिस बल में तैनात थे।

अदालत के इस फैसले को पुलिस प्रशासन में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि स्थानांतरण को अनुशासनात्मक दंड के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

Edited By: Samridh Desk
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