जननायक क्यों थे महेंद्र सिंह…
बगोदर: गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड गांव के खंभरा में 1950 के दशक में जन्में स्व• महेंद्र सिंह बचपन से ही निडर और प्रतिभाशाली थे। कहा जाता है कि ईलाके में विषैला सांप मारने, जंगली जानवर खदेड़ने या फिर चोर पकड़ने की बात हो महेंद्र की खोज अवश्य होती थी। स्कूली शिक्षा महज आठवीं कक्षा तक करने वाले महेंद्र को पढाई रास नहीं आई। वे महानगरों की ओर पलायन कर गए । लेकिन वहां भी उन्हें चैन कैसे मिलती? वे फिर घर लौट आए, करीब 16 वर्ष की अवस्था में वे पुनः वाराणसी चले गए जहां साधु-संतो के संपर्क आकर सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे । एक दशक बाद फिर बगोदर ईलाके में लौटे और समाज में व्याप्त कुरीतियों, महाजनी प्रथा एवं सामंती दृष्टिकोण से त्रस्त निचले तबके के हितार्थ आंदोलन का शंखनाद कर दिया । इस दौरान वे वामपंथी नेताओं के संपर्क में आकर अपने घर या रिश्तेदार के विरूद्ध शोषण के खिलाफ जंग छेड़ दिया । बड़ी तादाद में इनके आंदोलन में लोग जुडने लगे । इन संघर्षों के दौरान वे कई बार जेल भी गए। वहां भी बंदियों के बीच मोर्चा बनाकर बंदियों की सुविधा व्यवस्था को लेकर आंदोलन किया । वे जेल से ही 85 के साल में विधानसभा चुनाव लड़े, हालांकि चुनाव हार गए । 90 में शानदार जीत पाकर बगोदर से बिहार विधानसभा पहुंचे, जहां पहली बार 324 वाली एसेंबली में झारखंड ईलाके से अपनी बेबाक टिप्पणी से एकअलग पहचान बनायी । बिहार विधानसभा के इतिहास में पहली बार सत्ताधारी पार्टी के द्वारा सूटकेस और घड़ी उपहार स्वरूप दिए जाने का विरोध करते हुए सवाल किया कि जनता के पैसे को इस तरह बर्बाद करना जनप्रतिनिधियों के लिए कहां तक उचित है । वे दो टर्म बिहार विस के सदस्य रहकर लगातार जनमुददों को लेकर एकीकृत बिहार में सड़क से सदन तक छाये रहे । 2000 में अलग झारखंड विधान सभा के केन्द्र बिन्दु रहे, आज के राजनीतिक गलियारों में जिस तरह से विधायक बनने की होड़ मची है, नेता राजनीतिक आदर्शों से विमुख होकर जनमुददों और जनसंघर्षों से अधिक पार्टी और टिकट को अहमियत दे रहे हैं, वे एक ऐसे शख्स थे जो जीवन पर्यंत एक पार्टी में बने रहे, आश्चर्य तब हुई जब 2003 में विधान सभा से यह कहकर ईस्तीफा दे दिए कि जहां जनता की समस्याओं को लेकर बोलने का अधिकार नहीं हो वहां बने रहने का कोई औचित्य नहीं है । उस समय विपक्ष मतलब महेंद्र प्रसाद सिंह होता था, सरकार भी कोई प्रस्ताव या विधेयक लाने से पहले ये सोच लेती थी कि विस में महेंद्र सिंह जैसे विधायक मौजूद हैं । सरकार को सत्र के दौरान घेरने, बड़े – बड़े अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कठघरे में खड़ा करने की कला में माहिर महेंद्र सिंह बिल्कुल सादगी जीवन व्यतीत करते थे साधारण पहनावा, लाव – लश्कर से दूर अंगरक्षक रखना जरूरी नहीं समझते थे, उनका कहना था कि मौत तो सड़क हादसे में भी हो सकती है…
जनता का पैसा फिजूल में खर्च के विरोधी थे, वहीं अपने कपड़े स्वयं धोते थे, पार्टी या प्रशासनिक कार्यक्रमों में समय से पहले पहुंच जाते, विधानसभा सभा सत्र के दौरान हुए कार्यवाही जहां पत्रकार भूल जाते तो इन्हीं से कन्फर्म होते । याददाश्त शक्ति इतनी प्रखर होती कि उनका भाषण हमेशा तथ्यपरक के साथ – साथ आंकड़े आधारित होती थी । मामुली शिक्षा मिडील स्तर तक करने बावजूद वक्तव्य कला में निपुण थे। वे एक अच्छे साहित्यकार भी थे, “कीमत चुकाती जिन्दगी ” के अलावे दर्जनों पुस्तकें और काव्य संग्रह की रचना की ।आज झारखंड के राजनीतिक दांव – पेंच से जिस तरह हमारे माननीयों की चुप्पी देखने को मिल रही है। आज भी लोगों को महेंद्र सिंह की कमी अवश्य खलती है ।
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