आरके सिन्हा का आलेख पढें : क्यों कोरोना को दिल्ली-मुंबई में हराना जरूरी है?
आरके सिन्हा
कोरोना वायरस के संक्रमण को मात देने के लिए चले लॉकडाउन के बाद मजबूरी में अब धीरे-धीरे बाजार-दफ्तर और अन्य काम-काज शुरू होने लगे हैं। लेकिन, उनकी रफ्तार अत्यंत ही धीमी है। यह तो होना ही था। वैश्विक महामारी की चपेट में आने के कारण आम-खास सब की आय पर भारी असर पड़ा है। इसलिए धीरे-धीरे ही तो स्थितियां सामान्य होंगी। इसलिए जो लोग लोग अभी से दिल्ली, मुंबई, पटना, लखनऊ के बाजारों के सन्नाटे से दुखी हो रहे हैं, उन्हें थोड़ा धैर्य तो दिखाना ही होगा।


दिल्ली में कोरोना को लेकर स्थिति बिगड़ने के लिए तबलीगी जमात की गैर-जिम्मेदाराना करतूतों और फिर प्रवासी मजदूरों के सड़कों पर आ जाने को भी काफी हद तक जिम्मेदार तो माना ही जाएगा। तबलीगी जमात के गैर-जिम्मेदार लोगों ने सच में शुरू से ही दिल्ली को संकट में डाल दिया था। उन दोषियो पर कठोर कार्रवाई तो होनी ही चाहिए। इस बीच, अब आगे के बारे में भी सोचना होगा। उसी हिसाब से रणनीति तय करनी होगी ताकि कोरोना वायरस को शिकस्त दे दी जाए।
अगर बात मुंबई की करें तो भारत की आर्थिक प्रगति का रास्ता तो यहां से ही निकलता है। मुंबई स्टाक एक्सेंज में लिस्टिड लगभग 70 फीसद कंपनियों के मुख्य कार्यालय मुंबई में ही हैं। देश के चोटी के उद्योगपति भी मुंबई में ही रहते हैं। जब मैं मुंबई की बात करता हूं, तो मेरा आशय कहीं ना कहीं महाराष्ट्र से भी तो होता है। आखिर मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है। यह देश का सबसे प्रमुख औद्योगिक राज्य भी है। महाराष्ट्र ने नब्बे के दशक में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण का लाभ उठाते हुए अपनी जीडीपी को मजबूत बनाया और वर्तमान में जीडीपी के हिसाब से महाराष्ट्र देश का सबसे अग्रणी राज्य है। क्या यह छोटी बात है कि महाराष्ट्र की जीडीपी का आकार पकिस्तान की जीडीपी से भी कहीं अधिक है?
दरअसल दिल्ली-मुंबई महानगर एक तरह से अपने आप में लघु भारत भी हैं। इनमें कुल जमा पांच करोड़ के आसपास लोग रहते हैं। यह आंकड़ा थोड़ा ज्यादा-कम हो सकता है। क्योंकि बड़ी संख्या में उप-नगरों से आने-जाने वाले लोग भी तो हैं I इनमें बढ़ रहे कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या को हर हालत में घटाना ही होगा। यह संभव है अगर दिल्ली-मुंबई के लोग घरों से बाहर सिर्फ विशेष परिस्थियों में ही निकले, मास्क पहनना कभी ना भूले और दो गज की दूरी का ख्याल रखें। यह सब कोई बहुत कठोर शर्तें तो नहीं हैं। अगर वे इस दिशा में ईमानदारी का परिचय देंगे तो बात बन जाएगी। इन दोनों जगहों में कोरोना को हराने से देश-दुनिया में एक अच्छा सकारात्मक और सार्थक संदेश जाएगा।
एक बात और भी महत्वपूर्ण है। कोरोना काल के बाद सोशल मीडिया पर तमाम वीडियो वायरल हो रहे हैं । इनमें दिखाया जा रहा है कि कोरोना संक्रमित रोगियों को अस्पतालों में जगह नहीं मिल रही है। वे मारे-मारे घूम रहे हैं। इनमें कितना सच है, इसकी पड़ताल करने की जरूरत है। क्योंकि सोशल मीडिया पर कोई भी कुछ भी वायरल कर सकता है। लेकिन, सरकारों को उन निजी अस्पतालों पर कठोर एक्शन लेने में देरी नहीं करनी चाहिए जो रोगियों को नोच-नोच कर खा रहे हैं। निजी अस्पतालों को लेकर अखबारों में भी तमाम खबरें आ रही हैं कि वहां पर कोरोना संक्रमित रोगियों को भारी-भरकम बिल थमाए जा रहे हैं। यह स्थिति तुरंत ही रूकनी चाहिए। यह सच में घोर निऱाशाजनक स्थिति है कि पैसे कमाने की हवस के चलते कुछ अस्पताल पत्थर दिल हो गए हैं। उनके अंदर का इंसान मर गया है। आखिर सरकारें इन इंसानियत के दुश्मनों पर एक्शन लेने में देरी किस कारण से कर रही है? यह सभी सरकारों की भी अग्नि परीक्षा है। उन्हें देश के आम नागरिक को कोरोना के साथ-साथ इंसानों का खून चूसने वाले राक्षसों की भी कमर तोड़नी होगी।
(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)


