Opinion: हिंदुत्व से हटकर नैतिकता की राजनीति, भाजपा ने बदला बंगाल जीतने का मंत्र

संघ के स्तर पर बिहार और बंगाल के लिए 'त्रिशूल फॉर्मूला' तैयार

Opinion: हिंदुत्व से हटकर नैतिकता की राजनीति, भाजपा ने बदला बंगाल जीतने का मंत्र
फाइल फोटो (source: subkuz news)

जिसने अपनी परंपरागत रणनीति से हटकर एक नई सियासी जमीन तैयार करने की कोशिश की है. अब भाजपा बंगाल में हिंदुत्व या राष्ट्रवाद की बजाय ‘सांस्कृतिक पतन’, ‘महिला सुरक्षा’ और ‘शिक्षा व्यवस्था की गिरावट’ जैसे मुद्दों को केंद्र में लाकर ममता बनर्जी की सरकार को घेरने का प्रयास कर रही है

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है. इस बार तापमान बढ़ाने का काम भारतीय जनता पार्टी ने किया है, जिसने अपनी परंपरागत रणनीति से हटकर एक नई सियासी जमीन तैयार करने की कोशिश की है. अब भाजपा बंगाल में हिंदुत्व या राष्ट्रवाद की बजाय ‘सांस्कृतिक पतन’, ‘महिला सुरक्षा’ और ‘शिक्षा व्यवस्था की गिरावट’ जैसे मुद्दों को केंद्र में लाकर ममता बनर्जी की सरकार को घेरने का प्रयास कर रही है. यह केवल एक चुनावी बदलाव नहीं है, बल्कि भाजपा की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जो उसे बंगाल की सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने की दीर्घकालिक योजना को दर्शाती है. इसके लिए पार्टी ने संगठन में भी व्यापक फेरबदल किए हैं और एक ऐसे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है जो बंगाली अस्मिता और सामाजिक चेतना की नब्ज को बेहतर तरीके से समझता है. समिक भट्टाचार्य की ताजपोशी सिर्फ एक पद की नियुक्ति नहीं बल्कि एक राजनीतिक संकेत है भाजपा अब बंगाल को दिल्ली की नजरों से नहीं, बल्कि कोलकाता की चेतना से देखेगी.

यह बदलाव ऐसे समय में किया गया है जब पार्टी को पिछले चुनावों में बंगाल में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी. 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भारी संसाधन झोंकने के बावजूद सत्ता से दूरी बनाए रखी. उस चुनाव में पार्टी ने ममता बनर्जी के खिलाफ जिस आक्रामक हिंदुत्व की रणनीति अपनाई, वह बंगाल की पारंपरिक बहुसांस्कृतिक चेतना से टकरा गई. नतीजा यह रहा कि भाजपा को कई सीटों पर अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा. अब पार्टी ने उस गलती से सबक लेते हुए रणनीति में मूलभूत बदलाव किया है. इस बार न तो जय श्री राम के नारे प्राथमिकता में हैं और न ही नागरिकता संशोधन कानून को हवा दी जा रही है. अब भाजपा बंगाल के पतनशील समाज, शिक्षा की विफलता और महिलाओं की असुरक्षा को ममता सरकार की नाकामी के रूप में प्रस्तुत कर रही है.

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इस नई रणनीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण अमित मालवीय की ओर से जारी किए गए वे वीडियो हैं, जिनमें कथित रूप से तृणमूल कांग्रेस के छात्र संगठन से जुड़े नेता कॉलेज परिसरों और यूनियन दफ्तरों का दुरुपयोग करते नजर आ रहे हैं. एक वायरल क्लिप में छात्र नेता को एक छात्रा से सिर की मालिश करवाते हुए दिखाया गया है. हालांकि इन वीडियो की पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं की जा सकी है, लेकिन भाजपा ने इन्हें राज्य की नैतिक और शैक्षणिक गिरावट के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया है. भाजपा का दावा है कि बंगाल जो कभी भारतीय पुनर्जागरण का केंद्र था, आज वहां की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है. पार्टी का कहना है कि छात्रों को मजबूरी में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ रहा है क्योंकि राज्य में उन्हें न सुरक्षित माहौल मिल रहा है और न ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा.

यह भी कोई संयोग नहीं कि भाजपा अब महिला सुरक्षा को लेकर लगातार आक्रामक हो रही है. संदेशखली की घटना को भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बनाया है, जहां तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता पर कई महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए. इसके अलावा आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर की हत्या, कोलकाता लॉ कॉलेज में बलात्कार जैसी घटनाओं को भाजपा लगातार ममता सरकार की नाकामी के रूप में प्रस्तुत कर रही है. भाजपा की फैक्ट फाइंडिंग टीम, जिसकी अगुवाई मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त सत्यपाल सिंह कर रहे हैं, ने लॉ कॉलेज मामले की न्यायिक जांच की मांग की है. विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया है कि तृणमूल के छात्र संगठन के पास सत्ता का ऐसा संरक्षण है कि वे कॉलेज परिसरों में खुलेआम सत्ता का दुरुपयोग कर रहे हैं. उन्होंने इसके समर्थन में 50 से ज्यादा तस्वीरें जारी की हैं और दावा किया है कि ये तस्वीरें उस तंत्र का हिस्सा हैं जो राज्य के युवाओं को नैतिक रूप से भ्रष्ट कर रहा है.

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शुभेंदु अधिकारी ने इस मुद्दे को एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप देने की कोशिश की है. उन्होंने ममता बनर्जी की 21 जुलाई को होने वाली शहीद दिवस रैली के दिन एक समानांतर 'कन्या सुरक्षा यात्रा' निकालने की घोषणा की है. यह यात्रा केवल एक रैली नहीं बल्कि भाजपा के लिए एक प्रतीक है एक ऐसा प्रतीक जो यह संदेश देता है कि भाजपा अब महिला सुरक्षा को केवल चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन के रूप में देख रही है. भाजपा युवा मोर्चा ने इसके साथ ही ‘उत्तर कन्या अभियान’ की भी घोषणा की है. भाजपा का दावा है कि ये दोनों कार्यक्रम सरकार की असंवेदनशीलता और तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाएंगे. हालांकि सिलीगुड़ी के पुलिस कमिश्नर ने इन रैलियों को रद्द करने का आदेश जारी किया है, जिसे भाजपा ने लोकतंत्र का गला घोंटना बताया है और इसे जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है.

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इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो यह साफ़ हो जाता है कि भाजपा अब सिर्फ चुनाव जीतने की राजनीति नहीं कर रही, बल्कि वह बंगाल की सामाजिक चेतना को बदलने की कोशिश कर रही है. पार्टी अब वहां एक वैकल्पिक नैतिक विमर्श गढ़ रही है, जिसमें ममता सरकार को भ्रष्ट, नैतिक रूप से पतित और जनता से कटे हुए शासन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. भाजपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह न केवल विकल्प है, बल्कि वह सुधार की आवश्यकता है.

यह रणनीति इसलिए भी रोचक है क्योंकि अब भाजपा अप्रत्यक्ष रूप से विपक्षी एकता की वकालत करने लगी है. समिक भट्टाचार्य ने हाल ही में एक बयान में कहा कि ममता बनर्जी को हराने के लिए भाजपा अकेले काफी नहीं है और कांग्रेस तथा वामपंथी दलों को भी इस लड़ाई में साथ आना चाहिए. यह बयान अपने आप में भाजपा की रणनीतिक यथार्थवादी सोच को दर्शाता है. बंगाल की राजनीति में जहां भाजपा खुद को लंबे समय तक बाहरी पार्टी के रूप में देखी जाती रही है, वहां वह अब खुद को स्थानीय संस्कृति, नैतिकता और सुरक्षा के प्रवक्ता के रूप में प्रस्तुत करना चाह रही है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इस बदलाव को पूरी तरह अपना समर्थन दिया है. संघ के स्तर पर बिहार और बंगाल के लिए 'त्रिशूल फॉर्मूला' तैयार किया गया है, जिसके तहत पार्टी को तीन मोर्चों पर मजबूत किया जा रहा है संगठनात्मक ढांचा, वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक जुड़ाव. पार्टी के भीतर 'पार्टी फर्स्ट' मॉडल लागू किया गया है, जिससे गुटबाजी को खत्म कर संगठन को चुनाव के लिए तैयार किया जा सके. भाजपा अब बंगाल में केवल सत्ता की चाह नहीं रखती, वह वहां एक वैकल्पिक चेतना और सत्तातंत्र विकसित करने की ओर बढ़ रही है.भाजपा की इस नई रणनीति को लेकर ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस अभी सार्वजनिक रूप से भले ही तीखा पलटवार कर रही हो, लेकिन पार्टी के भीतर चिंतन जरूर चल रहा है कि भाजपा ने इस बार भावनात्मक और बौद्धिक दोनों मोर्चों पर हमला बोला है. आने वाले महीनों में यदि भाजपा इस नैरेटिव को स्थायी बना पाने में सफल होती है, तो यह बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव साबित हो सकती है.

 


संजय सक्सेना,लखनऊ 
वरिष्ठ पत्रकार

 

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Edited By: Sujit Sinha
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Senior Technical Editor | Writer | Asst. Editor, Political, Geopolitical & Social Affairs
Working across digital media, technology, public discourse, and contemporary political developments.

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