मार्क्स नहीं जीवन के मोल समझें!
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कामिनी चौधरी
हताशा इतनी ज्यादा कि प्राणों की भी आहुति दे रहे हैं ये। परीक्षा परिणाम अनुकूल न होने पर सीधे मौत को गले लगाते हैं वो भी ऐसी मौत जिसमें बचने की गुंजाईश ही न हो, आखिर क्यों ? रांची भी इन दिनों ऐसी ही घटनाओं का सामना कर रही है, कभी 12वीं की छात्रा अंकिता परीक्षा में नंबर कम आने के कारण सिटी मॉल से कूद कर अपनी जान दे देती है, इस घटना से अभी एक परिवार उभरा भी नहीं था कि दूसरी ओर नामकुम रेल फाटक के पास महज दो नंबर से फेल एक छात्रा ट्रेन के सामने कूद जाती है। सवाल यह है कि क्या आत्महत्या किसी तथ्य का समाधान है? और हमे मार्क्स नहीं बल्कि अनमोल जीवन के मोल को समझना होगा।
पहली घटना: 10 मई, हरमू रिलायंस ट्रेनड्स, सिटी मॉल से अंकिता नामक युवती ने कुद कर अपनी जान दे दी, कारण परीक्षा में कम नंबर आने पर उसके पापा ने थोड़ी डांट लगा दी, लेकिन ऐसी भी डांट नहीं होगी की आत्महत्या ही एक रास्ता बचा हो। जरूरत थी, अपनी असफलता को समझकर उस पर मेहनत करने की पर शायद उसने मेहनत से ज्यादा खुदखुशी करना बेहतर समझा। थोड़े से भय और इस समाज के बारे में सोच कर उसने अपने पूरे परिवार को इस समाज के आगे छोड़ दिया।
दूसरी घटना: 15 मई , मंगलवार को जैक बोर्ड का रिजल्ट आया ओर बुधवार को नामकुम में वीमेंस कॉलेज की छात्रा खुशबू कुमारी ने महज दो नंबर के लिए आगे मेहनत करने से बेहतर जान देना सही समझा। अहली सुबह घरवालों से झूठ बोल कर घर से निकली और नामकुम रेल फाटक के पास ट्रेन के सामने कूदकर उसने अपनी जान दे दी। बताया जा रहा है कि कल 12वीं का रिजल्ट निकला, जिसमे खुशबू को अकाउंट में कम नंबर मिलने से वो फेल हो गई, रात में काफी तनाव में थी। [URIS id=8357]
लगातार इन दो घटनाओं से कहीं न कहीं प्रश्न उठना लाजमी है, कि क्या ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता ? जवाब है, कि बिल्कुल रोका जा सकता है, प्रतियोगिता के इस अंध दौड़ व दिखावे की इस दुनिया में बच्चों में सब्र का स्तर काफी कम हो गया है व उनके अंदर ये भय होता है, कि समाज उनके बारे में क्या सोचेगा ? ऐसे में अभिभावकों को पूर्व से ही रिजल्ट के नाकारत्मक और सकारत्मक दोनों पहलुओं पर चर्चा करनी चाहिए। उन्हें आश्वस्त करना चाहिए कि उनके अच्छे परिणाम से खुशी होगी लेकिन अगर परिणाम संतोषजनक नहीं भी हुआ तो मेहनत के लिए प्रोत्साहित करें। आज के दौर में कम्यूनिकेशन गैप एक बहुत बड़ा कारण है इन सभी घटनाओं का, अभिभावकों को कोशिश करनी होगी। उनके और उनके बच्चे के बीच में ऐसी स्थिति न पैदा हो। उन्हें महसूस कराना होगा, कि उनकी क्षमता का अंत नहीं है। जरूरत है, सकारात्मक पहल की। उन्हें उस कार्य के लिए प्रोत्साहित करें जिसमें उनकी लग्न हो मेहनत कर उसे निखार सकें। आज के दौर में बच्चों ने सोशल मीडिया के जरिए अपने ही एक समाज का निर्माण किया हुआ है, उस पर भी निगरानी बनाएं रखें।
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Edited By: Samridh Jharkhand
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